सही बात है
गांधी तुम्हारे महात्मा नहीं हो सकते,
और न ही तुम्हारे राष्ट्रपिता।
वो तो टैगोर के महात्मा थे,
और सुभाष की नज़र में राष्ट्रपिता।
इसे समझने के लिए तुम्हें टैगोर की ‘Nationalism’
और सुभाष की ‘तरुणाई के स्वप्न’ पढ़नी पड़ेगी।
लेकिन दिक्कत यह है कि
इतिहास तुम्हारा विषय है ही नहीं।
सही बात है, आज़ादी चरखे से नहीं आई।
यह सच है, क्योंकि चरखा क्या था,
यह समझने के लिए तुम्हें विनोबा भावे और उनके भूदान आंदोलन को समझना होगा।
असल में, तुम किसी तरफ न थे, न हो
न सुभाष के साथ,
न भगत सिंह के,
न टैगोर के,
और न ही विनोबा भावे के।
तुम तो इनके विरोध में, अंग्रेज़ी राज के साथ थे।
जो इनके साथ थे उन्हें गांधी से कभी समस्या नहीं थी।
तुम बस भीड़ हो,
और तुम्हारा इस्तेमाल भी भीड़ की तरह ही हो रहा है।
और याद रखो
भीड़ का कोई धर्म नहीं होता।
यह कहना कि “गांधी हमारे महात्मा नहीं हैं” इतिहास की अज्ञानता का प्रतीक है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर, नोबेल विजेता, राष्ट्रवादी और मानवतावादी,
ने सबसे पहले मोहनदास करमचंद गांधी को “महात्मा” की उपाधि दी थी।
1915 में गांधी के दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने पर,
टैगोर ने उनके नैतिक साहस और अहिंसक विचारधारा को देखकर उन्हें “महात्मा” कहा।
“Whereas most people fight with arms, Gandhi fights with truth – satya. He is a Mahatma.”
- Rabindranath Tagore
इसी प्रकार नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 1944 में रंगून रेडियो पर
गांधी को “राष्ट्रपिता” कहकर संबोधित किया था, जब उन्होंने कहा
“Give me blood and I will give you freedom…
और राष्ट्रपिता गांधीजी को हम एक दिन आज़ाद भारत में लाकर दम लेंगे।
यानी गांधी किसी संघ, भाजपा या मोदी सरकार के टैग से नहीं,
बल्कि अपने समय के बुद्धिजीवियों और क्रांतिकारियों की दृष्टि में महात्मा और राष्ट्रपिता बने।
यह धारणा फैलाई जाती है कि गांधी का रास्ता क्रांतिकारियों के विरुद्ध था, यह कोरी बकवास और अधूरा सच है।
महात्मा गांधी ने हिंसा के विरुद्ध नैतिक विरोध ज़रूर जताया, पर उन्होंने भगत सिंह के लिए दया याचिका भी ब्रिटिश सरकार को भेजी थी। उन्होंने क्रांतिकारियों के उद्देश्य को नकारा नहीं, बस उनके तौर तरीके और साधनों से असहमति रखी।
गांधी, Young India, 1929:
“Bhagat Singh is as much a patriot as any of us. But I cannot support his methods.”
इसलिए यह कहना कि “अगर आप भगत सिंह या सुभाष के समर्थक हैं तो गांधी विरोधी ही होंगे, यह एक ऐतिहासिक प्रोपेगंडा है।
संघ-भाजपा वाले कहते हैं “चरखे से आज़ादी नहीं आई।” शुद्ध रूप से देखा जाए तो ऐसा ही प्रतीत होता है क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्य को सत्ता से हटाने में चरखा कोई सैन्य या प्रशासनिक अस्त्र नहीं था।
परंतु चरखा एक प्रतीक था, आत्मनिर्भरता, स्वदेशी, और औपनिवेशिक आर्थिक शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध का, एक आंदोलन का, अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति और संघर्ष का..
ब्रिटिश शासन भारत से कच्चा माल ले जाकर इंग्लैंड में वस्त्र बनाते थे और फिर उन्हें भारत में बेचते थे, गांधी ने चरखे को केंद्र में रखकर इस चक्र को तोड़ने का प्रयास किया।
विनोबा भावे, गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी थे, उन्होंने भूदान आंदोलन के माध्यम से इस विचार को और आगे बढ़ाया।
उन्होंने स्वेच्छा से ज़मीन दान में लेने का अभियान चलाया
जो भारत के सामाजिक आर्थिक असंतुलन को गांधीवादी तरीके से हल करने का प्रयास था।
भूदान आंदोलन (1951–1970): लगभग 70 लाख एकड़ ज़मीन दान में मिली- बिना एक गोली चले।
तो यदि आप कहते हैं कि “चरखे से आज़ादी नहीं आई”,
तो आप गांधी के प्रतीकवाद, अर्थनीति और सामाजिक दर्शन को नहीं समझते।
संघ भाजपा आरएसएस, पुनः तुमसे सवाल है
तुम किसके साथ थे?
यदि तुम सुभाष चंद्र बोस के साथ होते तो गांधी का सम्मान करते, क्योंकि नेताजी ने गांधी की का हमेशा सम्मान किया।
यदि तुम भगत सिंह के साथ होते तो ‘Why I Am An Atheist’ और ‘Jail Notebooks’ पढ़ते।
यदि तुम टैगोर के साथ होते तो राष्ट्रवाद की आलोचना भी करते, जैसा टैगोर ने किया।
यदि तुम विनोबा भावे के साथ होते तो तुम्हारे विचारों में अहिंसा और करुणा होती।
लेकिन अगर तुम इनमें से किसी के नहीं हो
तो तुम किसके हो?
इतिहास तो यही कहता है कि तुम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में किसी के साथ नहीं थे
तुम अंग्रेजों के साथ थे
तुम सत्ता के साथ थे
तुम जमींदारों के साथ थे
तुम फूट डालो और राज करो की राजनीति के साथ थे..
और आज तुम क्या हो?
सिर्फ एक भीड़ हो
जो कभी दलितों पर मोबलिंचिंग के रूप में टूट पड़ते हो
जो कभी मस्जिद की दीवारों पर चढ़कर नफरती नारे लगाते हो
आज तुम्हारी सरकार है लेकिन फिर भी
तुम सिर्फ एक भीड़ हो
तुम्हारे पास न कोई वैचारिक आधार है
न कोई ऐतिहासिक अध्ययन है
न कोई नैतिक दिशा है
न कोई नैतिक शिक्षा है
न तुम सत्य की राह पर चल सकते
न ही ईमानदारी की राह पर
बस एक भ्रम है
कि तुम किसी “सच्चाई” के साथ हो
भ्रम है कि तुम
किसी राष्ट्रवाद के रक्षक हो।
पर सच यह है
भीड़ का कोई विचार नहीं होता।
भीड़ का कोई धर्म नहीं होता।
भीड़ सिर्फ़ इस्तेमाल होती है सत्ता के लिए, नफ़रत के लिए, एजेंडे के लिए।
यदि तुम्हें गांधी से समस्या है
तो पहले टैगोर, सुभाष, भगत सिंह और विनोबा भावे को पढ़ो।
अगर तब भी गांधी से असहमति रहे
तो वह बौद्धिक असहमति होगी न कि अज्ञानता की।
वरना तुम्हारी समस्या गांधी से नहीं है
तुम्हारी समस्या ज्ञान से है।
यह जानते हुए कि तुम कभी नहीं पढ़ेंगे फिर भी एक अपील है कि तुम इन किताबों को पढ़ो..
- Tagore – Nationalism (1917)
- Subhash Chandra Bose – Tarunai ke Swapn (Bouthik Atmar Darshan)
- Gandhi – Hind Swaraj (1909)
- Bhagat Singh – Why I Am An Atheist (1930)
- Vinoba Bhave – Talks on Gita और भूदान आंदोलन पर साहित्य
साभार
Singh Bhu Sir (मूल पोस्ट)
Sharma Amrendra(शेयर)
Ajay Gangwar (शेयर)
सोजन्य-विरेन्द भदोरिया





