प्रणव प्रियदर्शी
चाहे पटना के पुनाईचक मोहल्ले में देवी स्थान के आगे का अपेक्षाकृत सुनसान इलाका हो या गांव में बीरपुर के बाद और बहेड़ा से पहले विशाल पेड़ों से घिरी पगडंडी – ये दोनों मेरे भीतर भय का संचार करने वाले बड़े स्रोत हुआ करते थे। खासकर दिन ढलने के बाद इन क्षेत्रों से होकर अकेले गुजरने का ख्याल भी सहमा देता था। लेकिन डर एक ऐसा भाव है जो शर्मिंदगी पैदा करता है।
डर जाने के बाद भी यह बात दूसरों से साझा करना मुश्किल था। सो भीतर ही भीतर उस भय पर काबू पाने की कोशिश चलती रहती थी। हनुमान चालीसा उस कोशिश में सबसे बड़ा मददगार हुआ करता था – भूत-पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै।
उम्र के साथ डर के नए-नए रूप और नए-नए स्रोत मिलते गए – परीक्षा का डर, असफलता का डर, किसी गलती के पकड़े जाने का डर…। यह भी समझ आया कि सबके डर अलग-अलग हो सकते हैं और जो साझा डर हैं उनका भी अलग-अलग लोगों में अलग-अलग अनुपात हो सकता है। मसलन किसी को जेल का ज्यादा डर हो सकता है तो किसी को गरीबी का।
यह भी होता है कि एक दौर में आप गरीबी से डर रहे होते हैं, इससे निजात पाने के लिए उलटे-सीधे तरीकों से धन इकट्ठा कर लेते हैं और उसके बाद आप पर जेल का डर इस कदर बढ़ जाता है कि सारी ताकत अफसरों को मिलाए रखने और शिकायतकर्ताओं को डराने-धमकाने में लगा देते हैं।
बहरहाल, इतना तो तय है कि डरना और डराना दो अलग-अलग बातें नहीं बल्कि एक ही चीज के दो सिरे हैं। जो डरता है, वही डराता भी है। दूसरे शब्दों में कहें तो जो सबको डराता हुआ दिखता है, वह भीतर से सबसे ज्यादा डरा हुआ होता है। इसीलिए अक्सर कहा जाता है कि तानाशाह सबसे डरपोक व्यक्ति होता है।
किसी व्यक्ति के विचारों के कारण उसे जेल में डालने, यातनाएं देने या उसकी हत्या करने वाले लोग क्रूर भले हों, निडर और निर्भीक नहीं हो सकते। जो वाकई निर्भीक होता है, वह सबको निडर बनाता है, उन्हें डराने की कोशिश नहीं करता। महात्मा गांधी का पूरा जीवन देख लीजिए। सबको पूरी निर्भीकता से सच बोलने की सीख देते रहे, कभी डराने की कोशिश नहीं की, यह नहीं कहा कि सच नहीं बोलोगे तो नरक में सड़ोगे।
दूसरी तरफ उनकी हत्या करने वाले या हत्या पर मिठाई बांटकर खुशी मनाने वालों का इतिहास और वर्तमान देखिए। हर कदम पर अपने समर्थकों को डराते रहते हैं, ऐसा हुआ तो मारे जाओगे, वैसा हुआ तो बहन-बेटियों का सत्यानाश देखोगे।
इसीलिए ऐसा होता है कि जो आज जेल, कानून और एनकाउंटर का सबसे ज्यादा डर दिखाते नजर आते हैं, वही कभी अपने ऊपर किए जा चुके मुकदमों से त्रस्त बिलख-बिलख कर रोते दिखते थे। डरना और डराना अलग-अलग बातें नहीं, एक ही चीज के दो सिरे हैं।
(प्रणव प्रियदर्शी वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं। हाल में उनकी दो किताबें आई हैं, “चौराहों पर चौराहे” और रुचिरा गुप्ता की “आई किक एंड आई फ्लाई” का अनुवाद “मैं लड़ी और उड़ी”।)






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