पुष्पा गुप्ता
लियो टॉलस्टॉय की एन्ना कैरेनिना अगर आपने पढ़ी है तो आपको ये लाइन याद होगी :
“सारे सुखी परिवार एक जैसे होते हैं। हर दुखी परिवार अपने तरीके से दुखी होता है।”
लियो का ऐसा मानना कि हर दुखी परिवार अपने तरीक से दुखी होता है, बहुत कुछ कह जाता है। पर क्या ये सच है कि सुख की कहानी एक जैसी ही होती है और दुख में विविधता है?
मेरी नज़र में दुख की कहानियां विविधता भरी नहीं। पर क्या करूं, आसपास लोग जिस तरह धोखे को जीवन का आधार बना बैठे हैं, कहानियां जब भी आती है, दुख की ही आती हैं, जो होती एक जैसी हैं, हम उनमें विविधता ढूंढ लेते हैं।
असल में कहानियां बाहर ही दुख की आती हैं। दुख में ही भावनाओं का ज्वार-भाटा चलता है। सुखी आदमी अपनी कहानी किसी से साझा करता है क्या? सुख में आदमी डरा रहता है। नहीं चाहता कि किसी को अपनी कहानी सुना कर किसी की नज़र अपने सुख पर लगने दे।
और दुख? दुख की विविधता इतनी ही यही है कि आदमी उसे साझा करना चाहता है। बताना चाहता है।
सुखी आदमी सुख से थोड़े न बाहर निकलना चाहता है? दुखी आदमी दुख से बाहर निकलना चाहता है। उसके बाहर निकलने की कोशिश में ही कहानियों का जन्म होता है।
मैं कुछ सुखी परिवारों को जानती हूं। बहुत से दुखी परिवारों को भी।
एक दिन मैं एक दुखी परिवार की कहानी साझा करते हुए कही थी, ‘आगे बढ़ो’। कुछ लोगों ने आपत्ति ली? ऐसे कैसे? इस तरह तो समाज ही टूट जाएगा जो संजय सिन्हा हर बिगड़े रिश्ते से बाहर निकलने का ज्ञान देने लगेंगे?
आप अपने आसपास नज़र डालिए। दुखी कौन है? जो बहुत गरीब है? जिसे कोई काम नहीं मिल रहा? जो ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाया? जिसे तीन वक्त का भोजन मयस्सर नहीं? जो बीमार है? जो अकेला है?
नहीं।
दुखी वो हैं, जो बुरे रिश्तों में फंसे रह गए हैं? बुरे रिश्ते गुलामी होते हैं। मैंने आपसे ये कहा था कि आदमी गरीबी सह सकता है, गुलामी नहीं।
सारा दंश सहने का है।
जब तक सहते रहते हैं, दुख आपका पीछा नहीं करता। जिस दिन नहीं सहने का भाव मन में आता है, वो दुख का कारक बन जाता है।
दुख की अलग-अलग कहानियां होती ही हैं सिर्फ इस कारण कि उसके सहने के हज़ार कारण ढूंढे जाते हैं। फिर भी सहा नहीं जाता है। जिनकी चिंता समाज है और जो ऐसा सोचते हैं कि संजय सिन्हा की कहानियां सुन कर लोग बुरे रिश्तों को छोड़ कर जो आगे बढ़ने लगे, तो समाज का क्या होगा, उनसे प्रश्न तो बनेगा।
समाज क्या है? किसके लिए है? किससे है? हमारे-आपके सिर में जरा-सा दर्द होता है, हम फटाक से मुंह में गोली गटक लेते हैं। मन का क्या?
शरीर तो फिर भी तकलीफ सह सकता है। मन तकलीफ सहने के लिए नहीं बना हैं। मन की तकलीफ को दिमाग स्वीकार नहीं करता है। उसे दूर करने के लिए दिमाग तरह-तरह के जतन करता है।
शरीर में कई रसायन पैदा करता है ताकि तकलीफ मिटे। फिर भी जो वो तकलीफ नहीं मिटे है तो फिर उससे शोक कथा का जन्म होता है।
कायदे से मुझे यहां न तो उस श्रद्धा को याद करना चाहिए था, जिसके प्रेमी ने उसके शरीर के पता नहीं कितने टुकड़े करके जंगल में फेंक दिया। न ही मुझे उस श्वेता को याद करना चाहिए था, जो नोएडा के अपने फ्लैट के सोलहवें माले से कूद कर मर गई।
टॉल्सटाय होते तो दोनों की कहानियां उकेर चुके होते। कहते कि देखो, मैंने कहा था न कि हर दुखी परिवार अपने तरीके से दुखी होता है। एक को कट कर मरना पड़ा। दूसरी को कूद कर।
मैं पूछती, इसमें अलग क्या है? दोनों में तो अंत एक ही है।
टॉलस्टाय कहते कि देखो पहले के दुख में कितनी हिंसा है। कितनी पीड़ा है। कितना रहस्य है। दूसरे के दुख में? कुछ नहीं।
मैं कहती कि पुलिस की जांच में कहानियां तलाशेंगे तो विविधता मिलेगी। मन में तलाशेंगे तो क्या अलग होगा? दुख के तरीके अलग हो सकते हैं, सहने का तरीका तो एक ही है।
दिमाग ने मन को शांत करने के हज़ार रसायन तैयार किए होंगे पर जब मन फिर भी नहीं माना तो कहानी खत्म हुई कहां? शरीर के खत्म होने पर।
याद कीजिए, शरीर के टुकड़ों में अपराध कथा है या मन के टुकड़ों में?
क्या हम उनके मन को कभी झांकते हैं, जिनके टुकड़े-टुकड़े कर के उनसे जीने की कामना की जाती है?
छोड़िए, सुबह-सुबह रुदाली का वक्त नहीं होता है। कहानियां सुखांत मांगती हैं, दुखांत नहीं। पर मेरी एक गुजारिश है, आप अपने आसपास झांकिए। लोगों से बातें कीजिए। उनके मन को पढ़िए। अगर कोई अपनी कहानी सुनाना चाहता है तो सुनिए। सिर्फ सुन भर लेने से उसका मन कुछ देर के लिए ही सही, शांत हो जाएगा। पहले नहीं सुनेंगे तो फिर खबरें सुन कर दुखी होने से कोई फायदा नहीं।
मैं टॉलस्टॉय की जगह होती तो ये कहती कि हर दुख की कहानी एक जैसी होती है। शायद इसीलिए हम उनकी कहानियां समय रहते नहीं सुनते। बाद में दांतों तले उंगलियां दबाते हैं।
सुनिए कहानी। उनकी कहानी ज़रूर सुनिए, जो आपके पास से आती हैं। कहानियां जो मन में दबी रह जाती हैं, जब अपने आप बाहर आती हैं तो खबर बन कर आती हैं। कोई कहानी खबर बने काश उसके पहले उनकी कहानी कोई सुन लेता!
जो कहानियां पहले सुन ली जाती हैं, उनका अंत सुखांत में तब्दील शायद हो भी जाए, पर दुख की हर अनसुनी कहानी का अंत दुखांत ही होता है, खबर के रूप में।
कोई कहानी सुनाए उसे मत टोकिए, मत रोकिए। मैंने कहा न कि बहुत बार सुन भर लेने से उसका दुख कम हो जाता है। उसके बाद भी कम न हो तो उससे कहिए, आगे बढ़ जाओ। मत रुको।
जो समाज कहानियों को सुन कर परेशान होता है, खबरों को सुन कर नहीं, उसकी क्या चिंता की जाए? आप नहीं सुनेंगे उनकी कहानियां तो कौन सुनेगा? आदत डालिए कहानी सुनने की। समय निकालिए कहानी सुनने के लिए। कहानी आपके घर में भी हो सकती है।





