शशिकांत गुप्ते
राजनीति दिन-ब-दिन बहुत मनोरंजक होती जा रही है।
प्रायः कहा जाता है कि, सत्य कडवा होता है। इसका मतलब यह कतई नहीं समझना चाहिए कि,झूठ मीठा होता है।
इनदिनों एक बहुत ही मनोरंजक जुमला सुनने को मिला है।Sweet आतंकी। आतंकी भी अंग्रेजी का Sweet हो सकता है।
आतंक और मीठा वाह क्या विरोधाभासी उपमा है? यदि इस उपमा को मान्यता देतें हैं तो करेला नीम चढ़ा वाली कहावत बदनली पड़ेगी। करेला शक्कर चढ़ा कहना पड़ेगा?
कल कोई आपराधिक प्रवृत्ति का व्यक्ति कहेगा कि, मैं Swee अपराधी हूँ।
ऐसे अपराधी के लिए कानूनव्यवस्था के समक्ष एक नई उलझन पैदा हो जाएगी? क्या कोई भी सज़ा Sweet सज़ा हो सकती है?
राजनीति में ना सिर्फ सक्रिय बल्कि संवैधानिक पद पर विराजमान व्यक्ति के द्वारा,ऐसे वक्तव्य सुनकर यह कहावत सच साबित होती है। Every thing fair in love,war,game and politics.
प्यार,युद्ध,खेल और राजनीति में सब जायज़ है।
राजनीति में ये कहावत चरितार्थ होते हुए प्रत्यक्ष दिखाई दे रही है। तकरीबन सभी राजनैतिक दल आपराधिक छबि वाले और जिन लोगो पर न्यायलय में मुकदमें विचाराधीन है। ऐसे व्यक्तियों को निःसंकोच चुनाव में उम्मीदवार बनाया जाता है।
आश्चर्य होता है,जो लोग अपने दल स्वयं के संगठन को Party with deference. का खिताब भी स्वयं ही देते हैं। इस पार्टी की उम्मीदवारों की सूची में भी आपराधिक छबि वाले उम्मीदवार होतें हैं?
आपराधिक छबि तक तो ठीक है। अब तो हद हो गई है,राजनीति में स्वयं को Sweet आतंकी कहलाने में गर्व का अनुभव हो रहा है।
Sweet आतंकी कहलाने को न्यायोचित ठहराने में तर्क भी दिलचस्प दिया जाता है।
सूबे के लोगों को मुफ्त खैरात बांटने के साथ मुफ्त तीर्थयात्रा करवाने की घोषणा को भी अभिमान के साथ प्रकट किया जाता है। मुफ्त बांटने की प्रक्रिया को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है। मानो स्वयं की जेब से धन खर्च कर फर्ज पूरा किया जा रहा है?
इस संदर्भ के एक वाकया याद आता है।
पचास और साठ के दशक में एक दस्यु बहुत मशहूर था। उसका नाम मानसिंह था। इस दस्यु के बारें में यह कहा जाता था कि यह दस्यु अमीरों को लूट कर गरीबो की मदद करता था। लेकिन इसे डाकू मानसिंह ही संबोधित किया जाता था।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





