मुनेश त्यागी
राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड की ताजा रिपोर्ट के अनुसार देश की विभिन्न अदालतों में इस समय 4 करोड़ 47 लाख मुकदमें लंबित हैं। रिपोर्ट में जानकारी दी गई है कि देश की 25 हाई कोर्ट में 62 लाख मुकदमें लंबित हैं। इनमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय शीर्ष पर है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इस वक्त लगभग 10.74 लाख मुकदमें लंबित हैं।इसके बाद मुंबई उच्च न्यायालय में 7.3 लाख मुकदमें लंबित हैं और राजस्थान हाई कोर्ट में 6.67 लाख मुकदमें लंबित हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2018 के बाद मुकदमों की संख्या बढ़ी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित मामलों में 51% की बढ़ोतरी हुई है, मुंबई उच्च न्यायालय में 54% बढ़ोतरी हुई है। इन लंबित मामलों में 72 फ़ीसदी दीवानी मामले हैं और 28% फौजदारी मामले हैं। 2018 के बाद सभी न्यायालयों में और उच्च न्यायालय में लंबित मामलों में बढ़ोतरी हुई है। इन मामलों में 25% मामले 5 से 10 वर्षों से लंबित हैं, 20% मामले 10 से 20 वर्षों से लंबित हैं।
इस सारी रिपोर्ट को पढ़ने के बाद सबसे मुख्य सवाल यह उठता है कि आखिर भारत की सरकार इन मामलों के जल्दी निपटारे में निष्क्रिय क्यों बनी हुई है? लगातार मांग करने और लगातार आंदोलन के बाद भी देश और राज्यों की सरकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है और जनता सस्ते और सुलभ न्याय के लिए भटकती चली आ रही है।
भारत का संविधान कहता है कि सरकार जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देने के लिए समुचित कार्यवाही करेगी और तमाम तरह के कदम उठाएगी। मगर आजादी के 77 साल बता रहे हैं कि सरकारें जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देने के लिए कतई भी चिंतित नहीं हैं। आखिर इन चार करोड़ 47 लाख मुकदमों के लंबित होने के क्या कारण है? इस सबसे अहम सवाल पर ध्यान देने की सबसे ज्यादा जरूरत है।
जब देश की पूरी न्याय प्रणाली पर नजर दौड़ाते हैं तो सबसे पहला कारण यह है कि आज मुकदमों के अनुपात में न्यायालय नहीं हैं, मुकदमों के अनुपात में जज नहीं हैं और अधिकांश न्यायालयों में पर्याप्त संख्या में स्टेनों, पेशकार और सरकारी कर्मचारी नहीं हैं और सबसे बड़ी अचंभित करने वाली बात यह है कि वकीलों द्वारा लगातार मांग करने के बाद भी सरकार इन मुद्दों को पर ध्यान नहीं दे रही है, वह इन्हें लटकाए रखना चाहती है।
बड़े अचंभे की बात है कि बहुत सारी अदालत में बहस करने के बाद भी समय से जजमेंट पास नहीं होते हैं। इसका सबसे मुख्य बड़ा कारण है कि अदालतों में पर्याप्त संख्या में स्टेनो नहीं हैं। कई न्यायालयों में तो यह भी देखा गया है कि पिछले 7-8 सालों से न्यायालयों और ट्रिब्यूनलों में स्टेनों ही नहीं हैं जिस कारण जज साहिबान चाह कर भी मुकदमों में फैसला नहीं दे पाते। ऐसे मामलों में वकीलों को बार-बार बहस करने के लिए मजबूर होना पड़ता है और इस प्रकार वादकारियों को अन्याय का शिकार होना पड़ रहा है।
यह बात भी गौर तलब है कि इन मामलों के लंबित होने का सबसे बड़ा कारण न्यायाधीशों की पर्याप्त संख्या का न होना भी है, यानी कि जिस संख्या में अदालतों में मुकदमे लंबित हैं, उस अनुपात में इन मुकदमों को निपटने के लिए न्यायाधीश नहीं हैं। यहीं पर सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है कि आखिर मुकदमों के अनुपात में न्यायाधीश क्यों नहीं हैं ? इनकी समय से नियुक्ति क्यों नहीं की जाती है? और सरकार इस और क्यों ध्यान नहीं दे रही है?
भारत का सर्वोच्च न्यायालय, कई मुख्य न्यायाधीश और भारत का लो कमिशन अपनी रिपोर्ट में सिफारिश कर चुके हैं कि भारत में मुकदमों के अनुपात में न्यायाधीश नहीं हैं, इनकी संख्या बढ़ाई जानी चाहिए, मगर अफसोस की बात है कि इन तमाम सिफारिशों के बावजूद भी सरकार न्यायाधीशों की संख्या नहीं बढ़ा रही है और जान पूछ कर वादकारियों के साथ अन्याय कर रही है। यह एक गंभीर विषय है।
मुकदमों के लंबित होने का सबसे बड़ा कारण है कि भारत की केंद्र सरकार और अधिकांश राज्य सरकारें जनता को सस्ता और सुलभ न्याय नहीं देना चाहतीं, सस्ता और सुलभ न्याय देना उनके एजेंडे में ही नहीं है, उनके कार्यक्रमों में ही नहीं है। हमारा मानना यह है कि जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देने के लिए जनता को संघर्ष के मैदान में उतरना होगा, किसानों मजदूरों के साथ साथ तमाम वादकारियों को एक अभियान चलाकर, सरकारों से बात करनी होगी और उन्हें मजबूर करना होगा कि कि वे मुकदमों के अनुपात में न्यायालयों की स्थापना करें, मुकदमों के अनुपात में जजों की नियुक्तियां करें और हर एक न्यायालय में पर्याप्त संख्या में स्टेनों ,पेशकार और सरकारी कर्मचारी नियुक्त करें।
मुकदमों के लंबित होने की समस्या को खत्म करने के लिए यही सबसे ज्यादा जरूरी है कि मुकदमों के अनुपात में नये न्यायालय बनायें जाएं और मुकदमों के अनुपात में विशेष न्यायाधीश नियुक्त किए जाएं और एक समय सीमा जैसे 90 दिन के अंदर मुकदमा तय होना चाहिए। यह समय सीमा बना देनी चाहिए और जब ये मुकदमें खत्म हो जाएंगे तो फिर इन न्यायाधीशों की जरूरत भी नहीं रहेगी। इस तरह से जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देने का काम सिर्फ और सिर्फ सरकारों का है।
मगर असली सवाल यही है कि सरकार जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देना ही नहीं चाहती। वह संविधान के सस्ते और सुलभ न्याय के सिद्धांत को धरती पर ही उतारना ही नहीं चाहती। जनता को सस्ता और सुलभ न्यायालय देने के लिए सिर्फ और सिर्फ केंद्र और राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं।





