प्रस्तुति राजेश पाटिल
चार्वाक चचा ने हम लोगों के हाथ में जलपात्र देखकर पूछा — आज सबेरे-सबेरे तुम लोग कहाँ चले हो?
मैं — आज शिवरात्रि है। हम लोग शिवजी पर जल चढ़ाने जा रहे हैं।
चार्वाक — इस फागुन की सुबह में अभी इतनी ठंडी हवा चल रही है और तुम लोग उन पर पानी ढालने जाते हो! शिवजी ने तुम लोगों का क्या बिगाड़ा है, जो इस तरह उन पर धावा करने चले हो!
मैं — चार्वाक चचा, आपको तो हमेशा मजाक ही सूझता रहता है।

चार्वाक — हँसी नहीं करता हूँ। शिवजी तो स्वयं शीतवीर्य हैं। उन पर जल ढालने की क्या जरूरत है? इससे तो अच्छा है कि लोटे का पानी इस पुदीने में डाल दो।
मैंने कहा — चार्वाक चचा, आपको देवताओं में भक्ति नहीं है?
चार्वाक चचा बोले — तब जरा बैठ जाओ। काफिला तो जा ही रहा है। तुम जरा बाद ही पहुँचोगे तो क्या होगा? हाँ, देवताओं के विषय में क्या कहते हो?
मैं — यही कि उनमें भक्ति रखनी चाहिए।
चार्वाक — लेकिन यदि पुराण प्रमाण, तो भक्ति कैसे रखी जाय? मैं तो सभी देवताओं के चरित्र जानता हूँ। कहो तो एक-एक की बखिया उधेड़कर रख दूँ। मुझे तो कोई देवता ऐसे नहीं दीखते जो कामी, कपटी, कायर, काहिल और क्रूर नहीं हों! दैत्य बल से जीतते थे। देवता छल से जीतते थे। मेरी समझ में तो देवता दैत्यों से भी ज्यादा गिरे हुए थे।
मैं — चार्वाक चचा, आप तो हर बात में उलटी गंगा बहा देते हैं।
चार्वाक — तो देवासुर संग्राम पढ़ो। जहाँ असुर लोग चढ़ाई करते थे कि देवतागण त्राहि-त्राहि कर भागते थे। ब्रह्मा के यहाँ से विष्णु के यहाँ, और विष्णु के यहाँ से महेश के यहाँ! जब उनसे भी नहीं सँभलता था तो दुर्गा को गोहराते थे। इसी भीरुता पर महिषासुर ने फटकारा था-
हत्वा त्वां निहनिष्यामि देवान् कपटमंडितान्
ये नारीं पुरतः कृत्वा जेतुमिच्छन्ति मां शठाः
(#देवी_भागवत 5।18)
अर्थात् “जो देवता नारी को आगे कर कपट से मुझे जीतना चाहते हैं, उन्हें मैं रण में सुला दूँगा।” लेकिन देवताओं को लाज थोड़े ही थी! देवी को आगे कर स्वयं अंचल की ओट में छिप जाते थे।
मैं — तो क्या देवी देवताओं से ज्यादा शक्तिशालिनी थीं?
चार्वाक — इसमें क्या संदेह? विष्णु चतुर्भुज थे तो दुर्गा अष्टभुजा थीं। शिव बैल पर चलते थे, दुर्गा सिंह की सवारी करती थीं। शक्ति के बिना शिव केवल शव रह जाते हैं!
देवी अपनी देह का मैल छुड़ाकर फेंक देती थी, तो वह भी देवता के छक्के छुड़ा देता था। तभी तो जब देवता लोग हारने लगते थे, तो देवी की गुहार करते थे ।
त्रिपुरस्य महायुद्धे सरथे पतिते शिवे
यां तुष्टवुः सुराः सर्वे तां दुर्गा प्रणमाम्यहम्
(#ब्रह्मवैवर्त)
जब त्रिपुरासुर से युद्ध करते समय शिवजी रथ के साथ गिर पड़े, तो सभी देवता दुर्गा की स्तुति करने लगे कि “देवीजी! अब आप ही बचाइए।”
मैं — यह तो लज्जा की बात हुई!
चार्वाक — अजी, देवताओं को सो लाज रहती तो छलपूर्वक विषकन्या के हाथ से दैत्यों को जहर दिला देते? समुद्र मंथन से अमृत निकला, सो तो स्वयं पीकर अमर हो गये, और दैत्यों के आगे विष रख दिया! इससे बढ़कर अन्याय क्या होगा? ये लोग ऐसे स्वार्थांध थे कि महर्षि दधीचि से उनकी रीढ़ की हड्डी माँग ली! खुदगर्जी में इतना भी विचार नहीं रहा कि क्या माँग रहे हैं! वह हड्डी वज्र बन गयी। ऐसी जगह तो वज्रपात हो जाना चाहिए!
मैं — चार्वाक चचा, आप एकतरफा फैसला करते हैं। देवताओं ने कैसे-कैसे काम किए हैं, सो भी तो देखिए।
चार्वाक चचा बोले — अजी, काम तो ऐसे-ऐसे किये हैं कि उनका नाम भी नहीं लेना चाहिए! देवताओं के राजा इंद्र ने ऐसा पाप किया कि उनके शरीर में सहस्र छिद्र हो गये!
#गौतमस्याभिशापेन_भगांगः_सुरसंसदि
देवराज दुष्ट ऐसे थे कि जहाँ किसी को तपस्या करते देखते कि उनका इंद्रासन डोलने लगता था। जहाँ कहीं यज्ञ-कार्य होने लगा कि मूसलाधार पानी बरसाने लगते थे।
मैं — परंतु वह वीर कैसे थे?
चार्वाक – ऐसे वीर कि मेघनाद ने रस्से में बाँध दिया! अजी, जो रात-दिन अमरावती में पड़ा-पड़ा अप्सराओं के साथ भोग-विलास में लिप्त रहेगा, वह युद्ध में कहाँ तक ठहरेगा? तभी तो पुराण में इंद्र की इतनी भर्त्सना की गयी है!
लक्ष्मीसमशचीभर्त्ता परस्त्रीलोलुपः सदा
(#ब्रह्मवैवर्त)
लक्ष्मी के समान पत्नी शची होते हुए भी सदा परस्त्रियों में लिप्त! उन्हें नित्य नयी-नयी युवतियाँ चाहिए!
नव्या नव्या युवतयो भवन्ति महद्देवानाम्
(#ऋग्वेद 30/55 /16)
उनमें रात-दिन सिंचन करना ही इनका काम था।
तासु रेतः प्रासिंचत्
(#शतपथ 2/1/1/5)
मैं — देखिए, सूर्य और चंद्रमा कैसे पुण्य-प्रताप से चमक रहे हैं!
चार्वाक — दोनों में कोई देवता दूध के धोये नहीं हैं। सूर्य के पुण्य का हाल ऊषा और कुन्ती जानती हैं। प्रताप का यह हाल है कि केतु बार-बार निगल जाता है। समझो तो यह उच्छिष्ट हैं, जूठे हैं। तभी तो ज्योतिष में इनको पापग्रह कहा जाता है। तब गायत्री मंत्र में तेज कहाँ से आवे! इसी से कितना भी ‘#धियो_योनः_प्रचोदयात्’ करने से कुछ फल नहीं निकलता है। सविता का गुण हमने इसी अर्थ में ग्रहण किया है कि प्रसविता का कार्य तेजी के साथ करते हैं। और चंद्रमा तो ऐसी कृति कर गये हैं कि अब तक मुँह पर कालिमा पुती हुई है। गुरुपत्नी का भी विचार नहीं! यह कलंक ‘#यावच्चन्द्र_दिवाकरौ’ मिटनेवाला नहीं! तभी तो वह क्षय रोग से ग्रसित हुए। ऐसे महापातक में तो गलित कुष्ठ हो जाय।
मैं — चार्वाक चचा, देवता गण अज अविनाशी होते हैं…
चार्वाक — हाँ, अज कहते हैं बकरे को और अवि नाम भेड़ का है। उसके नाशक तो अवश्य होते हैं।
अश्वं नैव गजं नैव व्याघ्रं नैव च नैव च
अजापुत्रं बलिं दद्यात्, देवो दुर्बलघातकः!
जो अबल रहते हैं, उन्हीं पर देवता प्रबल होते हैं।
मैं — चार्वाक चचा, छोटे-छोटे देवताओं को छोड़िए। बड़े हैं- ब्रह्मा, विष्णु, महेश।
चार्वाक चचा बोले — तो बड़ों की भी सुन लो। ब्रह्मा को तो मिट्टी का लोंदा ही समझो। चार मुँह रहने से क्या होता है! कभी कोई काम उनसे पार नहीं लगा। जब-जब देवता लोग सहायता के लिए पहुँचे, तब-तब क्या, तो “विष्णु के यहाँ जाओ।” अर्थात् “मुझसे कुछ नहीं होगा।” वह स्वयं साक्षी गोपाल की तरह पद्मासन लगाये बैठे रहेंगे! वैसा बोदा तो कोई देवता नहीं।
मैं — चार्वाक चचा, सृष्टि के आदि-मूल को आप ऐसा कहते हैं?
चार्वाक — आदि-मूल क्या रहेंगे? वह तो खुद विष्णु की नाभि से निकले हैं। और, सृष्टि की बात क्या करते हो? सत्ययुग में जन्म लेकर उन्होंने जैसा कृत्य किया, वैसा कलियुग में भी प्रायः कोई नहीं करता। चारों वेदों के कर्त्ता होकर अपनी ही कन्या के पीछे दौड़ गये! कहलाने को ‘अज’, और काम बोतू का! तभी तो अज का अर्थ बकरा भी हो गया है। इसी छागली वृत्ति के कारण वह अपूज्य माने जाते हैं। सभी देवताओं की पूजा हो जाने पर जो अक्षत शेष बच जाता है, वही उनके नाम पर छींट दिया जाता है।
मैंने कहा — चार्वाक चचा, सबसे बड़े हैं विष्णु भगवान् ।
चार्वाक चचा बोले — तब विष्णु की भी सुन लो। उनके जैसा मायावी तो कोई नहीं। कहीं मोहन रूप बनाकर नारी को लुभाते हैं, तो कहीं मोहिनी रूप धारण कर पुरुष को रिझाते हैं। मधु-कैटभ सुंद-उपसुंद, सबको तो छल से ही मारा। जालंधर की स्त्री वृंदा के साथ ऐसा जाल किया कि अंतिम विंदु तक पहुँचा दिया! ऐसा छलिया दूसरा कौन होगा?
मैं — परंतु उन्होंने अवतार लेकर कैसे-कैसे काम किये हैं, सो नहीं देखते हैं?
चार्वाक चचा सुपारी कतरते हुए कहने लगे – अजी, सभी काम तो वैसे ही हैं। छल, कपट और स्वार्थ से भरे हुए। राजा बलि से ऐसा तिकड़म किया कि बेचारा बलिदान ही पड़ गया! मुझे तो जान पड़ता है कि उसी बलि से बलिदान शब्द बना होगा। #बलिवद्_दानं_बलिदानम्!
कहीं बाप से बेटे को लड़ाते हैं, कहीं भाई से भाई को। कहीं पति से पत्नी को फुटकाते हैं।
कशिपु से वैर प्रह्लाद से नाता!
रावण को मार विभीषण को राज !
राधा के साथ रास और उसके पति से साहब – सलामत तक नहीं!
मैं — चार्वाक चचा, देखिए, उन्होंने कैसे ऐन वक्त पर द्रौपदी की लाज बचायी!
चार्वाक चचा मुस्कुराते हुए बोले — अजी, मुझे तो ऐसा लगता है कि यमुना तट पर चुरायी हुई गोपियों की साड़ियाँ लेकर ही उन्होंने द्रौपदी के आगे ढेर लगा दी होंगी। जब तक स्वार्थ था, तब तक वृंदावन बिहारी बने रहे और काम निकल जाने पर द्वारिका का रास्ता लिया। फिर क्यों राधा की खोज करेंगे? कभी एक चिट्ठी तक बेचारी को नहीं लिखी ! जिस यशोदा ने इतना मक्खन खिलाकर पोसा उन्हीं को कौन-सा यश दिया? समझो तो यह किसी के भी नहीं थे। सिर्फ अपने मतलब के यार! अपना स्वार्थ साधने के लिए मछली, कछुआ, सूअर, कौन-कौन बाना नहीं बनाया? ऐसा बहुरूपिया कौन होगा? न नरसिंह रूप धारण करते देर न बुद्धदेव बनते ! राम बनकर धनुष तोड़ते हैं, परशुराम बनकर कुल्हाड़ी चलाते हैं! कभी बुद्ध के रूप में स्त्री को घर में छोड़कर वन का रास्ता लेंगे! कभी राम के रूप में खुद घर में रहकर स्त्री को वन का रास्ता धरायेंगे ! ऐसे-ऐसे ऊटपटाँग कामों में ही तो इनका मन लगता है। एक अवतार में माता की गर्दन काटते हैं, दूसरे में मामा को पटककर मारते हैं। अब कल्कि अवतार में न जाने क्या करेंगे?
मैं — चार्वाक चचा, यह सब तो भगवान् की लीला है।
चार्वाक — हाँ, भगवान् खेलते हैं। कोई गार्जियन तो ऊपर में है नहीं। जो-जो मन में आता है, करते रहते हैं। यह चाल क्या कभी छूटनेवाली है? समझो तो वह अभी तक नाबालिग ही हैं। इसी से राम या कृष्ण की मूर्ति में कहीं दाढ़ी-मूँछ देखते हो?
मैं — चार्वाक चचा, यह तो पते की बात कही। विष्णु भगवान् चिर किशोर नजर आते हैं। परंतु विश्व के पालन-कर्त्ता तो वही हैं?
चार्वाक — अजी, तभी तो विश्व की यह हालत है! वह ऐसे आलस्य-विलासी हैं कि हमेशा ससुराल में ही पड़े रहते हैं। सदा क्षीर सागर शयन ! देवता लोग बहुत गोहार करेंगे तो एक-एक बार गरुड़ पर चढ़ेंगे और जाकर सुदर्शन चक्र से काम कर आयेंगे। उसके बाद फिर वही लक्ष्मी-मुख-कमल मधु व्रत! रात-दिन ससुराल में रहते-रहते आदमी अहदी बन जाता है। अजी, जिस पर संसार भर का भार हो, वह कहीं ऐसा घरजमाई बनकर पड़ा रहे! परंतु इनको डाँटे कौन? कभी भृगु जैसे ब्राह्मण से पाला पड़ जाता है, तो सीख जाते हैं। इसी से तो यह ब्राह्मण से भड़के हुए रहते हैं। यदि इनमें ब्राह्मण के प्रति भक्ति रहती तो मेरे कपार पर दरिद्रा क्यों सटी रहती?
मैं — तब तो त्रिमूर्ति में बाकी बचे सिर्फ महादेव।
चार्वाक चचा एक चुटकी कतरा मुँह में रखते हुए बोले — तब महादेव की भी सुन लो। वह तो सहज ही बौड़म ठहरे। आक-धतूर खाकर मत्त! न जाति-पाँति का ठिकाना, न छुआछूत का विचार! भूत-प्रेत-बैताल का संग ! चमड़े पहने, हाड़-मूँड लेकर श्मशान में क्रीड़ा करते रहते हैं – औघड़ की तरह! इसी कारण उनका प्रसाद कोई नहीं खाता।
मुझे मुँह ताकते देख चार्वाक चचा कहने लगे – समझो तो महादेव भारी नास्तिक थे। उन्होंने सारा कर्म-धर्म डुबो दिया। न शिखा-सूत्र रखा, न ब्राह्मण-भोजन कराया। कोई भला आदमी बैल की पीठ पर सवारी करता है? गले में साँप लपेटता है? एक बार जी में आया तो जहर उठाकर पी गये! समझो तो उनके जैसा सनकी आज तक पैदा नहीं हुआ।
मैं — चार्वाक चचा, महादेवजी निर्विकार हैं।
चार्वाक — सीधे निर्विकार मत समझो। ससुर ने यज्ञ में निमंत्रण नहीं दिया तो जाकर उनकी गर्दन ही काट आये ! ससुर का तो यह हाल, और ससुर की बेटी को सर पर चढ़ाकर अर्धनारीश्वर बन गये ! समझो तो इन्हीं की देखादेखी आजकल के कलियुगी पति स्त्रियों को सर पर चढ़ाए रहते हैं।
मैं — परंतु महादेवजी आशुतोष हैं। उन्हें प्रसन्न होते भी देर नहीं लगती।
चार्वाक — हाँ, जहाँ किसी ने एक बेलपत्र चढ़ाकर ब्रूम् बोल दिया कि तुरत वरं ब्रूहि । वरदान देते समय औढरदानी! इसी का फल हुआ कि भस्मासुर उन्हीं के मत्थे हाथ देने लगा ! समझो तो सभी राक्षस इन्हीं के बहकाए हुए हैं। देवताओं में ऐसा अलमस्त कौन मिलेगा? इसीलिए तो बमभोला कहलाते हैं। अजी, मैंने तो भरकस चेष्टा की कि भोलानाथ से कुछ झीटूँ, लेकिन अभी तक कहाँ हाथ लगे हैं! ऐसे मदक्की का भरोसा ही क्या?
मैं — चार्वाक चचा, तब सभी देवताओं में श्रेष्ठ आप किसको समझते हैं? खट्टर कैसे कहूँ? स्वयं देवता लोग भी इसका निर्णय नहीं कर सके हैं। महादेव विष्णु को बड़ा मानते हैं। विष्णु महादेव को बड़ा मानते हैं। राम महादेव को पूजते हैं। महादेव राम-नाम का जप करते हैं। सीता गौरी की पूजा करती हैं। गिरिजा सीता का ध्यान धरती हैं। पार्वती महादेव की आराधना करती हैं। महादेव दुर्गा की स्तुति करते हैं। ऐसा गड़बड़-घोटाला है कि स्वयं देवताओं को भी पता नहीं कि कौन बड़ा, कौन छोटा। नहीं तो, महादेव के विवाह में कहीं गणेश की पूजा हो! बाप के विवाह में बेटे की पूजा! देवताओं की बातें ही निराली होती हैं।
मैं — चार्वाक चचा, जो जितने बड़े देवता हैं, वे उतने ही नम्र और विनयशील होते हैं।
चार्वाक चचा हँसकर बोले — जो #देवानां_प्रियः (मूर्ख) होगा, वही ऐसा कहेगा। अजी, देवताओं जैसा झगड़ालू कौन मिलेगा? इन लोगों में इस तरह लड़ाइयाँ हुई हैं कि क्या तीतर-बटेर में होंगी? पहले तो “आप बड़े, तो आप बड़े।” और, जहाँ किसी बात पर बझ गयी तो भिड़ंत होते भी देर नहीं! इंद्र और कृष्ण में, कृष्ण और महादेव में, महादेव और गणेश में, किस प्रकार उठा-पटक हुई है, सो देखना हो तो पुराण पढ़ो। और, अंत में फिर वही स्तुति! “आप पूज्य, तो आप पूज्य!” अजी, ये लोग प्रणम्य देवता थे!
मैं — चार्वाक चचा, अगर सभी देवता ऐसे ही हैं, तो फिर सृष्टि का काम कैसे चलता है?
चार्वाक चचा महीन कतरा करते हुए बोले — सच पूछो तो एक ही देवता असली सृष्टिकर्त्ता हैं, और वह हैं कामदेव। उन्हीं से सारी सृष्टि चलती है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश – तीनों उनसे हारे हुए हैं। जब बड़ों का यह हाल तो कुत्र गण्यो गणेशः!
मैंने कहा — चार्वाक चचा, गणेश की पूजा तो सर्वप्रथम होती है। विघ्न दूर करने के लिए।
चार्वाक चचा बोले — हाँ, वह विघ्नेश कहलाते हैं। परंतु उनका तो अपना ही जीवन विघ्नों से भरा हुआ है। शनि की दृष्टि पड़ी तो मस्तक कट गया। गजवदन बनना पड़ा। परशुराम से लड़ाई हुई तो फरसे से एक दाँत टूट गया। एकदंत हो गये। जब अपने ही विघ्न दूर नहीं कर सके तो दूसरे का विघ्न क्या दूर करेंगे! इसी से लाख गणपति ग्वं हवामहे करते रहने पर भी हम लोगों के दुःख दूर नहीं होते हैं।
मैं — तब गणेश से भी प्रबल हैं कामदेव?
चार्वाक — गणेश के बाप से भी प्रबल हैं। कामदेव को पछाड़नेवाला आज तक कोई पैदा नहीं हुआ। इसी से मैं इनको सबसे बड़ा देवता मानता हूँ। जब तक सृष्टि का प्रवाह चलता है, तब तक कामदेव की सत्ता को कौन अस्वीकार कर सकता है? यह पंचभूतमय शरीर इन्हीं के पंचसायक का प्रसाद है। और, जिस दिन यह देवता अपना वाण तरकस में रखकर कूच करेंगे, उसी दिन प्रलय समझो। सृष्टि के लोप को ही तो प्रलय कहते हैं।
मैं — तब कामदहन की कथा क्यों है?
चार्वाक चचा बोले — ‘काम-दहन’ का असली अर्थ है कामेन दहनम्। चौरासी लाख योनियाँ कामाग्नि से दग्ध होती रहती हैं। देखो, इनके जितने नाम हैं, सभी से यही बात सूचित होती है। सभी कामनाओं में प्रबल, इसलिए कामदेव । मत्त कर देते हैं, इसलिए मदन। मन को मथकर छोड़ देते हैं, इसलिए मन्मथ । अदृश्य हैं, इसलिए अनंग। कोमल टीस देते हैं, इसलिए पुष्पधन्वा । संयोग करवाते हैं, इसलिए रतिपति। वियोग में जान ले लेते हैं, इसलिए मार!
मैं — तो महादेवजी उन्हें नहीं जीते हुए हैं?
चार्वाक चचा बोले – महादेव क्या जीतेंगे? कामदेव ही महादेव को जीते हुए हैं। तभी तो -:
दुर्गाग स्पर्शमात्रेण कामेन मूर्छितः शिवः
(#ब्रह्मवैवर्त)
दुर्गा के अंगस्पर्श से ही वह काम – मूर्छित हो गये! ‘ब्रह्मवैवर्त’ पुराण में शिव का संभोग – वर्णन पढ़ो, तो समझोगे कि कामदेव ने महादेव की कैसी दुर्दशा की है!
#भूमौ_पपात_तद्वीर्यं_ततः_स्कंदो_बभूव_ह।
यदि शिव सचमुच कामजयी होते तो कार्त्तिकेय और गणेश का जन्म कैसे होता? लोग कहते हैं कि शिवजी ने मदन को भस्मीभूत कर दिया। मैं कहता हूँ कि मदन ने ही उन्हें भस्ममय बना डाला। तभी तो सती के वियोग में भस्म लेपे रहते हैं! जानते हो, भस्म क्या चीज है?
रुद्राग्नेयात् परवीर्यं तद्भस्म परिकीर्तितम्
(#बृहज्जाबालोपनिषद्)
भस्म साक्षात् रुद्र का वीर्य है! अब तुम्हीं कहो, महादेव प्रबल हैं या कामदेव ?
मुझे मुँह ताकते देख चार्वाक चचा बोले – वेद में भी कामदेव को सबसे प्रबल देवता माना गया है। देखो –
कामो जज्ञे प्रथमो नैनं देवा आपुः पितरो न मर्त्याः ततस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महान् तस्मै ते काम नाम इति वृणोमि
(#अथर्ववेद 9/2/19)
भविष्यपुराण में तो यहाँ तक लिख मारा है कि
स्वकीयां च सुतां ब्रह्मा विष्णुदेवः स्वभातरम्
भगिनीं भगवान् शंभुः गृहीत्वा श्रेष्ठतामगात् !
(#भविष्य_पुराण, प्रतिसर्गखंड)
मैंने पूछा — चार्वाक चचा, तो अन्यान्य देवताओं की तरह कामदेव के मंदिर क्यों नहीं हैं?
खट्टर काका हँस पड़े। बोले — तुम बिल्कुल भोले हो। वह देवता हर मंदिर में रहते हैं! शरीरमंदिर से लेकर देवमंदिर तक में। कहीं-कहीं, जैसे #कोणार्क और #खजुराहो में, प्रकट रूप से विद्यमान हैं। अन्य मंदिरों में प्रच्छन्न रूप में हैं। अभी तुम जिस शिवलिंग पर जल ढारने जाते हो, वह किसका प्रतीक है? मंदिर में जाकर देखो, तो शिवलिंग और जलहरी, दोनों का रहस्य समझ में आ जाएगा।
मैं — चार्वाक चचा, आप देवताओं से भी परिहास करते हैं?
चार्वाक — हँसी नहीं करता हूँ। पुराण देखो-
लिंगवेदी उमादेवी लिंग साक्षान्महेश्वरः
तयोः संपूजनादेव देवी देवश्च पूजितौ
(#लिंगपुराण)
और भी वचन लो-
शिवशक्त्योश्च चिह्नस्य मेलनं लिंगमुच्यते
(#शिवपुराण)
यत्र लिंग तत्र योनिः यत्र योनिस्ततः शिवः
उभयैश्चैव तेजोभिः शिवलिंगं व्यजायत
(#नारदपंचरात्र)
शैव लोग एक अंग की पूजा करते हैं; शाक्त लोग दूसरे अंग की। कुछ लोग दोनों की। अब उसे द्वैत कहो या अद्वैत या विशिष्टाद्वैत! उससे मुझे कोई झगड़ा नहीं।
मैंने कहा — चार्वाक चचा, आप तो हँसी-हँसी में ही बुद्धि को उलझा देते हैं। क्या आपको देवता में विश्वास नहीं है?
खट्टर काका बोले — अजी, विश्वास क्यों नहीं है? ‘देवता’ का अर्थ है दिव्य कांति से युक्त। रंगबिरंगे वस्त्रों में चमकते हुए राजाओं को देखकर ‘देवता’ की कल्पना हुई। ‘ईश्वर’ का अर्थ मालिक। लक्ष्मीपति का अर्थ धनवान् । नारायण का अर्थ है, जलमहल में शयन करनेवाला। गरुड़वाहन का अर्थ, शीघ्रगामी यान पर चलनेवाला। प्रजापति का अर्थ, प्रजा का स्वामी। हर का अर्थ, कर (मालगुजारी) हरण करनेवाला। चतुर्भुज का अर्थ, जिसका बाहुबल चारों ओर व्याप्त हो। पंचमुख का अर्थ, जो पाँच व्यक्तियों का भोजन खा जाय!
ये ही लोग देवता कहलाते आये हैं। जो धनी या प्रभावशाली हों, वही देवता।
चार्वाक चचा नस लेते हुए कहने लगे — देखो, पहले छोटे-छोटे गण थे। इसलिए गणेश अर्थात् गण के सरदार से श्रीगणेश हुआ। वे दलनायक होते थे, इसलिए विनायक नाम पड़ा। उन दिनों भी गणपति गजवदन होते थे और साधारण जनता चूहे की भाँति उनके भार से दबी रहती थी। इसी से मूषिकवाहन कहलाए। बाद में बड़े-बड़े महाराजों को महलों में विलास करते देख अप्सरालय में विहार करनेवाले इंद्र की कल्पना की गयी। एकच्छत्र सम्राट् को देखकर एकमेवाऽद्वितीयं ब्रह्म की कल्पना हुई। देवता लोग सामंतवाद के प्रतीक हैं; ब्रह्म साम्राज्यवाद के। परंतु अब तो समाजवाद का युग है। इस लोकतंत्र में असली देवता हमीं लोग हैं। — खट्टर काका की शैली
चार्वाक लोकायत.





