शशिकांत गुप्ते
आज देश में आमजन महामारी से ज्यादा अधिनायकवादी मानसिकता से भयभीत हैं?
देश का भविष्य नौनिहाल कोरोना महामारी से बचने के लिए एहतियात बरतते हुए,बेहाल होकर घर में कैद है? मनोचिकित्सकों द्वारा बच्चों की मानसिकता पर पड़ रहे दुष्प्रभाव को लेकर चिंता जताई जा रही है। देश के कर्णधारों की मानसिकता के साथ आँखों की रोशनी पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है।
आज के नौनिहालों की चिंता करना पालकों का सिर्फ कर्तव्य ही नहीं दायित्व है।
आज जो बालावस्था में है,वे कल युवा होंगे। देश के युवाओं को उनकी पढ़ाई पूरी होने पर उन्हें रोजगार चाहिए। जीवन को जीने का अनिवार्य स्रोत है जीविका। जीविका मुहैया करना सरकार का दायित्व है।
आज के नौनिहाल जब थोड़ा समझने लगेंगे तब वे इस बात से चिंतित होंगे कि हमारे बड़े भाई बहनों को रोजगार उपलब्ध नहीं हो रहा है। हम जब रोजगार प्राप्त करने के लिए योग्य हो जाएंगे तब क्या होगा?
आज देश के युवा रोजगार मांगते हैं, जो उनका अपना अधिकार है,तब उनके साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार हो रहा है?
सच में जो भी हो रहा है पहली बार ही हो रहा है।
एक गम्भीर प्रश्न उपस्थित होता है, आस्थावान लोगों के हाथों सत्ता है। जो लोग भगवान पर आस्था रखतें हैं। वे निरंकुश कैसे हो सकतें हैं?
रोजगार के स्रोत की स्थिति यह है कि,एक अनार सौ बीमार की जगह यह कहा जा सकता है कि,एक अनार लाख बीमार।
रोजगार के स्रोतों को कैसे बढाया जाए इस मुद्दे को नजरअंदाज कर सिर्फ चुनावी वादों में दो करोड़ प्रति वर्ष रोजगार देने की घोषणा करना, देश की भावीपीढ़ी के साथ छल करना ही तो है?
यह भी बहुत ही आश्चर्यजनक और अहम मुद्दा है कि,शारीरिक रूप मजबूत हाथों में देश की सत्ता है।ऐसे मजबूत हाथों को भी रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए किसी एजेंसी पर निर्भर रहना पड़ता है?
यह बात उतनी ही सत्य है कि, सन 2014 के बाद सत्ता के द्वारा जो भी जनहित के कार्य सम्पन्न हो रहें हैं। वे प्रथमिकता के आधार पर ही हो रहें हैं।
सबसे पहले प्राथमिकता के आधार पर नाम बदलो अभियान चलाया गया। यह अतिआवश्यक था। तीन तलाक़, तीन सौ सत्तर, और भगवान रामजी का दिव्यभव्य मंदिर का निर्माण।
इन मुद्दों को प्रमुखता से बखूबी हल करने पहल की गई है। यह पहल तो सच में तारीफें काबिल है?
गरीबी उन्मूलन का नया तरीका दृष्टिगोचर हुआ है। गरीबी को मिटाने की जगह गरीबी को दीवार का पर्दा बनाकर ढाक देना ही उचित तरीका है?
बहरहाल चर्चा का मुख्यमुद्दा है, आंदोलन क्यों किए जा रहें हैं।
किसानों का आंदोलन भी सत्ता को सत्ता के द्वारा किए गए वादों को याद दिलाने के लिए किया गया है। यह कोई गैर वाज़िब मांग भी नहीं है?
छात्र जो आन्दोलन कर रहें हैं,वे भी सत्ता द्वारा रोजगार देने के वादे याद दिलाने के लिए तो कर रहें है।
लोकतंत्र में वादों को याद दिलाने के लिए किए जा रहे आंदोलनों को निर्ममतापूर्वक दबाना अलोकतांत्रिक सोच को दर्शाता है।
आज उपर्युक्त मुद्दों पर देशव्यापी व्यापक बहस की आवश्यकता है।
बार बार स्मरण होता है कि,अपने देश की माटी में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता प्राकृतिक रूप से रचिबसी है।
एक ओर देश की जनता महामारी से जूझ रही है ,दूसरी ओर विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की जनता को अधिनायकवादी मानसिकता से लड़ना पड़ रहा है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





