मुनेश त्यागी
जब प्रधानमंत्री मोदी ने गुरु नानक पर्व के मौके पर, तीन काले कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा की तो यकीन न हुआ। जब टीवी चैनलों पर मोदी को अपने जिद्दी कदम वापस खींचते हुए देखा और सुना, तभी जाकर यकीन हुआ।
जो मोदी सरकार, बीजेपी और संघ परिवार किसानों को मवाली, गुंडे, आतंकवादी, खालिस्तानी, कांग्रेसी, नक्सलवादी, माओवादी और कम्युनिस्ट कहकर खुलेआम अपमानित कर रहे थे, वे एकदम खामोश हो गये। उन्हें लगा कि जैसे मोदी रास्ता भूल गया और भटक गया है।
उन्हें तो आज तक भी विश्वास नही हो रहा हैकि मोदी ऐसी भी घोषणा कर सकता है। हताशा और निराशा में वे चैनलों पर बयान दे रहे हैं कि 2 माह बाद यह कानून फिर लौट आएंगे। जब मोदी अचानक ही चैनलों पर अवतरित हुए तो लोगों को लगा कि देश के नाम संबोधन पर कही एक और आफत आने वाली है, मगर जैसे-जैसे मोदी अपने संबोधन में आगे बढ़ते गए तो कुहासे और अंधकार के बादल छटते गए, अंधेरे की जगह प्रकाश की किरणें नजर आने लगी और धीरे-धीरे किसान विरोधी तीनों काले कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी गई। इन कानूनों की वापसी ने यह तय कर दिया है की किसानों की मांगें और लड़ाई सही है और सरकार एक तरफा हमला करके किसानों पर काले कानून थोप रही थी।
पूरे देश में जैसे विजय और उल्लास का माहौल छा गया। किसान, मजदूर, छात्र नौजवान और महिलाएं और उनके परिवार एक-दूसरे को बधाई देने के मूड में आ गए, इन तीनों काले कानूनों का विरोध कर रहे लाखों करोड़ों हमदर्दों और कार्यकर्ताओं के चेहरे खिल उठे। उन्हें एकाएक एहसास हो गया है कि यह उपलब्धि, एकजुट संघर्ष, एक बड़ी तपस्या का परिणाम है, एक अनुशासित, ईमानदार, लड़ाकू और प्रतिबंध नेतृत्व की महागाथा है।
यह आजादी के बाद की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक जीत है, यह किसानों के एकजुट संघर्ष और अकथनीय त्याग, तपस्या और बलिदानों की जीत है। यह जीत वैसे ही हासिल नहीं की गई है इसमें 750 से ज्यादा किसान शहीद हो गए हैं। इसमें बहुत से परिवारों ने अपने पिताओं, बेटों और भाइयों को खोया है।
किसानों की यह जीत पिछले 30 साल पुराने उदारीकरण,निजीकरण और वैश्वीकरण के हमलावर नीतियों और अभियान की हार है जिसकी नीतियों और पूंजीपति सरकारों ने बहुत बड़ी कुर्बानियों के द्वारा हासिल किए गए तमाम अधिकारों को पिछले 30 सालों में छीन लिया है।
वैश्विक पटल पर, पिछले तीस सालों में हासिल की गई यह सबसे बड़ी जीत है जिसका परिणाम यह हुआ है कि हारी, थकी और हौंसलापस्त जनता में यह यकीन पैदा हो गया है कि एकजुट संघर्ष ही किसी भी जंग में दुश्मन को हरा सकता है। यह ऐतिहासिक जीत किसानों, मजदूरों, नौजवानों और महिलाओं के एकजुट संघर्ष और ईमानदार,सुलझे हुए, प्रतिबद्ध और अनुशासन प्रिय किसान नेतृत्व की बहुत बड़ी जीत है।अब हमारी जनता बढ़े हुए हौंसले, आशा और विश्वास के साथ अपने छीने हुए अधिकारों और को पुनः प्राप्त करने के लिए, फिर से संघर्ष के मैदान में उतरेगी।
इस ऐतिहासिक जीत का प्रभाव वैश्विक स्तर पर भी पड़ेगा जहां किसानों, मजदूरों, नौजवानों और महिलाओं के अधिकार छीन लिए गए हैं, उन्हें गुलाम बना दिया गया है और उन पर उनका सब कुछ छीन लेने के हमले जारी हैं, उनमें भी यकीन, विश्वास और हौंसला पैदा होगा और वे अपने हकों के लिए फिर से एकजुट होंगे और बढ़े हुए आशा और विश्वास के साथ नयी नयी मांगों को लेकर, फिर से लड़ाई के मैदान में उतरने को एकजुट और तैयार होंगे।
भारत के इस ऐतिहासिक संघर्ष से सबक लेकर वे भी इस विश्वास के साथ अपने अधिकारों की रक्षा करने के अभियान में उतरेंगे और शामिल होंगे कि दुनिया भर के लुटेरे पूंजीपति वर्ग की रहनुमाई में चल रहे उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की अमानवीय मुहिम से लड़ा जा सकता है और उसे परास्त किया जा सकता है। सोते हुए भी जग जायेंगे, मुर्दों में भी जान पड़ जाएगी और वे भी अपनी मांगों को लेकर, पेंशन की मांग को लेकर, बोनस की मांग को लेकर, स्थाई नौकरी की मांग को लेकर, 8 घंटे के काम की मांग को लेकर, ठेकेदारी प्रथा का विनाश करो की मांग को लेकर, सबको शिक्षा सबको काम की लेकर, सब को रोजगार की मांग को लेकर, सबको रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सुरक्षा, वृद्धावस्था पेंशन की मांग को लेकर संघर्ष के मैदान-ए-जंग में आ जाएंगे।
हालांकि यह जीत अभी अधूरी है, आधी है। अभी किसानों का मांग पत्र सरकार ने नही माना है, उनकी दूसरी मांगों पर सरकार ने न तो कोई विचार-विमर्श किया है और ना ही कोई आश्वासन दिया है। एमएसपी को कानूनी अमलीजामा पहनाने की लड़ाई अभी अधूरी है, इसे लेकर भी किसानों को बढे हुए हौंसले के साथ, विजय प्राप्त होने तक, अपनी जंग जारी रखनी होगी।
हमें याद रखना चाहिए कि यह एक वर्गीय संघर्ष है जिसमें वैश्विक स्तर पर पूंजीवादी और समाजवादी विचारों के बीच एक महान वर्ग संघर्ष जारी है। दुनिया भर के पैमाने पर यह एक महान जीत है। पिछले 30 सालों से लुटेरे पूंजीवादी वर्ग का हमला किसानों और आम जनता पर हो रहा है, पर किसानों के इस संघर्ष और जीत ने लुटेरे पूंजीपति दुश्मन को मुंह से पकड़ा है और समाजवादी व्यवस्था के लिए और समाजवादी संघर्ष के लिए आशा की किरण पैदा की है। हमें यह भी नही भूलना चाहिए। इन मायनों में किसान संघर्ष की जीत का महत्व और भी बढ़ जाता है।
सच में भारत के किसानों की यह ऐतिहासिक जीत हमारे देश और दुनिया की जनता के लिए हौंसले और उम्मीद की किरण लेकर आयी है कि एकजुट संघर्ष और एकता के तहत ही दुश्मन को पराजित किया जा सकता है और उससे अपने छीने हुए अधिकार वापस लिए जा सकते हैं। यहां पर हम तो यही कहेंगे,,,,ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के
अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के।
बिन लड़े कुछ भी नहीं मिलता यहां ये जानकर
अब लड़ाई लड़ रहे हैं लोग मेरे गांव के।





