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*ईश्वर अल्लाह तेरे नाम:गांधी केवल एक विचार  नहीं , वह एक जीवन हैं*

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राम विद्रोही 

गांधी जी के बारे में लिखा और बोला तो बहुत गया है लेकिन उन्हें जीने के प्रयास नहीं के बराबर ही हुए हैं। लिखने और बोलने का अपना महत्व है इससे विचारों का संप्रेषण समाज में होता है। लेकिन मेरी राय में गांधी केवल एक विचार ही नहीं हैं, वह एक जीवन हैं जिसे जिए बिना किसी के गांधीवादी होने का सोचा भी नहीं जाना चाहिए। लेकिन गांधी को जीना कोई आसना काम नहीं है। आज के समय में तो उनके साथ ज्यादा दूर तक नहीं जाया जा सकता इसलिए बारबार गांधी के पास आना जाना पडता है।

विचारणीय यह भी है कि गांधी जी ने जब अफ्रीका से भारत लौट कर स्वतंत्रता संघर्ष का नेतृत्व सम्भाला तो उन्होंने कहीं भी कांग्रेस का दफ्तर क्यों नहीं बनाया, आश्रम ही क्यों बनाए? गांधी भारतीय सामाजिक मानािकता को अच्छी तरह समझते थे, आश्रम ऋषियों, साधु-संतों और मुनियों के होते हैं। भारतीय जनता की उनमें सदियों पुरानी आस्था है, उनके प्रति श्रद्धा है। उनसे वह आसानी से जुड जाती है, जुडी हुई है। ऐसी श्रद्धा जनता में किसी राजनीतिक पार्टी के लिए नहीं हो सकती। आजादी के बाद कांग्रेस ने कभी इस पर विचार नहीं किया, वह सत्ता के खेल में व्यस्त हो गई। उसकी सरकारों की रूचि गांधी की प्रस्तर प्रतिमाएं बनाने में थी। आश्रम बनते तो बहुत से गांधी जो पैदा नहीं हो जाते जो आगे सत्ता के लिए खतरनाक साबित होते। । पर कांग्रेस में उस समय भी कुछ लोग ऐसे अवश्य रहे होंगे जो आश्रम बनाना जरूरी मानते होंगे। देश में कई जगह आश्रम खोले भी गए। पर वे सभी केवल नाम के ही रहे, और कुछ सरकारी मठ बन कर रह गए। वह सरकारी कृपा आकांक्षा पर ही बने रहे।

हमारे ग्वालियर में भी एक पांडे बाबा हुआ करते थे। आज के लोगों को तो उनका नाम भी अब याद नहीं होगा। खाटी गांधीवादी सरकारी कृपा से कुछ लेना देना नहीं। उन्होंने गांधी विचार और उनके सिद्धांतों के प्रसार के लिए तीन जगह आश्रम बनाए। एक शिवपुरी में, दूसरा शिवपुरी जिले के मगरोनी में और तीसरा मुरेना के जौरा में। वह खुद पूरे जीवन शिवपुरी के गांधी आश्रम में ही रहे और वहीं अंतिम सांस ली। शिवपुरी का गांधी आश्रम जमीन की राजनीतिक भूख खा गई, वह भी कांग्रेस के राज में। मगरोनी के आश्रम के बारे में मुझे जानकारी नहीं है। वह शायद अब बंद हो गया है। जौरा के आश्रम पर बाहर के लोगों ने आकर कब्जा कर लिया, वह अब है तो जरूर और शायद वह भी अब वेंटीलेअर पर आ गया है।

पांडे बाबा बिहार के रहने वाले थे। चंद्रशेखर आजाद की मुखबिरी करने वाले तिवारी की हत्या करने पिस्तोल लेकर वह इलाहाबाद आए थे। वहां कुछ कर पाते इससे पहले ही पुलिस ने पकड कर जेल में डाल दिया। जेल में उनकी मुलाकात आचार्य नरेंद्र देव, कमलापति त्रिपाठी और चंद्रभान जैसे कांग्रेस के बडे नेताओं से हुई तो गांधीवादी हो गए। पांडे बाबा जेल से रिहा होने के बाद लौट कर अपने घर बिहार नहीं गए। उन्होंने ग्वालियर को अपनी कर्मभूमि बनाया इसलिए उनका आभार। आप लोगों ने चाहा तो पांडे बाबा की विस्तार से चर्चा फिर कभी।

गांधी जी का एक प्रिय भजन था-ईश्वर अल्लाह तेरे नाम सब को सन्मति दे भगवान। मंदिर करते तुझे प्रणाम मस्जिद करती तुझे सलाम। यह गीत तो अब किसी कांग्रेसी के स्मरण में भी नहीं होगा और न कभी आज के कांग्रेसियों ने गाया होगा। अपने ग्वालियर में एक सर्वोदयी हेमदेव शर्मा हुआ करते थे, ग्वालियर के पुराने लोगों को शायद यह नाम याद हो। दो अक्टुबर और तीस जनवरी को उनसे मेरी निश्चित मुलाकात हुआ करती थी फूलबाग की गांधी प्रतिमा पर। हेमदेव जी बडी तन्मयता से इसे गाते थे और हम लोग उनका अनुशरण किया करते थे। एक दिन मैंने उनसे पूछा गांधी जी जिसका नाम ईश्वर और अल्लाह बताते हैं वह वास्तव में है कौन? मेरे इस सवाल पर हेमदेव जी बहुत प्रसन्न हुए कहा-तुम पहले हो जिसने यह सवाल किया है। पहले तुम सोचो फिर मैं बताऊंगा। यह मौका फिर कभी नहीं आया और अब तो उनकी स्मृति ही शेष है।

मेरे विचार में गांधी जी ने माक्र्सवाद का सरल भारतीय करण कर दिया था देश की जरूरत के मुताबिक। गांधी जी ने कई जगह कहा और लिखा है कि मेरा ईश्वर तो दरद्रिनारायण है, देश की गरीब जनता हैै। उन्होंने कभी समाजवाद का नाम नहीं लिया क्योंकि वह जानते थे कि समाजवाद को आम भारतीय नहीं जानता समझता इसलिए वह इसे आसानी से स्वीकार नहीं कर सकेगा।  इसलिए उन्होंने आजादी का मतलब रामराज बताया। क्यों कि वह जानते थे रामराज हर भारतीय के हृदय में रचा बसा है और उसके मन में इसे लेकर बडी श्रद्धा है।

लम्बे पत्रकारीय जीवन में पत्रकारिता के मेरे आदर्श गांधी जी ही रहे हैं। मेरे विचार में गांधी से बडा पत्रकार आज तक दुनिया में कोई नहीं हुआ है। उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से जो कारनामे किए वह आज तक कोई पत्रकार नहीं कर सका। लेकिन दुखद यह है कि गांधी की पत्रकारिता के बारे में नहीं के बराबर लिखा गया है जबकि उसकी आज बहुत जरूरत है।

गांधी जी बहुत अच्छा बोलते थे, बहुत अच्छा लिखते थे और बहुत अच्छा काम भी करते थे। आमतौर पर किसी एक व्यक्ति में यह गुण दुलर्भ ही हैं। गांधी जी के व्यक्तित्व की इस कैमिस्ट्री के बारे में तो मैं नहीं जानता पर इतना कह सकता हुं कि आज भी गांधी के आशीर्वाद की जरूरत साधु और शैतान दोनों को होती है। यही वह बात है जो गांधी को हमेशा जिंदा रखेगी। एक दिन कालचक्र घूमेगा और दुनिया को गांधी के पास लौटना पडेगा।

-राम विद्रोही

Ramswaroop Mantri

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