अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

गौ उत्थान में संलग्न बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की जय हो !

Share
सुसंस्कृति परिहार
गौमाता की उपयोगिता का पाठ बिना किसी विश्वविद्यालय के हमारे पूर्वजों ने  जो हमें प्रदान किया है उसी की सीख है कि गांव हो या मझौले शहर गाय आज भी पाली जा रही है और उसके दूध और गोबर का उपयोग आमतौर पर होता है। खासियत यह कि इसे सभी धर्मावलंबी बराबर पालते रहे हैं।वह सिर्फ एक कौम की नहीं रही। ये बात और है कि भैंस और विदेशी नस्ल की गाय आने के बाद लोकल गायों से दूरी बढ़ी क्योंकि ये कम दूध देती हैं जबकि भैंस और विदेशी नस्ल की गायों की दूध उत्पादन क्षमता कई गुनी अधिक होती है।इससे डेयरी उद्योग शहरों में शुरू हो गया और गौ माता हम सब से दूर होती चली गई।गांव के बड़े या मझौले किसानों ने भी घरों में डेयरियों का अनुकरण करते हुए भैंसों का पालन शुरुकर दिया जिस वजह से गायों की संख्या में भारी गिरावट आई। दूसरी वजह यह भी रही कि खेतों में हल बखर की जगह टे्क्टरों ने ले ली जिससे गौवंश बैल की ज़रूरत खत्म हो गई।देशी खाद की आपूर्ति रसायनिक खादों से होने लगी।
कहने का आशय यह कि कृषि क्रांति की शिकार गौमाता हुई।जब लोगों  को गौ दुग्ध और घी की महत्ता समझ आई तो गौ को पालने का चलन फिर कुछ हद तक बढ़ा लेकिन कुल मिलाकर गौवंश का पतन शुरू हो गया।अब चूंकि गाय पूज्य है इसलिए उसके बछड़े भी पूज्य हुए।यू पी में गौमांस का चलन बहुत कम है इसलिए वहां गौवंश इतना बढ़ गया कि वह खेतों को चरपट करने लगा जो एक बड़ी समस्या के रूप में यहां मौजूद है।जिसे पूज्य माना जाता है उत्तर प्रदेश में उसे रात में खेतों की रखवाली करने वाले लोग ऐसा पूजते हैं कि देखते ही बनता है।इसी तरह की समस्याओं से गौशालाओं के निर्माण की कथा का आरंभ किया।वे बनाई गई आवारा अनुपयोगी गौवंश को रखने हेतु किंतु दुर्भाग्य ये रहा कि इन सुरक्षित बाड़ों में बड़े किसानों की गायों को सरकारी भोजन मिलने लगा अन्य गौवंश तो अधिकतर गौशालाओं में भूख से मरने लगा।यहीं जन्म लिया गौमूत्र के धंधे वा गोबर के विविध उपयोग का जिसमें सरकार ने राष्ट्रीय प्रचारक के रूप में पतंजलि पीठ को शामिल किया। भोपाल सांसद प्रज्ञा ठाकुर तो गोबर के सीधे सेवन के फायदे बताकर काफी लोकप्रिय भी हुई। गौमूत्र संचयन और गोबर खरीदी केन्द्र भी आजकल तेजी से खुल रहे हैं।हंसी आती है जब कोई बच्चा पढ़ने में कमज़ोर होता था तो उसे गोबर गणेश कहा जाता था।आज तो गोबर विश्वविद्यालय की रौनक और रोज़गार बन गया है ।
पिछले दिनो बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के छात्रों का एक वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें छात्र गोबर से उपले बनाना सीख रहे हैं। वीडियो को यूनिवर्सिटी के ही एक विभाग द्वारा ट्वीट किया गया है। इस वीडियो को देखने के बाद लोग यूनिवर्सिटी पर भड़कते हुए दिख रहे हैं।वि वि के सामाजिक विज्ञान संकाय के प्रमुख की तरफ से शेयर किए गए इस वीडियो में छात्र उपले बनाना सीख रहे हैं। इसमें एक शख्स को कहते हुए सुना जा सकता है कि ये जब सीखकर गांव में जाएंगे, तब वहां लोगों को ये ट्रेनिंग देंगे। इससे आर्थिक लाभ भी होगा। आगे शख्स कह रहा है कि इससे रोजगार भी मिलेगा । 
अभिषेक गौंंड(@Abhishe13914241)नाम के यूजर ने लिखा- “गांव में लोग कहते हैं भोजपुरी में कि ” पढ़ ल बाबु ना तो चिपरी पथबा, गोबर कछब ” आज ये देखने को भी मिल रहा है, वो भी पढ़े लिखे लोगों के द्वारा और देश की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी में ..!”
 इस समाचार ने रोमांचित कर दिया जब विश्वविद्यालय के एक प्रो० साहिब के हाथों में गोबर के लड्डू देखें जिन्हें वे उपले या कंडे बता रहे थे और शिष्य उस पर अपना माथा पीट रहे थे।क्योंकि उन्होंने उपले बनाते सैकड़ों महिलाओं को देखा था जो बड़े करीने से दीवारों और जमीन पर एक ही साइज़ के हजारों कंडे बनाती हैं।फर्क बस गोबर का हो सकता है वहां गाय और  भैंस दोनों का  होता है। विश्वविद्यालय में शायद गौमाताएं पहले ही पाली गई होंगी क्योंकि यहां जिस पावन गोबर का इस्तेमाल हो रहा है वह गौमाता का बताते है।
उम्मीद है काशी विश्वविद्यालय से प्रेरणा लेकर देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी गौमाता की पुर्नप्रतिष्ठा की स्थापना अत्यंत आवश्यक है। गौशालाओं का निर्माण तेजी से होना जरूरी है क्योंकि बहुत सी गौमाताओं को अव्यवस्थायें लील जाती हैं यह शर्म का विषय है। आजकल बहुत से सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं सरकार चाहे तो इनका इस्तेमाल गौ के सुरक्षित आवास में किया जा सकता है।खेल प्रांगणों को उत्तम चारागाह में परिवर्तित कर उनके खाद्यान की समस्या हल हो सकती है। वैसे भी डिजिटल इंडिया में समस्त शालाओं को बंद कर ही दिया जाना उचित है।
ध्यान रखें ये गौशाला केन्द्र अब बड़े व्यापार केन्द्र बन  रहे हैं  तो रोजगार भी मिलेगा।गाय माता जीते जी तो बहुत कुछ देती ही है मरने पर उसके शरीर का चमड़ा,आंतें,और हड्डियां भी उपयोग में आती हैं गोवा नागालैंड जैसे राज्य उसका मांस भी सरकार से मांगते हैं तो इस सबका फायदा जो दूसरे लोग उठाते रहे हैं वह सरकार को मिलेगा और हमारी कमजोर होती अर्थव्यवस्था मज़बूत बनेगी। गुजरात की गिर गाय के मूत्र में  सोना भी मिलता हे।यह बेशकीमती चीज़ है आजकल अमेजान पर गोबर के कंडे और गौ मूत्र ऊंचे दामों पर उपलब्ध है। पतंजलि को भी इन उत्पादों पर विशेषज्ञता हासिल है। इस्तेमाल करें और गौमाता को उन्नत स्थान प्रदान करने में सहयोग प्रदान करें।
उम्मीद है काशी की शिक्षा दीक्षाओं में महिलाओं की भागीदारी भी सुनिश्चित होगी क्योंकि हमारी ग्रामीण महिलाएं इस विधा में जन्मजात पारंगत हैं वे प्रोफेसरों को मार्गदर्शन देंगी।इस तरह शिक्षा का प्रसार गांव से शहरों तक पहुंचेगा। यह क्रांतिकारी बदलाव होगा ।क्योंकि गाय ब्रह्मांड के संचालक सूर्य नारायण की सीधी प्रतिनिधि है इसका अवतरण पृथ्वी पर इसलिए हुआ है ताकि पृथ्वी की प्रकृति का संतुलन बना रहे पृथ्वी पर जितनी भी योनियाँ हैं सबका पालन. पोषण होता रहे।विश्वास है विश्वविद्यालय गाय माता की रक्षा के संकल्प के साथ उपभोक्ता बाजार में उसका भरपूर दोहन कर राष्ट्र विकास में यथाशक्ति सहयोग करते रहेंगे।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें