सुसंस्कृति परिहार
भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत को 21सेंचुरी आईकान सम्मान की घोषणा स्वागतेय है।यह किसान आंदोलन में शामिल तमाम संगठनों का सम्मान है जिसने गांधी जी के असहयोग आन्दोलन की तरह सारी दुनिया ने किसान आंदोलन की तरफ आशाभरी नज़रों से देखा । हालांकि सत्ता में बैठे लोग गांधी के सख़्त विरोधी और गोडसे वादी थे। किसानों को बदनाम करने के कई हथकंडे सरकार ने आजमाएं । उन्हें टुकड़े टुकड़े गैंग, आंदोलन जीवी,मवाली, खालिस्तानी और पाकिस्तानी तक कहा गया। गणतंत्र समारोह पर उनके उत्साह को ग़लत राह वाला बताकर जिस तरह आंदोलन को बदनाम कर किसानों को दिल्ली बार्डर से उजाड़ने का जो झूठा षड्यंत्र रचा गया उससे राकेश टिकैत के बहे आंसुओं ने आंदोलन को जिस तरह प्रतिबद्ध किया वह आंदोलन के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।यह भी सबक याद रहेगा एक संकल्पित नेतृत्व यदि आपके बीच है तो दुनिया की ताकत उसे डिगा नहीं सकती। राकेश टिकैत इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं उनसे गोदी मीडिया कभी उलझ नहीं पाई।सीधे सरल तौर पर वे अल्प शब्दों में जो तीर छोड़ते हैं वह काबिले गौर रहे।संयत भाषा और दृढ़ इरादे लिए राकेश टिकैत ने कभी कोई श्रेय नहीं लिया वे अपने तमाम साथियों की इच्छा को लेकर आगे बढ़े।

लखीमपुर खीरी कांड के दौरान वे जब अचानक वहां पहुंच जाते हैं और समझौता कर लेते हैं तो चारों ओर चर्चाएं गर्म हो जाती हैं कि वे पुलिस अधिकारियों और सरकार से मिले हुए हैं ,भरोसे लायक नहीं। किंतु जब वे तमाम हालात सामने रख ये कह देते हैं कि जीप से कुचले किसानों के शवों के सम्मान में उन्होंने ये पहल की । किसानों की अंत्येष्टि और मुआवजे के बाद केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के खिलाफ और उनके कथित हत्यारे बेटे के खिलाफ मोर्चा खोलते हैं वह आज भी जारी है। निश्चित तौर पर वे सच्चे किसान हितैषी और उनके अधिकारों के प्रति गहरी संवेदनाएं रखते हैं।
किसान आंदोलन की शुरुआत एम एस पी और बिजली वगैरह समस्याओं को लेकर पंजाब से प्रारंभ होती हैं जिन्हें किसान सभा उठाती है लेकिन जब जब 17सितम्बरको लोकसभा और 20 सितम्बर को राज्यसभा किसान कानूनों सम्बंधी आर्डिनेंस को बिना बहस कराए , बिना किसानों से बात किए ध्वनि मत से पास करती है तो किसान संगठन मुख्य हो जाते हैं 24सितंबर को पहली बार इसके खिलाफ तीन दिन रेल रोको आंदोलन चलता है।25सितम्बर से देश भर में किसान संघर्ष कोआर्डिनेशन कमेटी के आह्वान पर दिल्ली चलो मूवमेंट शुरू होता है।26नवम्बर हरियाणा, पंजाब और दिल्ली से लगे पश्चिम उत्तर प्रदेश के हज़ारों किसानों के साथ विभिन्न राज्यों के किसान नेता दिल्ली पहुंच जाते हैं जंतर मंतर पर प्रर्दशन जारी रहते गृहमंत्री से बात होती है वह नाकाम होती है क्योंकि किसान बिल वापस किए बिना वापस नहीं जाने अडिग हो जाते हैं। यहीं से राकेश टिकैत की भूमिका की शुरुआत होती है।
धीरे-धीरे आंदोलन में कई सैकड़ा किसान संगठन शामिल होते जाते हैं। कई बातचीत के सरकार से नाकाम दौर भी चले।तमाम तकलीफ़ उठाते हुए किसान अपने परिवार सहित आंदोलन में पूरे एक साल के बाद भी मोर्च पर डटे हुए हैं।इस एक साल में किसानों के परिवार की स्त्रियों और बच्चों ने जिस तरह इस आंदोलन की ऊंचाई दी। संघर्ष करना सीखा वह अद्भुत है।कनाडा के प्रधानमंत्री ने किसानों का खुलकर समर्थन किया। लगभग सभी देशों में किसानों के समर्थन में मार्च निकाले गए ।आज तो यह स्थिति है किसान आंदोलन की देशों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बन गया है। इस आंदोलन को पॉप सरकार रिहाना और जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थनवर्ग का भी समर्थन मिला। लेकिन हमारी दिल्ली साईवर सेल ने किसान विरोधी टूल किट के इस्तेमाल पर एफ आर दर्ज कर दी ।जिसे काफी थू थू होने पर वापस लिया गया।करनाल में एक अधिकारी ने जिस तरह किसानों के सिर फोड़ने आदेश देकर किसानों का ख़ून बहाया वह भी दुनिया ने देखा। लखीमपुर खीरी में शांतिपूर्वक चल रहे किसानों को मंत्री के साहिबजादे ने जिस तरह कुचला वह भी दर्दनाक वाकया दुनिया ने देखा है। किसानों पर ठंड में पानी की बौछार, लाठीचार्ज,सड़क पर गड्ढे, दीवार बनाना,राह में कीलें ठोकने के बावजूद किसानों ने हंसते गाते जो वार बिना कुछ कहे सहे ।दुनियां ने देखा है महात्मा गांधी की राह पर आज़ादी के बाद का यह सबसे बड़ा शांति पूर्ण आंदोलन है।
किसानों ने जब संसद में सुनवाई ना होने पर अपनी संसद लगाई तब 14दलों के नेताओं ने पहली बार उनके प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाई।जबकि सरकार इसे प्रारंभ से ही इसे विपक्षी शरारत बताता रहा है।आज पूरा भारत उनके साथ हैं।यहीं चुनौती वर्तमान सरकार पर भारी है।
बता दें कि, अब पांच राज्यों में होने जा रहे चुनाव के मद्देनजर किसान आंदोलन के करीब एक साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में तीनों विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की थी। हालांकि किसान आंदोलन अब भी समाप्त नहीं हुआ है। राकेश टिकैत और प्रदर्शनकारी किसान आंदोलन के दौरान मारे गए 700 से अधिक किसानों के परिवारों को मुआवजा देने तथा फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी दिए जाने की मांग कर रहे हैं।
गौरतलब है कि केंद्र के तीन नए कृषि कानूनों को लेकर गतिरोध बना हुआ था। कानूनों को रद्द किए जाने के बावजूद किसान एमएसपी जैसे कई मुद्दों को लेकर सरकार के साथ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर चुके हैं। इसके लिए दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का आंदोलन अब भी जारी है। किसानों ने सरकार से जल्द उनकी मांगें मानने की अपील की है।
ज्ञात हो कि केन्द्र सरकार बीते सितम्बर महीने में पारित किए तीन नए कृषि कानूनों- द प्रोड्यूसर्स ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) एक्ट, 2020, द फार्मर्स ( एम्पावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेज एक्ट, 2020 और द एसेंशियल कमोडिटीज (एमेंडमेंट) एक्ट, 2020 को कृषि क्षेत्र में बड़े सुधार के तौर पर पेश कर रही थी, लेकिन प्रदर्शन कर रहे किसानों ने आशंका जताई थी कि नए कानूनों से एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) और मंडी व्यवस्था खत्म हो जाएगी और वे बड़े कॉरपोरेट पर निर्भर हो जाएंगे।
कुल मिलाकर किसान आंदोलन जो एम एस पी जैसे मूल मुद्दे से प्रारंभ होकर किसान बिल हटाने में लग गया।इस दौरान हज़ारों किसानों को जेल भेजा गया,साथ सौ किसानों की होते हुईं।उन सब समस्याओं का हल अभी बाकी है इसलिए आंदोलन जारी है।जब तक आंदोलन जारी है वे टिके रहेंगे, हिलेंगे नहीं दिल्ली से।यह राकेश टिकैत ही हैं जो 10 दिसम्बर मानवाधिकार दिवस को अपना सम्मान लेने नहीं लंदन नहीं जायेंगे।वे किसानों को मानवाधिकार के लिए लड़ते रहेंगे।लगता है 21सेंचुरी आईकान समयमान राकेश टिकैत जैसे किसान नेता को पाकर सम्मानित हो रहा हो।





