~ नाजायज संबंध में आपकी ऊर्जा उसमें चली जाएगी
~ब्रह्मचर्य अहम, लेकिन इसका सम्भोग से कोई लेनादेना नहीं
~ डॉ. विकास मानव
स्त्रीत्व-युक्त स्त्री और पुरुषत्त्व-युक्त योग्य पुरुष का मन-तन मिक्स कर अद्वैत बन जाना : इसी में भगवत्ता है. यही शिव का अर्धनारीश्वर दर्शन है. अतिरिक्त किसी से आप सेक्स करते/करती हैं तो आपकी ऊर्जा उसमें चली जाएगी. आपको मुर्दापन के अलावा क़ुछ नहीं मिलेगा.
एक योग्य साथी से सम्भोग आपको शिवत्व देता है. आप ब्रह्म में विचरण करते हैं यानी ब्रह्मचर्य साधते हैं. जी हाँ, ब्रह्मचर्य का ऐसे सम्भोग से कोई लेना देना नहीं. ऐसे स्त्री-पुरुष दिनरात सम्भोग करें, उनका ब्रह्मचर्य खंडित नहीं होगा.
अगर आप अपने पत्नी या पति के अतिरिक्त किसी अन्य से शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं तो आपके अन्दर उपस्थित ऊर्जा ( सकारात्मक, नकारात्मक दोनों) उस व्यक्ति तक स्थानांतरित होती है।
मान लीजिये आपने किसी पुण्य या साधना से या किसी अच्छे कर्म से १००% लाभदायक उर्जा प्राप्त की | आप अपनी पत्नी से सम्बन्ध रखते हैं, इस तरह पत्नी को आधा उसका मिल जाएगा, किन्तु आप किसी अन्य से भी शारीरिकसम्बन्ध रखते हैं तो तीनो में वह ऊर्जा ३३ – ३३% विभाजित हो जाएगी और उन्हें मिल जायेगी। यदि आपने कईयों से एक ही समय में सम्बन्ध रखे हैं तो प्राप्त या पहले से उपस्थित ऊर्जा उतने ही हिस्सों में बट जाएगी और आपको लेकर जितने लोग शारीरिक सम्बन्ध के दायरे में होंगे उतने हिस्से हो आपको एक हिस्सा मिल जायेगा बस। यहाँ कहावत हो जायेगी मेहनत की सौ के लिए मिला दस।
जब आप किसी से शारीरिक सम्बन्ध कुछ दिन रखते है (जैसे विवाह पूर्व अथवा बाद में ) और फिर वह सम्बन्ध टूट जाता है तब भी ऊर्जा स्थानान्तरण रुकता नहीं, हाँ मात्रा जरुर कम हो जाती है, पर बिलकुल समाप्त नहीं होती ,क्योकि आपके सम्बन्ध को आपका अवचेतन याद रखता है और जो सम्बन्ध उस समय बने होते हैं वह अदृश्य ऊर्जा धाराओं में हमेशा के लिए एक संबंध बना देते हैं। ऐसे में आप जीवन भर जो कुछ ऊर्जा अर्जित करेंगे वह उस व्यक्तिको खुद थोडा ही सही पर मिलता जरुर रहेगा और आपमें से कमी होती जरुर रहेगी।
आप द्वारा किये गए किसी धर्म–कर्म, पूजा –साधना का पूर्ण परिणाम या साकारात्मक ऊर्जा आपको पूर्ण रूप में नहीं मिलेगा, न आप जिसके लिए करेंगे उसे ही पूरा मिलेगा।
ऊर्जा स्थानान्तरण के मामले में चरित्रहीन और गलत व्यक्ति लाभदायक स्थिति में होते है। |वह कईयों से सम्बन्ध झूठ–सच के सहारे बनाते हैं। स्थिर कहीं नहीं रहते और व्यक्ति बदलते रहते हैं। ऐसे में होना तो यह चाहिए की उनका पतनऔर नुकसान हो। पर कभी कभी ही ऐसा होता है, अति नकारात्मकता के कारण अन्यथा, जिन जिन से उन्होंने सम्बन्ध बनाये हैं, उनके पुण्य प्रभाव और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्ति का प्रयास इन्हें भी अपने आप लाभदायक ऊर्जा दिलाता रहता है।इस तरह ये पाप करते हुए भी नकारात्मकता में कमी पाते रहते है।
नुकसान सत्कर्मी अथवा सकारात्मक ऊर्जा के लिए प्रयास रत अथवा सुख संमृद्धि–शान्ति की कामना वाले का होता है, उसकी एक भूल उसे हमेशा के लिए सकारात्मक ऊर्जा में कमी देती ही रहती है, फल उसे कभी नहीं मिल पाता। अगर उसने कभी अन्य किसी से सम्बन्ध बना लिए हैं ,भले बाद में वह सुधर गया हो। उसे लक्ष्य प्राप्ति के लिएकई गुना अधिक प्रयास करना पड़ जाता है।
किसी साधक –सन्यासी –साधू आदि से कोई अगर सम्बन्ध बना लेता है तो पहले तो तत्काल उसके नकारात्मक ऊर्जा का क्षय हो जाता है, उसके बाद भी जब भी वह साधक साधना से ऊर्जा प्राप्त करेगा, उसका कुछ अंश अवश्य सम्बन्ध बनाने वाली को मिलता रहेगा। नुक्सान सिर्फ साधक या ऊर्जा प्राप्ति का प्रयास करने वाले का होता है।
इसलिए हमेशा इस दृष्टि से भी देखना चाहिए की आपकी एक गलती आपको जीवन भर कुछ कमी देती रहेगी। कभी आप पूर्ण सकारात्मक ऊर्जा अपने प्रयास का नहीं पायेंगे। यदि वह व्यक्ति जिससे आपने सम्बन्ध बनाए हैं नकारात्मक ऊर्जा से ग्रस्त है तो आप बिना कुछ किये नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव में आयेंगे। यदि यह अधिक हुआ और संतुलन बिगड़ा तो आपका पतन होने लगेगा।
इसलिए कभी किसी अन्य से या यहाँ वहां शारीरिक सम्बन्ध न बनायें। विवाह पूर्व ऐसे संबंधों से दूर रहें, अन्यथा बाद में पति या पत्नी को बहुत चाहनेऔर पूर्ण समर्पित होने के बाद भी आप उसे अपने धर्म–कर्म का पूर्ण परिणाम नहीं दिला सकेंगे। बिना चाहेआपकी ऊर्जा कहीं और भी स्थानांतरित होती रहेगी। कुछ भी करें तो सोचकर करें।
*स्त्री और पुरुष पृथक नहीं :*
हम इस जगत में प्रकृति के ही दो रूप हैं। सांख्य हमें परब्रह्म का मूर्तिमान संकल्प मानता है।उत्पति , स्थिति और प्रलयमूला त्रिगुणात्मिका प्रकृति के प्रधान अष्टतत्व और निर्माण के लिए अपेक्षित पंचतत्व आदि हम से ही उत्पन्न होते हैं।
नारी पीयूषवर्षिणि आनंदकारिणी और प्रभा-प्रस्विनी साक्षात प्रकृति है और पुरुष परमात्मा है। दोनों सहज का अखंड आधार है क्योंकि ‘सहज ‘ तत्व पुष्टि में कहीं प्रकृति ( नारी ) से पृथक है तो कहीं उसमे अंतर्भूत है। नारी ही पुरुष को सृष्टि के मूल कारणभूत साहचर्य से हटाकर उसे विजितेन्द्रिय बनाने की क्षमता रखती है।
पुरुष की प्रकृति पर विजिगीषा अथवा उसकी आकांक्षा स्त्री के योग से ही संभव है। नारी कामदेव का प्रबलतम शस्त्र है। नारी में प्रविष्ट होकर मनोज उसे नवनीता बनाता है और नवनीता की स्निग्धता पाकर नारी पुरुष को पाशबद्ध कर उसे अपना ‘ प्रणयी ‘ बनाती है। शक्ति स्वरूपा नारी ही अपने इस ‘ प्रणय ‘ को समुन्नत अवस्था में पहुँचाकर उसके भीतर के असुर को देवत्व में परिवर्तित करती है।
महादेव शिव जब अपने पौरुष को पहचान कर अपना तृतीय नेत्र खोलते हैं तो प्रकृति (नारी ) में स्थिति मन्मथ भष्म होकर ‘अतनु ‘ हो जाता है। इस प्रकार प्रकृति पूज्या है क्योंकि पुरुष उसके आलोक से पृथक नहीं है।
ध्यान-तंत्र साधना में साधक को किसी न किसी चरण में भैरवी का साहचर्य ग्रहण करना पड़ता ही है। यह तंत्र एक निश्चित मर्यादा है। प्रत्येक साधक, चाहे वह युवा हो, अथवा वृद्ध, इसका उल्लंघन कर ही नहीं सकता, क्योंकि भैरवी ‘शक्तिरूप है, तथा तंत्र की तो सम्पूर्ण भावभूमि ही, ‘शक्ति’ पर आधारित है।इसका रहस्य यही है, कि साधक को इस बात का साक्षात करना होता है, कि स्त्री केवल वासनापूर्ति का एक माध्यम ही नहीं, वरन शक्ति का उदगम भी है और यह क्रिया केवल गुरुदेव ही अपने निर्देशन में संपन्न करा सकते है, क्योंकि उन्हें ही अपने किसी शिष्य की भावनाओं व् संवेदनाओं का ज्ञान होता है। इसी कारणवश तंत्र के क्षेत्र में तो पग-पग पर गुरु साहचर्य की आवश्यकता पड़ती है, अन्य मार्गों की अपेक्षा कहीं अधिक।
किन्तु यह भी सत्य है, कि समाज जब तक भैरवी साधना या श्यामा साधना जैसी उच्चतम साधनाओं की वास्तविकता नहीं समझेगा, तब तक वह तंत्र को भी नहीं समझ सकेगा, तथा, केवल कुछ धर्मग्रंथों पर प्रवचन सुनकर अपने आपको बहलाता ही रहेगा।
*ब्रह्मचर्य से मैथुन अ- संबंधित :*
सात्विक सम्भोग, एक से सम्भोग भगवत्ता का पथ है. ऐसे मैथुन से ब्रह्मचर्य का कोई लेना देना ही नहीं है।
जैन संप्रदाय में जैसे सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अचौर्य और ब्रह्मचर्य ये आधार भूत नियम हैं। सनातन संस्कृति में भी काम क्रोध लोभ आदि… ये ब्रह्मचर्य के अंदर हैं, इनके बिना ब्रह्मचर्य संभव नहीं। हम ब्रह्मचर्य शब्द को ही देखते है, ब्रह्म के समान आचार संहिता का जो पालन करें वो ब्रह्मचारी है।
तो ब्रह्म के समान आचार संहिता कैसी होती है?
ब्रह्म तो मैथुन में उतरता नहीं है। यदि आप मानते हैं कि वो सृजन करता है, तो हर सृजन के लिये मैथुन जरूरी नहीं होता है। हनुमान जी ब्रह्मचर्य का सबसे बड़ा उदाहरण हैं, यहां इस शब्द का अर्थ हम मैथुन से नहीं निकाल सकते हैं। उनमें सत्य, अहिंसा, आदि गुण भी हैं ही, इसी लिये वो ब्रह्मचारी हैं।
यदि कोई व्यक्ति जीवन में कभी मैथुन न करें, लेकिन वो मांस मदिरा का सेवन करता है, चोरी करता है, तो वो कभी भी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता है। हम परमात्मा शब्द की जगह ब्रह्म शब्द का भी प्रयोग कर देते हैं। ब्रह्मचर्य का यहां सीधा अर्थ है, उसी के समान नियम संयम का पालन करना। ये शब्द सनातन संस्कृति में जन्म से लेकर पच्चीस वर्ष की आयु तक पालन करने को कहा गया है, इसमें अहिंसा, सत्य, काम रहित, लोभ रहित. ऐसे सभी गुण शामिल किये गये हैं। यही है, ब्रह्म के समान आचार संहिता, जो एक विद्यार्थी को पालन करना चाहिये।
हम यहां पर जैन संप्रदाय और सनातन संस्कृति की तुलना नहीं कर रहे हैं, और तुलना हो भी नहीं सकती है। क्योंकि सनातन संस्कृति ही मात्र अपने आप में पूर्ण है। इसके अलावा सभी मार्ग है। महावीर को लेकर जैन संप्रदाय में ये धारणा है, कि वो बाल ब्रह्मचारी थे, श्वेतांबर ये मानते हैं कि यशोदा नाम की युवती से उनका विवाह हुआ था। यहां ये विषय ही नहीं है, कि वो विवाहित थे या फिर नहीं। महावीर के ब्रह्मचर्य के दस नियम पढ़ने के बाद ऐसा लगता है, “स्त्री के अंग, कटाक्ष, मेकअप आदि वो आप वहीं देख सकते हैं” स्त्री मोक्ष मार्ग की सबसे बड़ी दुश्मन है।
ये नियम भी सिर्फ पुरुषों के लिये ही लिखे गये हैं। ये बात इसलिये कही जा रही है, क्योंकि महावीर का मार्ग उपवास का है, इस मार्ग पर चलते हुए नियम पालन करने नहीं होते हैं, नियम अपने आप ही पालन हो जाते हैं।
आप महावीर के तरीकों से एक सप्ताह का उपवास रख कर देख लीजिये, स्त्री कामांग तो छोड़िये अपना नाम भी ठीक से याद नही आता है।
बुद्ध का मार्ग ध्यान है, स्त्री का चिंतन बाधा हो सकता है, बुध्द यही बात कहते हैं, तो अनुकूल लग सकती है। भर्तृहरि स्त्री को भोगा, स्त्री को त्यागा वो कह सकते हैं। लेकिन इन सब बातों का भी ब्रह्मचर्य से कुछ लेना देना नहीं है। बुद्ध के आश्रम में आम्रपाली से लेकर कई स्त्रियां रही है, यहां तक कि उनकी मां भी रहीं, कोई बाधा नहीं। भर्तृहरि दो मानसिक अवस्थाओं की बात कर रहे हैं, एक स्त्री पिंगला है, जब वो गृहस्थ मार्गी थे तब स्त्री के स्तन की सौंदर्य रस में बड़ी व्याख्या की है, लेकिन जब वो संन्यास मार्ग पर आये, तो वही स्त्री है, वही भर्तृहरि हैं, स्त्री के स्तनों को लेकर कह रहे है, स्तन क्या मांस का लोथड़ा ही तो है।
यहां भी कोई ब्रह्मचर्य की नई परिभाषा नहीं दी गई है, एक ही व्यक्ति की दो मानसिक अवस्थाओं को दिखाया गया है।
यदि मैथुन त्याग कर मोक्ष मिलता तो भीष्म पितामह को तत्काल ही मिल गया होता, छह माह तीरों पर अर्ध मूर्छा में शरीर लटका न रहता । यहां ब्रह्मचर्य का मैथुन या फिर मोक्ष से कुछ लेना देना नहीं। विवेकानन्द ने भी ब्रह्मचर्य को लेकर कुछ कहा है।
विवेकानन्द सन्यासी हैं, उन्होंने कब मैथुन किया होगा?
उनके शब्दों के अर्थ को आप मैथुन से नहीं जोड़ सकते हैं।
यहां एक बात और साफ कर दूं, कई लोगों को ये भ्रम है कि उन्होंने कई सन्यासी देखें हैं, हमारी समझ में नहीं आता है कि आपने कब और कहां से देख लिये। मैं पिछले पंद्रह सौ वर्षों के इतिहास पर नजर डालता हूं तो दो सन्यासी दिखते हैं जो समाज के बीच गये हैं, पहला आदि शंकर और दूसरा विवेकानंद । इनके अलावा कभी कोई सन्यासी समाज में गया नहीं तो आपने कहां से देख लिये।
हम हमेशा कहते हैं कहीं कोई दिखाई दे तो बताना हम भी दर्शन कर लेंगे। आपलोग जितने भी सन्यासी टीवी. पर देखे हैं आशाराम, राम रहीम ये तो सन्यासी नहीं हैं। यदि कोई सन्यासी आश्रम बनाता है, आश्रम भी घर ही तो है। तो फिर आपने मां बाप का घर ही क्यों छोड़ा था ?
तमाम ऋषिमुनि यहाँ तक कि भगवान कहे गए लोग भी सम्भोग किये. वे दुराचारी नहीं, ब्रह्मचारी ही सावित हुए. सम्भोग यानी परमानंद का समान उपभोग. अगर आपका मैथुन स्त्री को बेसुध नहीं करता, आप उसकी तृप्ति के पहले ही सुख लेकर हट गए तो यह आनंद का समान उपभोग नहीं हुआ. यह सम्भोग नहीं, सिर्फ़ स्त्रीभोग हुआ.
निश्चित तौर पर ऐसा करना दुराचार है. यह स्त्री शोषण है और बलात्कार भी. ऐसा कृत्य ब्रह्मचर्य नहीं कहा जाएगा.





