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अनुभव, अनुभूति और सत्य

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       डॉ. विकास मानव

अनुभव को किसी न किसी रूप में व्यक्त किया जा सकता है, लेकिन अनुभूति को नहीं। 

अनुभव और अनुभूति में बहुत बड़ा अंतर है। 

   अनुभव मन का विषय है और अनुभूति है आत्मा का विषय। 

    जो विषय आत्मा का होता है, वह साधारणतया व्यक्त नहीं हो सकता , न भाव से, न भावना से और न शब्द से। 

     अब रही सत्य की बात। 

सत्य आत्मा का विषय है, उसे आत्मा के द्वारा ही जाना और समझा जा सकता है। जैसे-जैसे आत्मोन्नति होती जाती है, वैसे-ही-वैसे सत्य की अनुभूति होती जाती है। ‘सत्य’ आत्मा का शब्दरूप है। जीवन सत्य है इसीलिए वह भी आत्मरूप है। जैसे आत्मा नित्य है, उसी प्रकार जीवन भी नित्य है। 

     जीवन की धारा सतत है। हर अवस्था में जीवन का अस्तित्व है। मृत्यु जीवन की धारा को रोक नहीं सकती। उसके अस्तित्व को नष्ट नहीं कर सकती। क्योंकि मृत्यु अन्य घटनाओं की तरह एक घटना है, एक लंबी निद्रा है और उस  निद्रा की अवस्था में भी हम स्वप्न देखते हैं और वह स्वप्न होता है जीवन से सम्बंधित भूत और भविष्य की किसी घटना से जुड़ा हुआ। उस स्वप्न के बाद हम फिर चिरनिद्रा में सो जाते हैं। जब हम जागते हैं तो अपने को एक नए शरीर में पाते हैं।

     प्रायः लोग मृत्यु को सत्य मानते हैं, लेकिन यह एक भ्रम है, बहुत बड़ा भ्रम। मृत्यु सत्य है तो जीवन असत्य हो जाता है। क्योंकि एक ही विषय से सम्बंधित दो सत्य कदापि नहीं रह सकते।

      मृत्यु को लेकर अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है। उसकी तरह-तरह से व्याख्या हो चुकी है। मृत्यु और मृत्यु की बाद की स्थितियों और आत्मा को अमर मानकर मरणोपरांत उसकी गतिविधियों और अवस्थाओं पर न जाने कितने ग्रन्थ लिखे जा चुके हैं। उन पर न जाने कितनी टीकाएँ और न जाने कितने भाष्य प्रस्तुत किये जा चुके हैं। 

     लेकिन जीवन और जगत-इन दोनों के सम्बन्ध में वेद, पुराण, शास्त्र, उपनिषद् आदि में कोई विशेष और सहज स्थान नहीं है, कोई विशेष और सहज व्याख्या नहीं है, कोई विशेष और सहज विवेचना भी नहीं है। शरीर को ‘नश्वर’, जीवन को ‘स्वप्न’, जगत को’ मिथ्या’और ‘भ्रम’ कहकर इतिश्री कर दिया गया है।

      जीवन ‘सत्य’ है और मृत्यु है एक ‘घटना’ मात्र। अन्य घटनाओं की तरह एक घटना। वह घटना शरीर को बदल देती है, लेकिन संसार को नहीं। रही जीवन की बात तो उसकी धारा निरंतर प्रवाहित रहती है। कोई प्रभाव नहीं पड़ता उस पर मृत्यु का। ‘जीवन’ की धारा का उदगम कहाँ है और वह कहाँ जाकर समाप्त होती है, उस सम्बन्ध में सभी धर्म (सनातन धर्म को छोड़ कर) मौन हैं।

जीवन चार अलग-अलग वस्तुओं का संयोग है-

शरीर, प्राण, मन और आत्मा। 

    हाड़, मांस, रक्त, मज्जा आदि से बना यह स्थूल शरीर तभी तक जीवित है जब तक उक्त वस्तुएं इससे जुडी हुई हैं। इनके अभाव में इसे शव बनते देर नहीं लगती। शरीर के बाद है-

प्राण :

प्राण है तो गति है, क्रियाशीलता है अन्यथा प्राण निकलते ही शरीर निर्जीव हो जाता है। श्वास-प्रश्वास के द्वारा हमारे भीतर प्राणवायु का आवागमन होता है। शरीर से मन को जोड़े रखने का कार्य प्राण ही करता है। यह एक तरफ शरीर से जुड़ा हुआ है और दूसरी तरफ जुड़ा है मन से। मन से प्राण जुड़ा होने के फलस्वरूप मन चंचल है, अस्थिर है और है डाँबाडोल।मन की अस्थिरता और चंचलता को ध्यान साधना के माध्यम से मिटाया जा सकता है। क्योंकि जब ध्यान या साधना घटित होता है तो श्वास-प्रश्वास की गति थम जाती है और मन शांत और स्थिर हो जाता है। 

     शरीर के मृत हो जाने पर मन आत्मा में लीन हो जाता है। यही कारण है कि मृत्यु के बाद भी ‘स्व’ का बोध अर्थात् ‘मैं’ का बोध बराबर बना रहता है। मैं का बोध इस बात का प्रमाण है कि आत्मा की मृत्यु नहीं होती। आत्मा की अंतिम गति है मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण या परमगति। इसे आप-हम आत्मा की मृत्यु कह सकते हैं, बून्द का सागर में मिलन या आत्मा का परमात्मा में लय कह सकते हैं।

    जीवन-काल में शरीर और प्राण वर्तमान में, मन भूतकाल में और आत्मा भविष्य काल में रहती है। 

    इसी के फलस्वरुप हमें वह भविष्य का अपनी भाषा में संकेत देती है, पूर्वाभास कराती है। आत्मा की अपनी एक स्वतंत्र इन्द्रिय है जिसे ‘छठी इन्द्रिय’ कहते हैं। इस इन्द्रिय का द्वार है तीसरा नेत्र। यह भ्रूमध्य के ऊपर है। पांच ज्ञानेन्द्रियाँ- आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा क्रमशः दृष्टि, श्रवण, गंध, स्वाद और स्पर्श के प्रति संवेदनशील हैं। इनके माध्यम से मनुष्य अपने जीवन की हर क्रिया का संचालन अपनी कर्मेंद्रयों द्वारा करता है। कर्मेन्द्रियाँ हैं-मुख, हाथ, पैर लिंग और गुदा। 

     इन कर्मेंद्रयों के माध्यम से मनुष्य इनसे सम्बन्धित विषय में कर्म करता है। ये सारी क्रियाएँ मनुष्य वर्तमान में संचालित करता है। लेकिन जहां तक भविष्य का सवाल है, उसकी सूचना देने में इन्द्रियां असमर्थ हैं। इनके द्वारा किसी भी प्रकार का पूर्वाभास संभव नहीं है।

     छठी इन्द्रिय (तीसरा नेत्र) के सम्बन्ध में वैज्ञानिकों का मत है कि कोशिकाओं के एक छोटे से समूह के रूप में माथे पर विद्यमान है जिसका आकर “जौ” की तरह है। वह निष्क्रिय रहती है। वह विशेष अवस्था में ही सक्रिय होती है। योगतंत्र में तीसरे नेत्र का बडा महत्व है। अपनी संवेदनशीलता के कारण उसकी पहुँच में सम्पूर्ण विश्व- ब्रह्माण्ड रहता है।

       वैज्ञानिकों को इस छठी इन्द्रिय को जानने-समझने और उसके रहस्योद्घाटन में बहुत समय लगेगा। लेकिन जहां तक योगतंत्र का सम्बन्ध है, वह कई हज़ार वर्ष पूर्व ही उसका रहस्योद्घाटन कर चुका है।

Ramswaroop Mantri

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