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प्रेम की गंगा……?

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शशिकांत गुप्ते

सन 1964 में प्रदर्शित फ़िल्म संत ज्ञानेश्वर के इस गीत को सुनकर मन एकदम दार्शनिक हो जाता है।
ज्योत से ज्योत जगाते चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो

संत ज्ञानेश्वरजी ने मात्र 22 वर्ष की आयु में समाधि ले ली थी।
संत ज्ञानेश्वरजी तेरावी सदी में कहा है, हे विश्व ची माझे घर
अर्थात सम्पूर्ण विश्व मेरा घर है।यह सोच वसुधैवकुटुम्बकम की अवधारणा को मूर्तरूप देने की सार्थक पहल है।
संत ज्ञानेश्वरजी पर बनी फिल्म का यह गीत भजन के रूप में गाया जाता है।
ज्योत से ज्योत जगाते चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो

दीपक की ज्योत स्वऊर्जा से प्रज्ज्वलित होती है। एक दीपक से दूसरा,दूसरे से तीसरा इस तरह श्रृंखलाबद्ध दीपक जला सकतें है।
इसी प्रक्रिया को वैचारिक क्रांति का प्रतीक है।
प्रेम की गंगा बहाने का संदेश संत ज्ञानेश्वरजी दिया है। वर्तमान में बहुत से ज्ञानचंद प्रेम की गंगा बहाने बजाए वैमनस्यता को फैला दे रहें हैं?
महामारी के अभिषाप के शिकार मानवों के शव गंगा में जल समाधि का पुण्य कमाते नजर आ रहे थे।
गंगा का पानी अमृत है। ऐसे अमृत तुल्य पानी में जल समाधि प्राप्त होना निश्चित ही संचित पुण्यकर्मों का ही फल मानना चाहिए?
संत ज्ञानेश्वरजी पर निर्मित फ़िल्म के गीत की यह पंक्तिया दार्शनिक संदेश देती है।
जिसका न कोई संगी साथी
ईश्वर है रखवाला

जो निर्धन है जो निर्बल है
वो है प्रभु का प्यारा

वर्तमान में सबका साथ सबका विकार और सबका विश्वास अर्जित करने का संकल्प विज्ञापनों में कैद होकर रह गया है।
वर्तमान में जो निर्बल और निर्धन है। वह जीते जी ही प्रभु का प्यारा हो जाता है। कारण बुनियादी समस्याओं से घिरे हुए आमजन की स्थिति जिंदा रखा मगर जिंदगी छीन ली जैसे हो गई है।
सारी समस्याओं को ताक में रखकर यह नहीं भूलना चाहिए कि,देश की बागडोर अस्थावान लोगो पवित्र हाथों में है।
विरोधियों द्वारा सिर्फ विरोध करने के लिए यह कहा जा रहा है कि,आज
छाया है चारों और अँधेरा*
भटक गयी है दिशाएं
मानव बन बैठा दानव
किसको व्यथा सुनाएँ

विपक्ष को ऐसी निराशाजनक सोच नही रखना चाहिए।
सकारात्मक सोच बनाए रखो।
साकारत्मकता की ओर बढ़ते कदम स्पष्ट दिखाई दे रहें हैं।
धीरे धीरे महंगाई का सपोर्ट करने वालों की संख्या बढ़ ही रही है।
मुफ्त तीर्थयात्रा का लुफ्त उठातें हुए देश के नागरिक मरणोपरांत मोक्ष प्राप्ति के अधिकारी बन रहे हैं।
देश के प्रति सभी देशवासियों को नमकहलाली फर्ज अदा करना चाहिए।
सम्भवतः इसीलिए धार्मिक आस्थावान लोग हलाल पर हमला बोल रहें हैं।
लोगों को सामिष भोजन करना होतो झटके का ही खाना चाहिए।
ऐसा धार्मिक लोगों का संदेश है।
इस विषय पर ज्यादा कुछ लिखने के बजाए उक्त की गीत पंक्तिया पुनः दोहरातें हैं।
ज्योत से ज्योत जगाते चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो

प्रेम की गंगा जरूर बहेगी कारण पिछले दशक में गंगा स्वयं अवतरित हुई है और अपने चहेते व्यक्ति को स्वयं गंगा ने पुकार लगाई है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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