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भाग्य-विधान और ज्योतिष- विज्ञान

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 ज्योतिषाचार्य पवन कुमार

    जो जन्मता है तथा मरता है, उसी का भाग्य होता है। न जन्मने वाले और न मरने वाले का कोई भाग्य नहीं होता। सामान्य मनुष्य के भाग्य का विचार किया जाता है.  परमात्मा वा परमात्मा से एकाकार हुए योगियों/भक्तों के भाग्य का नहीं. योगी, आत्मज्ञानी जन्म मृत्यु से परे होता है. सामान्य मानव इस से आबद्ध.

 इसका कारण स्पष्ट एवं सरल है :

【१ + ८ = ९ । वा,

 ९=१+८। 

अर्थात्

 जन्म + मृत्यु= भाग्य ।

 अथवा, 

भाग्य= जन्म+ मृत्यु ।】

       जन्म लेना सौभाग्य है। मृत्यु होना दुर्भाग्य है। कोई जातक मरना नहीं चाहता। मानव देह दुर्लभ है। यह मिली है तो जीव इसका अधिक से अधिक सदुपयोग करे-पुण्य कर्म करे यह देह मोक्ष का साधन है। मोक्ष में जन्म एवं मृत्यु दोनों का अभाव है।

     इसलिये मुक्त पुरुष का भाग्य नहीं। संबद्ध जीव सौभाग्य एवं दुर्भाग्य दोनों को भोगता है।

ऐसे जीव के लिये सूत्र  है :

【भाग्य = सौभाग्य + दुर्भाग्य।

 वा,

 सौभाग्य + दुर्भाग्य = भाग्य। 】

      ऐसा कौन है जो सौभाग्य भोगे और दुर्भाग्य से बचा रहे, अथवा केवल दुर्भाग्य भोगे और सौभाग्य से वञ्चित रहे ? कोई नहीं। सबको जीवन में सौभाग्य-दुर्भाग्य का सामना करना पड़ता है। यह अटल सत्य है। 

       संख्या १ का स्वामी मंगल है। संख्या ८ का अधिप भी मंगल है। संख्या ९ का पति बृहस्पति है। मंगल और बृहस्पति नैसर्गिक मित्र हैं। अतः सूत्र १ + ८ = ९ से, मंगल बृहस्पति मंगल काल पुरुष का बल है तो बृहस्पति ज्ञान।

अतएव, बल = ज्ञान। अर्थात ज्ञान ही बल है वा बल हो ज्ञान है। इसका अर्थ हुआ ज्ञानी ही बलवान् है जो बलवान् है वही भाग्यवान् है। बल केवल ज्ञान में है। १ आत्मा है।

     “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।’

   ~मुण्डकोपनिषद् (३।२।४)

  (यह आत्मा बलहीन के द्वारा नहीं प्राप्त किया जाता)। 

८ मृत्यु है। 

‘अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते।’

   ~कठोपनिषद् (१। ३। १५.) 

  (जो आत्म तत्व अनादि अनन्त महान् से भी पर (श्रेष्ठ) एवं ध्रुव (अटल) है, उसको जान कर मनुष्य मृत्यु के मुख से मुक्त हो जाता है)।

    ९ ज्ञान है। ९ अंक सबसे बड़ा है। इसलिये ज्ञान सर्वोपरि है क्योंकि, ‘ज्ञाने तिष्ठन्न विभेतीह मृत्योः।’

   ~महाभारत (उद्योगपर्व, ४२ । १६)

 (ज्ञान में अवस्थित हो जाने पर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता)।

 ‘श्रेयसामिह सर्वेषां ज्ञानं निःश्रेयसं परम्।

 सुखं तरति दुष्पारं ज्ञाननीव्यसनार्णवम्॥’ 

   ~भागवतपुराण =४। २४ । ७५)

    (सभी श्रेयस्कर वस्तुओं में ज्ञान सबसे बड़ा श्रेयस्कर है। ज्ञानरूप नौका व्यसन रूप दुष्पार सागर को बड़े आराम से पार कर जाती है)।

   इसलिये ज्ञानी भाग्यशाली है। ज्ञानी को शोक नहीं होता।

“ज्ञानतृप्तो न शोचति।’

   ~ महाभारत (शान्तिपर्व, ३२९ । २४।)

     संख्या १ पुरुष है। संख्या ८ स्त्री है। संख्या ९ नपुंसक है। अतएव सूत्र १ + ८= ९ से, पुरुष+स्त्री= नपुसंक । इससे निष्कर्ष निकला कि ज्ञान नपुंसक है। इसमें स्त्री एवं पुरुष तत्व समान रूप से तथा परिपूर्णता के साथ विद्यमान है। ज्ञानी का स्त्री एवं पुरुष तत्व पर समान अधिकार होता है।

      वह स्त्री और पुरुष भाव को अपने में समाहित किये हुए उनमें उदासीन तथा अभेद दृष्टि रखता है। भगवान् कृष्ण कहते हैं, ज्ञानी तो मेरा आत्मा है। 

 ‘ज्ञानी तत्वात्यैव मे मतम्।’

   ~गीता (७ १८)

तथा,

“प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय।’ 

  ~गीता (७। १७)

 (ज्ञानियों के लिये मैं अत्यन्त प्रिय हूँ तथा मेरे लिये ज्ञानी अत्यन्त प्रिय है)।

     ज्ञानी को शोक क्यों नहीं होता ? ज्ञान क्या है ? अब इस पर में विचार करता हूँ।

 यदि कोई यह जान ले कि अन्न ब्रह्म है, बस अन्न है, सब कुछ अन्न है, अन्न को अन्न खा रहा है, अन्न से अन्न उत्पन हो रहा है, जीव अन्न है, अन्न जीव है, भोक्ता और भोग्य दोनों अन्न होने से एक हैं, यह एक ब्रह्म है, तो वह ज्ञानी है, वह शोक को भारत नहीं होता। यही ज्ञान है।

   ‘बह्म सर्व जग वस्तु पिण्डमेकमखण्डितम्।   

  ~योगवासिष्ठोपनिषद् (उ ६७ ॥३६)

 (यह जो जगत् रूपी एक अखण्डित पिण्ड रूप वस्तु है, वह सब कुछ ब्रह्म ही है।) 

   ‘अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।’

   ~तैत्तिरीयोपनिषद् (३ । २।१)

 (अन्न ब्रह्म है ऐसा जाना गया है)। 

सब कुछ अन्न कैसे हुआ ? यह विचारणीय है।

 प्रकृति विस्तार को प्राप्त होती है, इसलिये प्रकृति या है। प्रकृति विकार को प्राप्त होती है, इसलिये विकार/ विकृति बह्म है। प्रकृति से महत् तत्व, महत्तत्व से अहंकार, अहंकार के सत्व भाग से मन, रजस् भाग से सभी इन्द्रियां (५ कर्मेन्द्रिय+ ५ ज्ञानेन्द्रिय) तमो भाग से तन्मात्रा (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध): पञ्चतन्मात्रा से पचभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी), पञ्चभूतों से चराचर दृश्य जगत् पैदा होता है।

    विकास का अर्थ है मल जो जिससे उत्पन्न होता है, वह उसका विकार वा मल है। महत्तत्व (बुद्धि) प्रकृति का भल है। प्रकृति प्रधान है। अहंकार, महत्तत्व का मल है। मन, सात्विक अहंकार का मल है। इन्द्रियाँ राजस अहंकार की मल हैं। तन्मात्राएँ, तामस अहंकार को मल हैं। भूत, वन्मात्रा के मल हैं। चराचर सृष्टि भूतों की मल है। मल= अपत्य, सुत, पुत्र मल सबको प्रिय है।

     सब मल है, मल में जी रहे हैं, मल खा रहे हैं, मल फैला रहे हैं, कर रहे हैं, है उगल रहे हैं, बटोर रहे हैं। मल मूल्यवान् है मल में दुर्गन्ध एवं सुगन्ध दोनों है। एक ही मल में किसी को सुगन्ध मिलती है। तो किसी को दुर्गन्ध यही मल का ब्रह्मत्व है। 

 आकाश का मल वायु है। वायु का मल तेज है। तेज का मल जल है। जल का मल भूमि है। भूमि का मल वनस्पति है। वनस्पति का मल फल, बीज है। फल, बीज जीवों के खाद्य पदार्थ हैं। जीवों द्वारा उज्सर्जित मल को अन्य जीव खाते हैं। जीव भी मल है। जीव, जीव का भोजन है। 

   ‘जीवो जीवस्य भोजनम्।’

   ~वेदव्यास

(जीव ही जीव के जीवन का साधन है)

        सभी जीव पृथ्वी के मल हैं। पृथ्वी उनके शरीरों को पचा जाती है। मनुष्य का दुर्गन्धित मल सुअर रखता है, बड़े चाव से सूअर मल (मांस) को मनुष्य खता है। मनुष्य की खखार कफ नाक चूक मछली स्वाद पूर्वक खाती है। इससे बने मछली के मांस पिण्ड को मनुष्य खाता है।

       मनुष्य का मल खाने वाला कोट बड़ा सुन्दर होता है। इससे सिद्ध है कि मल में सौन्दर्य है। इस सौन्दर्य में आनन्द है। आनन्द ब्रह्म है।

   ‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्।’

   ~तैतिरीय उपनिषद (३ । ६ । १)

     मल के महण में आनन्द है। मल के त्याग में आनन्द है। बिना प्रहण के त्याग होता नहीं। ग्रहण किया जाय पर त्याग न किया जाय तो दुःख की प्राप्ति अनिवार्य है। भोजन करने वाला मल त्याग न करे तो उसको क्या दशा होगी ? जो इसकी दशा होगी, ठीक वही दशा उस व्यक्ति की होती है जो सम्पत्ति अर्जित करता है किन्तु दान नहीं करता।

     धन ब्रह्म है। धन को बांधा नहीं जा सकता। इसे बाँधने का यन करने वाला अहंकारी मूर्ख है। यशोदा ने कृष्ण को बाँधना चाहा, वे बंधे नहीं गोपियों ने उन्हें बाँधना चाहा, बंधे नहीं, मथुरा चले गये। समस्त विश्व धन है, धन मल है, मल अन्न है, अन्न ब्रह्म है, ब्रह्म जीव है। 

     नवम भाव के सन्दर्भ में मैंने ब्रह्म विद्या का प्रवचन किया। कौन स्त्री है ? कौन पुरुष है ? यहाँ इसकी कोई गणना नहीं। स्त्री और पुरुष मिलकर पूर्ण ब्रह्म हैं, अकेले नहीं। यह पूर्ण ब्रह्म नपुंसक है ही जैसे ४ स्त्री + ५ पुरुष + ८ सी = ९ नपुंसक पूर्ण ब्रह्म। २ स्त्री ७ पुरुष = ९ नपुंसक पूर्ण ब्रह्म १ पुरुष = ९ नपुंसक पूर्ण ब्रह्म किन्तु ३ नपुंसक + ६ नपुंसक = ९ नपुंसक केवल ब्रह्म। यह ज्ञान है। ज्ञानाय नमः। (चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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