मीना राजपूत
ए एक अस्सी मीटर का मछली पकड़ने का जाल है। जाल सिलने वाले टेलर जब इसे सिलकर तैयार कर लेते हैं तब इसमें बांस का फल्ठा लगता है और जाल मछली पकड़ने के लिए तैयार हो जाता है।
नदी का जाल अलग होता है और पोखरी का जाल अलग बनता है।ये पोखरी का जाल है।जाल से नदी और पोखरी में से तड़पती हुई चाँदी निकलती है जिसे मछली कहते हैं।
पोखरे से मछली पकड़ने में जाल का फेरा लगवाना पड़ता है,नदी में आमतौर पर फेरा लगवाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।नाव से जाकर जाल बांधा भी जाता है और चलती नाव से भी जाल मछलियों को फँसाता चलता है।
हमारे देखने में ही पहले सन और तांत का जाल बनता था,अब नायलान के जाल का राज है।हमारे यहाँ एक सन् बयालीस का जाल है,सिंगापुर से आया था,तांत का है,जस का तस आज भी बना हुआ है।उसी से आज भी ख़ुद के खुदवाए तालाब में मछली पकड़ी जाती है।
हमारे पुराने विरासती तालाब तो आज़ादी बाद ज़मींदारी उन्मूलन में ग्राम समाज में चले गए थे,तभी अपनी ज़मीन में फिर से नया तालाब खुदवाना पड़ा।ताकि मछली के लिए बाज़ार पर निर्भरता ना रहे।
उत्तर में मछली पकड़ने के जाल कपास और ऊन से भी बनते थे।कटिया से मछली कम संख्या में पकड़ी जाती है।जाल से नदी में से हर तरह की मछली पकड़ में आती है।यूपी के बाज़ार में आमतौर पर तालाब की ही ताज़ी मछली मिलती है,नदी से तो इतनी रंग-बिरंगी और विभिन्न प्रजातियों की मछलियाँ पकड़ में आती हैं कि कड़ाही में जब पकती हैं तो एक मछली की नहीं कई मछलियों की लज़्ज़त आती है।
जाल बुनने की कला चीन से हिंदोस्तान आयी।सैकड़ों बरस पहले केरल के राजा के पास चीन के राजा कुबलाई ख़ान के दरबार से एक जाल भेंट स्वरूप आया था।केरल में बहुत पसंद किया गया और केरल के राजा ने जाल बुनने की कला सीखने के लिए अपने यहाँ से कुछ कलाकारों को चीन भेजा।आधुनिक हर किस्म का जाल उसी चीनी जाल की नक़ल है।
उसके पहले भारत में ताड़ के पत्ते समेत तरह-तरह के पत्तों और बाँस से मछली पकड़ने के जाल बनते थे।उत्तर भारत के मैदानों के यूपी के पूरब के हिस्सों में पहले किरात जाति का राज था,किरातों को निषादों ने हराया और अपना राज कायम किया।
किरात हारकर कहाँ गए ये पता नहीं चलता।किरातों के नाम से अकबर के दौर में जौनपुर सरकार में एक परगना किरात मित्तू आबाद था।अब किरात हारे और निषाद जीते तो निषादों का सदियों तक यहाँ राज रहा।उसके बाद हिमालय की तराई से एक जाति आयी जिसका नाम था ‘भर’।
उनमें जो शासक होते वो कहलाते राजभर।अब राजभरों और निषादों में संघर्ष हुआ और राजभर जीत गए।
अब जीतने वाली भर जाति ने इलाक़े की ज़मीनों पर अपना क़ब्ज़ा जमाया लेकिन नदी का अधिकार उन्होंने निषाद जाति को दिया।अब निषाद नदियों के किनारे बस गए और मछली पकड़ने का काम करने लगे।
निषादों को जल परिवहन का भी अधिकार मिला।तब से ये निषाद जाति नदियों के किनारे आबाद है और नदियों से मछली रूपी सफ़ेद चाँदी निकालती है।नदी के किनारे की ज़मीनों पर निषाद खीरा-ककड़ी-तरबूज़-खरबूज़ भी सैकड़ों बरस से बोते आ रहे हैं और उसको बाज़ार में बेचकर अतिरिक्त आय करते हैं।
मल्लाहों की नावों की रक्षा सीयर माता चौरासा देवी करती हैं,इसलिए उनको मल्लाह कुलदेवी मानते हैं।स्थानभेद से कई नामों की कई कुलदेवियों की पूजा होती है।
अमर सिंह और केवल सिंह कोयला देव को मल्लाह सदियों से कुलदेवता के रूप में पूजते आए,स्थानभेद से अन्य भी कुलदेवता हैं।आजकल नए दौर में जब से नई सियासत की लहर आयी,तब से राम को नदी पार कराने वाले गुह्यराज निषाद की जयंती बहुत धूमधाम से मनाई जाने लगी,वरना मेरे देखने में ही पहले इनकी जयंती मनाने का चलन निषादों में नहीं था।निषाद स्थानीय कुलदेवता ही पूजते।
निषाद आमतौर पर रोज़ मछली का सेवन करते हैं।इनकी जेनेटिक ख़ासियत ये देखी गई है कि इनकी त्वचा का रंग गहरा होता है।सिर के बाल जल्दी सफ़ेद नहीं होते।
आँखें भी जल्दी कमज़ोर नहीं होतीं,नज़र काफ़ी उम्र तक तेज़ रहती है।
चेहरे पर झुर्रियाँ भी बाकी जातियों के मुक़ाबले में कम होती हैं और अधिक उम्र में आती हैं।अन्य के मुक़ाबले इनकी औसत उम्र भी अधिक होती है।![]()





