मुनेश त्यागी
आजकल कई सांप्रदायिक सरकारों ने निराला, कबीर, फैज अहमद फैज, प्रेमचंद, रहीम मुक्तिबोध आदि प्रगतिशील लेखकों, शायरों, कवियों और साहित्यकारों की रचनाओं को स्कूली पाठ्यक्रमों से बाहर निकालने की घोषणा कर दी है। ये सरकारें इन कवियों, लेखकों, शायरों और साहित्यकारों की कविताओं, लेखन और रचनाओं से डरने लगी हैं, खौफ खाने लगी हैं और उनसे वह लगातार भयभीत रहती हैं।
अविभाजित भारत में पैदा हुए फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को पाठ्यक्रम से बाहर निकाला जाना समझ में नहीं आ रहा है। आज हम उन्हीं की बात करेंगे। फैज अपने समय के क्रांतिकारी आंदोलन के, आजादी के, समाजवाद के, मोहब्बत के, दिशा और हौसला बढ़ाने के कवि हैं। आखिर भारत की सरकारें फैज़ अहमद फैज़ की रचनाओं से क्यों डर रही है?
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ अरबी और अंग्रेजी में एम ए थे। 1936 में उन्होंने पंजाब लेखक संघ की स्थापना की। 1940 में लाहौर में प्राध्यापक बने। ब्रिटिश आर्मी में कैप्टन मेजर और कर्नल बनें। 1947 में फौज से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपनी रचनाओं में हजारों साल पुराने अन्याय, शोषण, जुल्म, गरीबी, मुफलिसी, भूखमरी, भेदभाव, सामंतशाही आदि का लगातार विरोध किया और इंकलाबी परिवर्तन द्वारा जनता का राज्य कायम करने की पैरवी की। इससे पाकिस्तान का शोषक शासक वर्ग उनसे डर गया। अपनी कविताओं के कारण, अपने लेखन के कारण और जनता के राज्य की स्थापना के हामीं होने के कारण 1951 में उन्हें झूठे रावलपिंडी षड्यंत्र केस में गिरफ्तार किया गया और वह 4 साल जेल में रहे। 1958 में उन्हें गिरफ्तार करके फिर जेल भेजा गया। अपने लेखन, शायरी और कविता के के कारण और जनता के बुनियादी हकों की आवाज उठाने के कारण, उन्हें 1962 में लेनिन पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया।फ़ैज़ अहमद फैज आशा और विश्वास के कवि हैं,शायर हैं। देखिए उनकी ये पंक्तियां,,,
यूं ही हमेशा जुल्म से उलझती रही है खल्क
न उनकी रस्म नई, न अपनी रीत नई ,
यूं ही हमने हमेशा, खिलाए हैं आग में फूल
न उनकी हार नई, न अपनी जीत नई।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ उम्मीद और विश्वास के कवि और शायर हैं। वे आशा और विश्वास का दामन नहीं छोड़ते। वे कहते हैं ,,,,
दिल ना उम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है
लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है।
और देखिए, सारी पाबंदियों के बाद भी वे लिखने पढ़ने और अपने रचना कर्म को जारी रखने की बात करते हैं। आगे वे क्या कहते हैं,,,,,
छीन गई मताए लौहो कलम तो क्या के
खूने दिल में डुबोली हैं उंगलियां मैंने,
जबां पे मोहर लगी तो क्या के रख दी है
हर हल्का ऐ जंजीर में जबां मैंने।
और देखिए वे जिंदगी में यूं ही जीना पसंद नहीं करते, बल्कि वे जिंदगी में कुछ कर गुजरने की बात करते हैं, ताकि लोग उन्हें याद करें। वह कहते हैं,,,,
यूं तो जमाने में सभी आते हैं मरने के लिए
मौत तो उनकी है जिन का जमाना अफसोस करे।
और देखिए उनकी शायरी को पढ़कर कितना विश्वास और हौंसला पैदा होता हैऔ और वे मंजिल पर पहुंचकर ही दम लेना चाहते हैं। देखिए जरा,,,,,,
वो इंतजार था जिसका, यह वो सहर तो नहीं
चले चलो कि वह मंजिल अभी आयी नही।
और देखिए, वे नेताओं पर, सत्ता में बैठे हुक्मरानों, पर किस तरह से चोट करते हैं, वे कहते हैं ,,,,हर चारागर को चारागरी से गुरेज था
वरना हमें जो दुख थे, वे लादवा न थे।
और देखिए, वे प्यार भी करते हैं, प्यार की बात करते हैं, मगर प्यार से पहले अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने की बात करते हैं। वे कहते हैं,,,,
और भी गम है जमाने में मोहब्बत के सिवाय
मुझसे पहली सी मोहब्बत, मेरे महबूब न मांग।
और वे क्रांति के शायर हैं, अन्याय की खिलाफत करते हैं, शोषण के खात्मे की बात करते हैं और समाज के क्रांतिकारी परिवर्तन की बात करते हैं और क्रांति को किस तरह, किस हद तक प्यार करते हैं, देखें जरा,,,,,
वो तो वो हैं तुम्हें भी हो जाएगी उल्फत मुझसे, एक नजर तुम मेरा महबूबे नजर तो देखो।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ आशा और विश्वास के कवि हैं, हौसले को बढ़ाने वाले कवि हैं, वे कहते हैं,,,, कटते भी चलो बढ़ते भी चलो
बाजू हैं बहुत हैं सर भी बहुत,
बढ़ते ही चलो के अब डेरे
मंजिल पर ही डाले जाएंगे।
अब टूट गिरेंगी जंजीरें
अब जिन्दानों की खैर नहीं,
जो दरिया झूम के उठे हैं
तिनकों से न टाले जाएंगे।
और पिछले दिनों उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध हुई नजम भी कमाल की है जिसे हमने सैकड़ों लोगों से, लड़कियों से गाते सुना है, देखा है, जिसमें वे कहते हैं,,,,
हम देखेंगे हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
और उनका पूरी दुनिया में सबसे मशहूर हिंदी और उर्दू का अंतरराष्ट्रीय गीत, जिसे उर्दू और हिंदी भाषी इंकलाबी मजदूर और किसान पूरे पाकिस्तान, पूरे भारत और पूरी दुनिया में गाते हैं। उनका या गीत किसानों मजदूरों को इतना प्यारा है कि एक बार बिहार में कई किलोमीटर लंबा किसानों मजदूरों का जुलूस इस गीत को गा रहा था। वह अंतरराष्ट्रीय गीत इस प्रकार है,,,,,
हम मेहनतकश जगवालों से
जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नही एक देश नहीं
हम सारी दुनिया मांगेंगे।
यहां सागर सागर मोती है
यहां पर्वत पर्वत हीरें हैं,
यह सारा माल हमारा है
हम सारा खजाना मांगेंगे।
जो खून बहा जो बाग उजड़े
जो गीत दिलों में कत्ल हुए,
हर कतरे का हर गुंचे का
हर गीत का बदला मांगेंगे।
ये सेठ व्यापारी रजवाड़े दस लाख
तो हम दस लाख करोड़,
ये कितने दिन अमेरिका से
लड़ने का सहारा मांगेंगे।
जब सफ सीधी हो जाएगी
जब सब झगड़े मिट जाएंगे,
हम हर एक देश के झंडे पर
एक लाल सितारा मांगेंगे।
हम यहां पर कहना चाहेंगे इस देश के सभी छात्र छात्राओं को साहिर लुधियानवी, कबीर, रहीम, प्रेमचंद, निराला, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, मुक्तिबोध आदि कवियों, लेखकों, शायरों और साहित्यकारों को पढ़ना चाहिए, तभी वे बेहतरीन इंसान बन सकते हैं, तभी एक बेहतर समाज और एक बेहतर देश और एक बेहतर दुनिया का निर्माण करने में सहयोग दे सकते हैं और केवल तभी वे सच्चे हिंदुस्तानी और एक असली इंसान बन सकते हैं। सरकारों के प्रगतिशील कवि और लेखक और शायरों को स्कूली पाठ्यक्रमों से निकाले जाने के कदम से सहमत नही हुआ जा सकता।




