अग्नि आलोक
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*स्वर्णिमयुग : मानवीय गुणों की खान है मदिरा*

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      पुष्पा गुप्ता

आते समय 4-5 सिगरेट लेते आना
बाकी सब है
और ‘जल्दी आना !
कितना अपनापन है
इन शब्दों में.

यार सिर्फ एक क्वार्टर ले आ
बाकि तो बची है.
कितनी ईमानदारी है
इस वाक्य में.

और कुछ चाहिए हो तो बता
ले आऊँगा.
कितनी आत्मीयता है
इन शब्दों में.

स्नैक्स कम-कम खाओ यार
अभी एक क्वार्टर बचा हुआ है.
मितव्ययिता के कितने
प्रेरणादायक शब्द हैं ये.

पुदीन हरे की गोली लेले, बाबा
इलायची लेले, धनिया चबा लें
पान खा ले नहीं तो घरवालों को
गंध आएगी !
घरवालों के प्रति कितना
मान-सम्मान है इन शब्दों में.

जल्दी-जल्दी गटक बे
बहुत देर हो गई
घर भी जाना है!
समय का कितना महत्व
प्रदर्शित है इन शब्दों में.

मेरा वाला भी आधा पैग
तू पी ले.
कितना त्याग है
इन शब्दों में.

पानी कम डाल मेरे यार!
कितने पर्यावरणवादी
विचार हैं इन शब्दों में.

कोई और ऐसी जगह है
जहाँ इतने सारे मानवीय गुण
प्रवाहित होते हों?
नहीं ना!
फिर भी लोग दारू को
ख़राब क्यों कहते हैं ?
कटु सत्य :
मानवीय गुणों की खान है मदिरा.
यह युग सृष्टि का
स्वर्णिम युग है.

Ramswaroop Mantri

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