डॉ. विकास मानव
न्युट्रन के लिङ्ग शक्ति को शून्य प्रमाणित करने के लिए पश्चिम के वैज्ञानिकों द्वारा मिथ्या प्रयास किया जा रहा है। न्युट्रन का लिङ्ग शक्ति शून्य नहीं है।
यह प्रमाणित होने पर आधुनिक विज्ञान के बहुत सारे सिद्धान्त (जैसे binding energy) भूल प्रमाणित हो जायेंगे। इसीलिए ऐसा मिथ्या प्रयास किया जा रहा है।
इस विषय पर कोई भी वैज्ञानिक अनेक प्रयास के पश्चात् भी आज तक वैदिक मत को भूल प्रमाणित नहीं कर सकें हैं।
सर्वस्थ प्रकृतिलयाः है। यह भूमा है – समुद्र जैसे सर्वव्याप्त है। इसके भी स्थान भेद से तीन विभाग है, जिसे समुद्र अर्णव-नभस्वान-सरस्वान कहा जाता है। आधुनिक विज्ञान में इन तीनों को electron-muon-tau कहते हैं। यहाँ Electron के लिए समुद्र अर्णव (electron sea) शब्द का व्यवहार किया जाता है।
शक्तिः कार्यानुमेया हि यद्गतैवोपलभ्यते।
तद्गतैवाभ्युपेतव्या स्वाश्रयान्याश्रयापि च॥
~वैशेषिक.
शक्ति का स्वरूप दर्शन नहीं होता। केवल उसका कार्य देखकर शक्ति का अनुमान किया जाता है (Energy cannot be directly observed, but existence of energy is inferred from its effects on its base or conductor). अतः शक्ति की आश्रय वस्तु में उसकी सत्ता माननी पडेगी (energy can exist only with some conductor – or base)।
वस्तु वह है, जिसका निर्माण और संख्यान किया जा सकता है (particles can be created and counted)। निर्माण (निर् + मा॒ माने॑) का अर्थ दो विपरीत लिङ्ग के मध्य में शक्ति द्वारा कार्य-कारण रूप से बन्धन है.
“चंद्रार्कमध्यमा शक्तिर्यत्रस्था तत्र बन्धनम्.”
इसमें दोनों लिङ्ग एक अन्य से आहत हो कर अपूर्व योगज सृष्टि करते हैं। संख्यान (सम्यक् + ख्या॒ प्र॒कथ॑ने) का अर्थ जिस एक रूप वस्तु सामान्य का अलग अलग भेद किया जा सकता है.
“भेदहेतुत्वमाश्रित्य संख्येति व्यपदिश्यते.”
मूल वस्तुओं का एकरूपता भी एक स्वभाव है। एकजातीय दो अणुओं में से एक अणु (proton or neutron) अन्य अणु जैसा ही होगा.
“स धर्मो व्यतिरिक्तोवा तेषामात्मैव वा तथा.”
वह भिन्न रूप वाला नहीं हो सकता। परन्तु मात्रा भेद से इनका विवर्त अथवा विकास हो सकता है। अतात्विक (not fundamental) अन्यथाभाव (transformation) को विवर्त (evolution) कहते हैं। केन्द्र शक्ति (particle with a center of mass) की अनेक प्रकार के विचित्र संयोग (interaction with different energies) से जो व्यक्ति करण (visual manifestation) होता है, वह विकास (transformation) है।
आधुनिक विज्ञान में माना जाता है कि जब दो खिलाडी एक कन्दुक (ball) को लेकर क्रीडा करते हैं, तो कन्दुक का स्थान परिवर्तन सूत्र वायु (binding energy) जैसा काम करता है।
सूत्र वायु वैदिक विज्ञान सम्मत है। परन्तु वह binding energy नहीं है, न वह string है। कन्दुक का अपना गति उसकी स्थिति के उपर निर्भर है। जब वह एक खिलाडी के पास होता है, तब उस खिलाडी बल प्रयोग कर उसे अन्य खिलाडी के पास भेज देता है।
अन्य खिलाडी उसका कौशलपूर्वक अनुकरण करता है। इसी कौशल से उनका कन्दुक के साथ योग होता है.
“योगः कर्मसु कौशलम्.”
एक खिलाडी का कन्दुक के साथ संयोग-विभाग रूपी कर्म (बल प्रयोग) का अन्य खिलाडी का कन्दुक के साथ कर्म का संयोग है। कन्दुक दोनों खिलाडियों को बाँध कर नहीं रखता।
खिलाडिया कन्दुक का अन्य खिलाडियों के साथ संयोग-वियोग के लिए कौशलपूर्बक बलप्रयोग करते हैं।
खं सन्निवेशयेत् खेषु चेष्टनस्पर्शनेऽनिलम्।
पक्तिदृष्ट्योः परं तेजः स्नेहेऽपो गाञ्च मूर्तिषु॥
~ उपनिषद.






