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पुलिसिया जुल्म के शिकार लोगों को सरकार  पर्याप्त मुआवजा दे

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,मुनेश त्यागी 

      पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी की अदालत ने यूएपीए यानी अनलाफुल एक्टिविटीज प्रीवेंशन एक्ट के तहत अभियुक्त बनाए गए 121 आदिवासियों को दोषमुक्त कर दिया गया और उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया गया। 121 आदिवासियों पर पांच साल पहले एक हमला करने में नक्सलवादियों की मदद करने का आरोप था।

    इस हमले में सीआरपीसी के 24 जवान मारे गए थे। पांच साल चले इस मुकदमे में अपने को बेगुनाह साबित करने में इन निर्दोष लोगों को पांच साल लगे। इस मुकदमे में पुलिस इन 121 निर्दोष आदिवासियों के खिलाफ कोई सबूत नहीं पेश कर पाई और पुख्ता और अकाट्य साक्ष्य के अभाव में 121 आदिवासियों को बाइज्जत बरी कर दिया गया। पांच अनमोल वर्ष जेल में कटे, काम छूटा, समाज में बदनामी हुई, यह अलग है।

     हकीकत यह है कि इन लोगों का उस घटना से कोई लेना देना नहीं था। ये लोग अपने घरों में थे और पुलिस एक माह बाद, इन्हें इनके घरों से उठा उठा कर ले गई और इन पर बेबुनियाद आरोप लगाकर में जेल में डाल दिया। इन आदिवासियों के पास कोई हथियार नहीं था। उन्होंने उस घटना में कोई भाग नहीं लिया था। ये उस घटना स्थल पर भी मौजूद नहीं थे। बस इन आदिवासी युवकों पर माओवादी होने का ठप्पा लगाकर इन्हें झूठे आरोप लगाकर जेल में बंद कर दिया गया।

     पुलिसिया जुल्म-ओ-सितम और ज्यादतियों  की यह कोई पहली या नई घटना नहीं है। पुलिस लाखों बेगुनाह लोगों को झूठे केसों में फंसा कर लाखों लोगों और परिवारजनों को तबाह और बर्बाद कर चुकी है। 90 के दशक में आयी नेशनल पुलिस कमिशन रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए मामलों में 60 परसेंट अभियुक्तों को गलत निराधार और मनमाने तरीके से फंसा कर जेल में ठूंस दिया जाता है।यह बडा ही अफसोसजनक बात है कि इस पुलिस कमिशन रिपोर्ट पर कभी कोई कार्यवाही नहीं की गई और यह आज भी अलमारियों में धूल फांक रही है और भारत की पुलिस धड़ल्ले से खानापूर्ति और वाहवाही लूटने के नाम पर लाखों निर्दोष लोगों की जिंदगियां बर्बाद कर रही है और कभी कोई पुलिस का बाल भी बांका नहीं कर पाया।

     जनता को इन अनगिनत पुलिसिया जुल्म-ओ-सितम से निजात दिलाने के लिए एक नया कानून बनाया जाए जिसमें संबंधित पुलिसकर्मी और अधिकारी को जिम्मेदार ठहराते हुए, उनके वेतन से 50 परसेंट तनख्वाह काट ली जाए और यह वेतन इन मासूम और बेगुनाह आरोपियों को दिया जाए। इसी के साथ साथ कानून में यह प्रावधान भी किया जाए कि अदालतों द्वारा बरी किए गए इन निर्दोष लोगों को सरकार पर्याप्त मुआवजा दें और ऐसे निर्दोष लोगों को सरकारी नौकरी पर रखा जाए, पुलिस की छानबीन यानी इन्वेस्टिगेशन विभाग को छानबीन की आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीक से लैस किया जाए और पूरी न्यायिक व्यवस्था को संवेदनशील बनाया जाए।

     अगर, इस प्रकार के कानून नहीं बनाए गए और दोषी पुलिसकर्मियों और पुलिस अधिकारियों को समुचित दंड नहीं दिया गया और उनके वेतन से कटौती नहीं की गई तो भारतीय समाज में पुलिस की इन जुल्मों-ओ-ज्यातियों  को कभी भी बंद नहीं किया जा सकता और पुलिस की ये जुल्म और ज्यादतियां इसी प्रकार दिनों दिन बढ़ती जाएंगी और पुलिस निर्दोष लोगों को जेल में ठूंस कर वाहवाही लूटी रहेगी और भारत में कानून का शासन, न्यायपालिका और संविधान के प्रावधान और तमाम मानवाधिकार, बस एक तमाशा बनकर रह जाएंगे।

Ramswaroop Mantri

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