शशिकांत गुप्ते
लगभग गत नब्बे महीनों से देश के आमजन की दयनीय स्थिति को देखते हुए। यकायक सन 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म काली टोपी लाल रुमाल का यह गीत याद आगया। यह गीत लिखा है,गीतकार मजरूह सुलतानपुरी ने।
आमजन सुदिनों के आगमन के स्वप्नों को धूमिल होते देख रहा है।
यही कह रहा है।
न तो दर्द गया न दवा ही मिली
मैंने ढूँढ के देखा ज़माना
पहुँचे जहाँ भी हम तो लौट आए हार के
ए दिल पुकार देखा एक ऐतबार पे
इनदिनों आस्था का भी बहुत ढिंढोरा पीटा जा रहा है।आमजन बेचारे की स्थिति ऐसे हो गई है कि, मरता क्या नहीं करता
इसी आशय को स्पष्ट करती गीत यह पंक्तिया
मंदिर मस्जिद में जा के की है फ़रियाद भी
मिलता जवाब तो क्या आई ना आवाज़ भी
माँगी दुआ मैंने लाख मगर
न तो दर्द गया न दवा ही मिली
मैंने ढूँढ के देखा ज़माना
उपर्युक्त कोशिशें भावनाओं पर आधारित है।
यथार्थ में झांककर देखने का साहस रखने वाले यह पंक्तियां गातें हैं
घड़ी दो घड़ी के हैं, बादल ये काले
ये दिन तो हमेशा नहीं रहने वाले
सबसे पहले यह समझना बहुत जरूरी है कि, अपना देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है।
अनेकता में एकता इसकी पहचान है।
लोकतंत्र में तानाशाही प्रवृत्ति कभी सफल नहीं हो सकती है।
लोकतंत्र में विपक्ष का होना अनिवार्य है।लोकतंत्र में विपक्ष का महत्व है। विपक्ष की व्यापकता को भी समझना जरूरी है।
विपक्ष मतलब सत्ता का विरोधी दल ही नहीं है।हर एक व्यक्ति जो सत्ता की गलत नीति का अपनी क्षमता से विरोध करता है।हरएक वह संगठन जो सत्ता की गलत नीतियों के विरुद्ध आंदोलन करता है।हरएक वह सोशल एक्टिविस्ट जो हरपल सजग रहतें हुए अपने विचारों के माध्यम से लोगो को आंदोलित करता है और स्वयं सक्रियता से विरोध करता है।
सक्रियता कैसी होनी चाहिए इसके लिए संत कबीरसाहब का यह दोहा सटीक उदाहरण है।
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।
इस दोहे का भावार्थ है
जीवन में जो लोग हमेशा प्रयास करते हैं वे कुछ न कुछ वैसे ही पा लेते हैं जैसे कोई गोताखोर गहरे पानी में जाता है तो कुछ न कुछ पा ही लेता हैं। लेकिन कुछ लोग गहरे पानी में डूबने के डर से यानी असफल होने के डर से कुछ करते ही नहीं और किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं।
एक बात अच्छे से गांठ बांध लेनी चाहिए कि,
आज तक वह रात नहीं हुई,जिसका सवेरा न हुआ हो
शशिकांत गुप्ते इंदौर





