-सुसंस्कृति परिहार
जब से भाजपा सरकार केन्द्र में सत्ता रुढ़ हुई है तब से सरकारी संस्थानों में कथित हिंदुत्व को अहमियत देकर वोट हथियाने का प्रयास चल रहा है। हम सभी जानते हैं कि सरकार के किसी भी कार्यालय में पहले सिर्फ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की फोटो लगाने की अनुमति दी। किंतु आजकल इनके साथ भगवान के फोटो और मूर्तियां नज़र आने लगी है।वे भी सिर्फ हिंदु धर्म के भगवान ही।
शैक्षणिक क्षेत्र में जहां से धर्मनिरपेक्ष भारत की बुनियाद डाली जाती थी। नैतिक शिक्षा प्राथमिक कक्षाओं से हाईस्कूल तक अनिवार्य थी जिसमें सभी धर्मों और पंथों के प्रमुख को पढ़ाया जाता था।वे किताबें अब हटा दी गई हैं। सरस्वती वंदना ज़रूर होती रही जिसमें निराला की रचना वीणा वादिनि वर दे होती थी जिसमें नव गति,नव लय,ताल छंद नव की बात होती थी जो ने प्रगतिशील भारत की ओर ले जाने की बात कहती थी।

आज सरस्वती के चर्चित मिथक की मुर्तियां विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालय के द्वार पर मौजूद हैं। इस बार तो रिद्धि सिद्धि और बुद्धि के देवता गजानन भी विद्यालयों में प्रवेश कर गए। कल को यदि दूसरे धर्म के अनुयायी भी अपने धर्म को यहां प्रतिष्ठित करने की चेष्टा करेंगे तो इससे तनाव बढ़ेगा। धार्मिक आस्था को इसीलिए शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी संस्थानों से दूर रखा गया था।
पिछले एक दशक में राममंदिर की अपेक्षा उनके भक्त हनुमान जी के मंदिरों की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ है। खासकर पुलिस थानों और अदालतों के परिसर के अंदर।बजरंग बली के आशीर्वाद लिए बिना पुलिस कई थानों में काम नहीं होता।
इन स्थितियों में भारत के संवैधानिक स्वरुप पर सीधे सीधे हमला किया जा रहा है।यह पूरी तरह अनुचित है इस तरह के केंद्र देश में साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ने का निमंत्रण देते हैं खैरियत है बहुसंख्यक लोगों के इस अनुचित काम पर अल्पसंख्यक समुदाय मौन है।आगत समय में कभी भी कड़वाहट बढ़ सकती है।इसे चुनौती दी जा सकती है क्योंकि इसे हमारा संविधान इज़ाजत नहीं देता। संभवतः
इसकी प्रेरणा के स्रोत हमारे प्रधानमंत्री हैं जो राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में जाकर लोगों का ध्यान खींचते हैं।उनके सुरक्षाकर्मी भगवा पोशाक धारण करते हैं।वे सब एक नागरिक की हैसियत से कहीं भी जाएं आपत्तिजनक नहीं होगा। किंतु प्रधानमंत्री की हैसियत और पूरे दल बल के साथ और मंत्रीगण ले जाना गंभीर भूल है। उन्होंने प्रमुख तीर्थस्थलों पर भी जाकर इस तरह का गलत संदेश दिया है।
बहरहाल अब इसके परिणाम सामने आने लगे पिछले दिनों हुए दो उत्सवों में मध्यप्रदेश पुलिस के कदाचरण की घटनाएं ध्यान खींच रहीं हैं एक जगह घटना में पुलिस अधिकारीगण ईद मिलादुन्नबी पर आयोजित जुलूस में घोड़े पर सवार धार्मिक झंडा लिए हुए चल समारोह में शामिल हैं। दूसरी जगह पुलिस बल गनेश जी को विदाई सलामी दे रहा है।यह दृश्य मोहक है।दिल खुश करते हैं। किंतु पहली घटना को लेकर हिंदुओं में आक्रोश है।वह बढ़ भी सकता है। हालांकि ओरछा में रामराजा को पुलिस सलामी दी जाती है।इसी तरह राजस्थान बार्डर पर स्थित तनोट माता मंदिर में पूजा-अर्चना बीएसएफ के जवान करते हैं।
हालांकि दोनों स्थितियां अनुचित है किंतु सरकारी कर्मचारियों का दायित्व यह नहीं है कि वे किसी धर्म विशेष के लिए इस तरह का आचरण सार्वजनिक रुप से कर भारतीय संहिता का उल्लंघन करें। समय रहते इन बातों पर कम से कम शासकीय कर्मचारियों को अपने कर्तव्यों को ध्यान में रखते हुए आचरण करना चाहिए वर्ना आगे चलकर ये बड़ी मुसीबत बन सकते हैं।खुद के लिए भी और देश के लिए भी। सरकारी कर्मचारी इस गलतफहमी में ना रहें कि उनकी इन गतिविधियों से उनके आका ख़ुश होंगे और उनकी तरक्की के रास्ते खुलेंगे।




