भारत महापुरुषों, वीरों और शहीदों का देश है। अत्याचार के खिलाफ लड़ना और आजादी के लिए अपने
प्राणों की आहुति देना, हमारी रीत रही है। जब देश की स्वतंत्रता के लिये आंदोलन चल रहा था तब
अनेक नौजवानों ने ‘स्वराज’ का सपना देखते हुए फांसी के फंदे को अपने गले लगा लिया था। भारत
में स्वराज शब्द का अर्थ स्वशासन तक सीमित नहीं था, बल्कि स्वराज शब्द संपूर्ण भारत को स्वतंत्र
कराने और अपनी पद्धति से चलाने से जुड़ा हुआ था। खुद को तिल-तिल जलाकर देश में आजादी का
सूर्योदय करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों व देश की रक्षा के लिए सर्वस्व अर्पण करते हुए देश के कई
महापुरुषों ने अपनी जवानी जेलों में खपा दी थी। देश भर में चल रहा आजादी का अमृत महोत्सव
जन जन का महोत्सव बन गया है। आज बच्चा-बच्चा हाथ में तिरंगा लेकर घूमता है जो उसके मन
में राष्ट्रप्रेम की भावना जागती है। आजादी के अमृत महोत्सव के माध्यम से हम उन महान हस्तियों
को याद कर रहे हैं, जिन्होंने देश की आजादी में दिया था अपना महत्वपूर्ण योगदान……
शेख भिखारी…गोलियां खत्म हुईं तो पत्थरों से लड़ी लड़ाई
जन्म : 2 अक्टूबर 1819, मृत्यु : 8 जनवरी 1858

1857 की क्रांति ने पूरे देश में आजादी की चिंगारी सुलगा दी थी। आजादी की इस लड़ाई में
छोटानागपुर के पठार भी गवाह बने। यहां के वीर शेख भिखारी ने भी इस क्रांति में अहम भूमिका
निभाई थी। शेख भि खारी का जन्म 2 अक्टूबर 1819 को रांची के ओरमांझी प्रखंड की कुटे पंचायत
स्थित खुदिया लोटा गांव में हुआ था। बचपन से ही वह चतुर और शिकार के शौकीन थे। 20 वर्ष की
उम्र में वे बड़कागढ़ जगन्नाथपुर के राजा विश्वनाथन शाहदेव के यहां नौकरी करने लगे। उनकी
प्रतिभा और शौर्य को देखते हुए उन्हें दीवान पद पर नियुक्त कर बड़कागढ़ की फौज का कार्यभार
सौंपा गया। 1856 में जब अंग्रेजों ने भारतीय राजा, महाराजाओं और नवाबों की रियासतें हड़पने की
नीति अपनाई तो इसकी भनक राजा विश्वनाथ शाहदेव को भी लगी। उन्होंने शेख भिखारी सहित
अन्य लोगों से विचार-विमर्श किया, जिसके बाद अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा लेने की बात तय हुई, फिर
जगदीशपुर के राजा बाबू कुंवर सिंह के साथ पत्राचार किया गया। इसी बीच, शेख भिखारी ने बड़कागढ़
की फौज के लिए रांची एवं चाईबासा के नौजवानों की भर्ती शुरू कर दी। अंग्रेजों ने अचानक 1857 में
चढ़ाई कर दी तब शेख भिखारी चुट्टूपालू घाटी आ गए। जब अंग्रेजों की फौज चुट्टूपालू के पहाड़ी
रास्ते से रांची के पलटुवार पर चढ़ने की कोशिश करने लगी तो शेख भिखारी ने उनका रास्ता रोक
दिया। उन्होंने चुट्टूपालू की घाटी पार करने वाले पुल को तोड़ दिया और सड़क पर पेड़ों को डालकर
रास्ता जाम कर दिया। शेख भिखारी की फौज ने गोलियों की बौछार कर अंग्रेजों को मुश्किल में डाल
दिया। यह लड़ाई कई दिनों तक चली। जब शेख भिखारी के पास गोलियां खत्म होने लगीं तो उन्होंने
अपनी फौज को ऊंचाई से बड़े-बड़े पत्थर लुढ़काने का आदेश दिया, इससे अंग्रेज फौजी कुचलकर मरने
लगे। यह देखकर अंग्रेज अधिकारियों ने चुट्टूपालू घाटी पर चढ़ने के लिए दूसरा रास्ता तलाशा। फिर
वे उस खुफिया रास्ते से चुट्टूपालू घाटी पहाड़ पर चढ़ गए। इसकी खबर शेख भिखारी को नहीं हो
सकी। अंग्रेजों ने शेख भिखारी को 6 जनवरी, 1858 को घेरकर गिरफ्तार कर लिया। 7 जनवरी को
उन्हें फांसी की सजा सुनाई। 8 जनवरी 1858 को उन्हें फांसी दे दी गई। 15 नवंबर 2021 को झारखंड
में भगवान बिरसा मुंडा स्मृति उद्यान-स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय के उद्घाटन के अवसर पर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शेख भिखारी को याद किया था और कहा था, “ऐसे कितने ही स्वाधीनता
सेनानी थे जिन्होंने अपना सब कुछ बलिदान कर आजादी की लड़ाई को आगे बढ़ाया। इन महान
आत्माओं के इस योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। इनकी गौरवगाथाएं, इनका इतिहास हमारे
भारत को नया भारत बनाने की ऊर्जा देगा।” इस वीर स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर हजारीबाग में शेख
भिखारी मेडिकल कॉलेज की स्थापना भी की गई है।
अंग्रेजों ने शेख भिखारी को 6 जनवरी, 1858 को घेरकर गिरफ्तार कर लिया। 7 जनवरी को उन्हें
फांसी की सजा सुनाई। 8 जनवरी 1858 को उन्हें फांसी दे दी गई।
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मिनजुर भक्तवत्सलम…महात्मा गांधी और अिहंसा के सिद्धांत के कट्टर समर्थक
जन्म : 9 अक्टूबर 1897, मृत्यु : 1987

व कील, राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी मिनजुर भक्तवत्सलम दक्षिण भारत के एक महान स्वतंत्रता
सेनानी थे। उनका जन्म 9 अक्टूबर 1897 को मद्रास प्रेसीडेंसी में हुआ था। बचपन से ही मेधावी छात्र
रहे भक्तवत्सलम भारत में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन से दूर नहीं रह सके थे और बहुत कम उम्र में
ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। बाद में, वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए
और 1922 में मद्रास प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने। आजादी के आंदोलनों में भाग लेने के साथ
ही, उन्होंने कानून की पढ़ाई भी की और मद्रास उच्च न्यायालय में एक वकील के रूप में काम करना
भी शुरू किया। उन्होंने एनी बेसेंट के होमरूल लीग और रॉलेट एक्ट के विरोध में चलाए गए आंदोलन
में भी भाग लिया। उसी समय वे चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के संपर्क में आए और महात्मा गांधी से
प्रभावित हुए।
उन्होंने 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन, 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में
जेल की यातनाएं भी सही। मिनजुर भक्तवत्सलम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और उनके अहिंसा के
सिद्धांत के कट्टर समर्थक थे। नमक कर के विरोध में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए गए दांडी
मार्च की तरह ही उन्होंने वेदारण्यम मार्च चलाया और उसकी अगुवाई की। इस दौरान वे वेदारण्यम में
घायल भी हुए थे। 1932 में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े समारोह के आयोजन के लिए अंग्रेजों ने उन्हें
गिरफ्तार कर लिया था और छह महीने तक जेल में रखा था। इसके अलावा, भारत छोड़ो आंदोलन में
भाग लेने के कारण भी अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया था। आजादी के आंदोलन में भाग लेने के
दौरान भक्तवत्सलम ने ‘इंडिया’ नामक एक दैनिक समाचार पत्र शुरू किया जिसे उन्होंने 1933 तक
चलाया।
1936 के नगर निकाय चुनावों में भक्तवत्सलम मद्रास सिटी कॉरपोरेशन के लिए चुने गए और डिप्टी
मेयर के रूप में कार्य किया। 40 वर्ष की आयु में, वह सफलतापूर्वक थिरुवल्लूर सीट जीतकर मद्रास
विधानसभा के लिए चुने गए। उन्होंने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी सरकार में स्थानीय स्वशासन मंत्री के
संसदीय सचिव के रूप में कार्य किया। हालांकि, द्वितीय विश्व युद्ध की घोषणा पर भारतीय राष्ट्रीय
कांग्रेस के अन्य पदाधिकारियों के साथ उन्होंने इस्तीफा दे दिया। वह 1947 में जब मद्रास विधान
सभा के लिए फिर चुने गए तो ओपी रामास्वामी रेड्डीयार सरकार में मंत्री के रूप में भी कार्य किया।
भारत की आजादी के बाद, 1957 में भक्तवत्सलम श्रीपेरंबदूर सीट से निर्वाचित हुए। उन्होंने 1963 से
1967 तक वर्तमान तमिलनाडु, मद्रास प्रेसीडेंसी के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। 1967 के बाद,
भक्तवत्सलम ने आंशिक रूप से राजनीति से संन्यास ले लिया। 1987 में 89 वर्ष की आयु में उनका
निधन हो गया।
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पेरिन बेन कैप्टन: महात्मा गांधी की अनुयायी, जिन्होंने आजीवन की देश की सेवा
जन्म : 12 अक्टूबर 1888, मृत्यु : 1958

स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक कार्यकर्ता पेरिन बेन कैप्टन, प्रसिद्ध भारतीय बुद्धिजीवी और ‘भारत
के वयोवृद्ध पुरुष’ कहे जाने वाले दादाभाई नौरोजी की पोती थीं। इस कारण पेरिन बेन को बचपन में
घर पर ही वह माहौल मिला जिसके कारण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की तरफ उनका सहज झुकाव
रहा। पेरिन बेन महात्मा गांधी के आदर्शों से काफी प्रभावित थीं। उनका जन्म 12 अक्टूबर 1888 को
गुजरात में कच्छ जिले के मांडवी में हुआ था। बचपन में ही उन्होंने पिता को खो दिया था। उनकी
शुरूआती पढ़ाई-लिखाई बॉम्बे में हुई लेकिन बाद में वह अध्ययन के लिए पेरिस चली गई। यहीं से
उनके स्वतंत्रता सेनानी बनने की शुरुआत हुई। पेरिस में पढ़ाई के दौरान ही वह मैडम भीकाजी कामा
के संपर्क में आई और राष्ट्रवादी गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया। विदेश में वह लाला
हरदयाल, श्यामजी कृष्ण वर्मा जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में भी आईं। कहा जाता है कि जब विनायक
दामोदर सावरकर को लंदन में ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था तो उन्हें छुड़वाने के लिए
पेरिन बेन ने अथक प्रयास किया था। 1911 में जब वह वापस भारत आईं तो उन्हें यहां अंग्रेजों के
भेदभाव का बड़ा अपमानजनक अनुभव हुआ। इसके बाद वह महात्मा गांधी से मिली और उनके
आदर्शों से बहुत प्रभावित हुईं। 1919 में उन्होंने महात्मा गांधी के साथ काम करना शुरू कर दिया।
1920 में वह स्वदेशी आंदोलन में शामिल हो गईं और खादी पहनना शुरू कर दिया। 1921 में उन्होंने
राष्ट्रीय स्त्री सभा स्थापित करने में सहायता की जो गांधीवादी आदर्शों पर आधारित एक महिला
संगठन था। साल 1925 में पेरिन ने धुनजीशा एस कैप्टन से विवाह किया जो पेशे से एक वकील थे।
शादी के बाद भी वे राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय बनी रहीं।
इतना ही नहीं, पेरिन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कई परिषदों में काम किया और 1930 में बॉम्बे
प्रांतीय कांग्रेस कमेटी की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए गए
सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी भाग लिया और जेल गईं। 1930 में जब गांधी सेवा सेना का पुनर्गठन
किया गया तो उन्हें इसकी मानद महासचिव बनाया गया। 1958 में मृत्यु तक वह इसी पद पर रहीं।
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भूलाभाई देसाई : जिन्होंने आजाद हिंद फौज
के तीन सैनिकों के लिए की थी वकालत
जन्म : 13 अक्टूबर, 1877, मृत्यु : 6 मई 1946

भूलाभाई देसाई प्रख्यात विधिवेत्ता, प्रमुख संसदीय नेता और महात्मा गांधी के विश्वस्त सहयोगी थे। वे
आजाद हिंद फौज के तीन सैनिकों शाहनवाज खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों के
बचाव के लिए याद किए जाते हैं, जिन पर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान राजद्रोह का आरोप लगाया
गया था। राजद्रोह के मुकदमे में सैनिकों का पक्ष-समर्थन भूलाभाई देसाई ने जिस कुशलता और
योग्यता से किया था, उससे उनकी कीर्ति देश में ही नहीं, विदेश में भी फैल गई थी। भूलाभाई देसाई
का जन्म 13 अक्टूबर, 1877 को हुआ था। उन्होंने अपना राजनीतिक जीवन एनी बेसेंट की ऑल
इंडिया होम रूल लीग के साथ शुरू किया। वे शुरू में भारतीय मामलों में ब्रिटिश प्रभाव के समर्थक थे,
लेकिन उन्होंने साइमन कमीशन का विरोध किया।
1928 में सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में बारडोली सत्याग्रह के बाद ब्रिटिश सरकार की पूछताछ
में उन्होंने गुजरात के किसानों का प्रतिनिधित्व किया। इस संघर्ष में उन्हें महत्वपूर्ण सफलता मिली।
देसाई 1930 में औपचारिक रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। उन्होंने स्वदेशी सभा बनाई
और 80 कपड़ा मिलों को इसमें शामिल होने के लिए मनाया। इसका उद्देश्य भारतीय कंपनियों द्वारा
विदेशी सामान का बहिष्कार करना था। अंग्रेजों ने स्वदेशी सभा को अवैध घोषित कर दिया और
भूलाभाई की गतिविधियों के कारण 1932 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया। जब कांग्रेस कार्यकारिणी का
पुनर्गठन हुआ, तो सरदार वल्लभभाई पटेल के कहने पर भूलाभाई को कार्यकारिणी में शामिल किया
गया। नवंबर, 1934 में भूलाभाई को गुजरात से केंद्रीय विधान सभा के लिए चुना गया। भूलाभाई ने
मनमाने ढंग से दूसरे विश्व युद्ध में भारत और भारतीय सैनिकों को शामिल करने का विरोध किया
और 19 नवंबर, 1940 को सदन को संबोधन में कहा कि जब तक युद्ध भारतीय न हो तब तक भारत
का समर्थन प्राप्त करना असंभव है। उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन में हिस्सा लिया और
10 दिसंबर को उन्हें भारत रक्षा अधिनियम के अंतर्गत गिरफ्तार कर यरवदा केंद्रीय कारागार भेज
दिया गया। सितंबर, 1941 में देसाई को खराब स्वास्थ्य के आधार पर जेल से रिहा कर दिया गया।
1945 में जब आजाद हिंद फौज के तीन अधिकारी – शाहनवाज, ढिल्लन और सहगल पर राजद्रोह का
मुकदमा चलाया गया तो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 17 वकीलों की रक्षा समिति बनाई। भूलाभाई
तीनों अधिकारियों के बचाव में लगी उस समिति का नेतृत्व कर रहे थे। खराब स्वास्थ्य की परवाह न
करते हुए देसाई ने आजाद हिंद फौज के अधिकारियों के बचाव में जोरदार तर्क रखे, लेकिन ब्रिटिश
जजों ने तीनों को दोषी माना और आजीवन कारावास की सजा सुनाई। बाद में भारत सरकार ने उन्हें
रिहा किया। एक जुलाई, 2017 को चार्टर्ड एकाउंटेंट दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भूलाभाई देसाई
को एक ऐसे वकील के रूप में याद किया था जिन्होंने देशभक्ति से प्रेरित होकर देश की आजादी के
लिए अपनी जिंदगी खपा दी।
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