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निर्धन जनता का शोषण है : लोकतंत्र का अंतिम क्षण है

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सुधा सिंह

 हम इतने ज्यादा एब्सर्ड हो चुके हैं कि परिहास की सीमा से बाहर जा चुके हैं। 'जनचेतना का प्रगतिशील कथा मासिक' जब अपना एलीट उत्सव मनाता है तो पूरे माहौल और चर्चा से जन गायब होता है और 'अभिजन' का बोलबाला होता है। सांप्रदायिकता के विरोध में और प्रगतिशील पत्रकारिता की सबसे मुखर आवाज जब छठ मनाते हुए तस्वीर डालती है तो नीचे कमेंट में "छटी मैया की जय" होने लगती है और देश की परंपरा और सांस्कृतिक गौरव का बखान हो रहा होता है।
   परंपरा और पितृसत्ता को जड़ से समाप्त करने का आह्वान करने वाली बौद्धिक स्त्रियां नाक तक सिंदूर लगाकर पूजा की तस्वीरें डाल रही हैं। दक्षिण की जहालत और स्त्री के प्रति अपमानजक दृश्यों से भरी फिल्मों की महिमा का मंचों से बखान किया जा रहा है और सोशल मीडिया पर उन्हें ऑस्कर के लिए भेजे जाने की मुहिम चलाई जा रही है।
   लोग दर्जन भर किताबें खरीदते हैं, हर महीने उनकी तस्वीरें फेसबुक पर डालने के बाद उसे अलमारी में सजा देते हैं। लिखने वालों ने पढ़ना बंद कर दिया है। पढ़ने वाले सिर्फ लेखक और उसकी किताबों का नाम रटकर काम चला रहे हैं। समीक्षक ब्लर्ब पढ़कर किताबों पर चर्चा कर रहे हैं। इंटनरेट से खोजकर लोगों का परिचय दिया जाता है। 
   विकीपीडिया और कोरा ट्रोलर आर्मी के हवाले है। टीचर बच्चों से कह रहा है कि इंटरनेट पर सर्च करके प्रोजेक्ट बनाओ। नई उम्र के बच्चे इंटरनेट को अंतिम सत्य मानकर अपनी बुद्धि का विकास कर रहे हैं। मीडिया में ऐंकर चीख-चीखकर हर रोज किसी झूठ को स्टैब्लिश करने की कोशिश में लगे हैं।
  अखबार खबर नहीं किसी अधपढ़े, अधकचरे, मूर्ख के विचारों को लिख रहे हैं। विश्वविद्यालय के ज्यादातर प्रोफेसर फाइलें ढोने वाले क्लर्क बन गए हैं। उनमें से ज्यादातर से आप किसी नए विषय पर चर्चा करें  'आएँ' कहते हुए उनकी आँखें फैल जाएंगी। लेखकों को प्रकाशक बता रहे हैं कि क्या लिखना चाहिए।
   बुढ़ा गए साहित्यकार अब बीपी की दवाई खाकर घासलेटी साहित्य लिखते हुए बेस्ट सेलर लेखक कहलाने का स्वप्न देखते हुए अमर होना चाहते हैं। लोग नींद से उठते हैं और लिट-फेस्ट में जाकर कुछ भी आएँ-बाएँ-शाएँ बोल देते हैं। सुनने वाले तालियां बजाते हैं।

रघुवीर सहाय की पंक्ति याद आ जाती है :
निर्धन जनता का शोषण है
कह कर आप हँसे!
लोकतंत्र का अंतिम क्षण है
कह कर आप हँसे।

कभी रात में चोर को देखकर भौंकने वाले कुत्ते इन दिनों जब लाठी फटकारी जाती है तो दुम दबाकर कांय-कांय करते हुए किसी कोने में अपने हिस्से की हड्डी लेकर दुबक जाते हैं। लोग नाच रहे हैं और नाचते-नाचते गिर जा रहे हैं। उठ कर फिर नाच रहे हैं। कुछ लोग खा रहे हैं, कुछ लार टपका रहे हैं और कुछ नीचे फेंकी हुई हड्डियां चाट रहे हैं। देश का पूरा बौद्धिक सांस्कृतिक परिदृश्य इसी तरह का हो गया है।
कुछ ऐसी ही गत सन ’75 में देश की हुई थी। इमरजेंसी में सारे क्रांतिकारियों के मुंह पर ताला लग गया था। हालात तो ऐसे थे कि ‘किस्सा कुर्सी का’ में जनता बनी शबाना आज़मी को गूंगी बना दिया गया था। तब भी एक पूंजीपति का बोलबाला था, फिल्म में उसका नाम घिड़ला था। सबको पता है कि पूरी फिल्म ही जला दी गई थी।
अभी ‘किस्सा कुर्सी का’ जैसी फिल्म बन पाएगी इसमें भी शक है। फिलहाल तो इन हालात पर सिर्फ हँस सकते हैं। वैसे यह हँसना भी खट्टी डकार जैसा है न उगली जाए न निगली जाए।
बहरहाल…
बच्चा ! ऐसी नगरी में रहना उचित नहीं है, जहाँ टके सेर भाजी और टके ही सेर खाजा हो…
सेत सेत सब एक के, जहाँ कपूर कपास
ऐसे देस कुदेस में कबहुँ न कीजै बास॥
कोकिला बायस एक सम, पंडित मूरख एक
इन्द्रायन दाडिम विषय, जहाँ न नेकु विवेक॥
बसिए ऐसे देस नहि, कनक दृष्टि जो होय
रहिए तो दुख पाइये, प्रान दीजिए रोय॥

  • भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक ‘अँधेर नगरी’ से.

Ramswaroop Mantri

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