शशिकांत गुप्ते
किसी भी शहर के ट्रैफिक प्वाइंट पर यातायात को नितंत्रित रखने के लिए जब भी देश के भावी कर्णधार युवक युवतियों को देखता हूं। तब मैं अपने जहन में झांक कर अपने अंदर के मानव को खोजने लगता हूं। मानव को खोजने के बाद मै इस बात से आश्वस्त होने के लिए अपना मानस टटोलता हूं, कि मेरे अंदर का नागरिक जागृत है या नहीं?
स्कूल की पढ़ाई के दौरान नागरिक शास्त्र पढ़ा था। लेकिन नागरिक शास्त्र ऐच्छिक विषय था। नागरिक शास्त्र का प्रश्न पत्र भी सिर्फ 20 मार्क का ही होता था।
शिक्षा पद्धति में नागरिक शास्त्र ऐच्छिक विषय रखने के बाद अच्छे और समझदार नागरिक की कल्पना करना ही नासमझी है।
नागरिक की खोज इसलिए भी अधूरी है कि,देश की आवाम भीड़ में सहज ही तब्दील हो जाती है?
बहरहाल मुझे यातायात को नियंत्रित करने के लिए युवा वर्ग को देखकर कतई आश्चर्य नहीं होता है। कारण युवा वर्ग स्वैच्छिक मतलब Voluntary अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा है।
एक ट्रैफिक प्वाइंट पर एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा इन युवाओं को यातायात नियंत्रित करने को क्यों खड़ा किया है?
मैने जवाब दिया ये बेचारे अपनी सेवाएं स्वैच्छिक दे रहें हैं।
उस व्यक्ति ने दूसरा प्रश्न किया,यातायात पुलिस क्या कर रही है?
मैने व्यवहारिक जवाब देते हुए कहा यातायात पुलिस वाहनों के चालान बनाने में व्यस्त हैं।
किसी भी ट्रैफिक प्वाइंट पर खड़े पुलिस कर्मी को कभी किसी ने नागरिकों को यातायात के नियम समझाते हुए देखा है?
ट्रैफिक प्वाइंट पर यातायात पुलिस सिर्फ यह देखने के लिए तैनात होती है,कब कोई वाहन चालक नियमों उल्लंघन करें और हम चालान बनाएं।
चालान बनाते समय वाहन चालक और पुलिस के बीच जो भी वार्तालाभ होता है,वह सिर्फ और सिर्फ नियम तोड़ने वाला वाहन चालक ही समझता है और आपसी सूझ बूझ से समझौता हो जाता है। ऐसा लोगों का कहना है,सबूत किसी के पास नहीं है?
नियम तोड़ने वाला वाहन चालक, यदि चालाक हो तो वह जिस किसी रसूखदार का पठ्ठा होता है,उस रसूखदार को कॉल करता है। रसूखदार के भावपूर्ण संवाद होते हैं।
अपना ही आदमी है छोड़ दिया जाए।
अपने देश में पठ्ठा संस्कृति भी विद्यमान है,यह नहीं भूलना चाहिए।
अंत यही कहा जा सकता है।
यहां वहां जहां तहां सब दूर भीड़ है। भीड़ में नागरिक को खोजना बहुत कठिन कार्य है।
नागरिक को खोजना कब संभव होगा इसी प्रश्न के साथ….पूर्ण विराम।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





