शशिकांत गुप्ते
एक विनोद का स्मरण हुआ।एक बार एक पंगु,एक लूला,एक अंधा एक बधिर और एक नँगा ऐसे पाँच मित्रों ने गांव के बाहर जाकर भांग पी ली।नशा कोई भी नशे सुरूर के कारण नशा करने वाले को गुरुर हो ही जाता है।इन पांचों मित्रों को भी भांग के नशा चढ़ गया।नशे के सुरूर के गुरुर में बधिर बोला मुझे डाकू दल का शोर सुनाई दे रहा है।अंधा कहने लगा सच में मुझे बीस डाकू दिखाई दे रहें हैं।पंगु बोला चलो भाग चलो,लूला बोला भागो मत डाकुओं से दो दो हाथ करेंगे।इन चारों की बातें सुनकर नँगा मित्र बोला तुम लोग कुछ नहीं करोगे,मुझे ही लुटवाओगे।
एक समझदार व्यक्ति इन पांचों मित्रों को एक जगह कतार में खड़ा किया।इन लोगों का नशा उतारा।सबसे पहले पंगु से पूछा तुम जन्मजात पंगु हो या किसी बीमारी या दुर्घटना के कारण पंगु हुए हो? पंगु ने जवाब दिया मैं विज्ञान विषय में स्नातकोत्तर (Postgraduate) परीक्षा उत्तीर्ण हूँ।रोजगार प्राप्त करने के लिए दर दर भटकने के बाद भी रोजगार नहीं मिला।एक रसायन शास्त्र के वैज्ञानिक ने जरूर गंदे नाले की गैस से ईंधन प्राप्त कर पकौड़ो का स्वरोजगार शुरू करने की सलाह दी।संयोग से मैं स्वयं रसायन शास्त्र का विद्यार्थी हूँ।मुझे मालूम है,गंदे नाले के पास कोई भी खाद्य पदार्थ बनाना Hygienic नहीं होता है, मतलब स्वास्थ्य विज्ञान के अनुसार उचित नहीं है।एक ओर स्वच्छता के लिए अभियान चलाना दूसरी ओर गंदे नाले के पास खाद्य पदार्थ बनाने की सलाह देना कितना योग्य है? यह आप ही बताइए?पंगु उस समझदार व्यक्ति को संबोधित करते हुए कहने लगा श्रीमान रोजगार प्राप्त करने के लिए दर दर भटकते के कारण मैं पंगु हो गया हूँ।
लूले से पूछने पर, लूले ने जवाब दिया मैं भी स्नातकोतर पास हूँ।पीएचडी के लिए प्रयासरत हूँ।थीसिस लिखते लिखते हाथों की स्थिति यह हो गई है।कारण थीसिस मैंने स्वयं अनुसंधान कर लिखी है।मेरी आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय है।आजकल पीएचडी के लिए पढ़ाई के अलावा वह सब कुछ करना पड़ता है,जो भ्रष्ट्राचार की परिभाषा में आता है।पीएचडी के लिए जो गाईड मिलतें हैं,उन्हें पाँच सितारा स्तर के होटल में पिलाना और खिलाना पड़ता है।जब यह सब करना पड़ता है तब एक स्लोगन का स्मरण होतें ही आश्चर्य होता है,और हंसी आजाती है। ना खाऊंगा न खाने दूंगा
श्रीमान मेरे पास सारी योग्यता होने के बाद भी मुझे रोजगार नहीं मिला।जहाँ भी प्रयास किया मुझे झिड़क दिया गया,लोगों में मेरे हाथ झटक कर मुझे लूला कर दिया।
बहरा बोला श्रीमान मेरे तो कान दावे सुन सुन कर पक गए लेकिन जब वादों को बहुत ही मजाकिया अंदाज में बेशर्मी के साथ जुमले कहा गया, तब यह सुन मेरे कानों की नस फट गई और मैं बधिर हो गई हूँ।अंधे कहा श्रीमान समाचारों में पढ़कर और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रगति की रफ्तार देख सुनकर और विकास को सिर्फ कागज़ों पर जिस ऊँचाई पर पहुँचाया हैं, उस बनावटी ऊँचाई को देखकर मेरी आँखें चौन्धिया गई,और मेरे आँखों की रोशनी चली गई।
नँगा के पास कहने के लिए क्या बचा है, यह सोच उस समझदार ने नँगे से पूछना ठीक नहीं समझा?लेकिन नँगे ने समझदार को रोक ते हुए कहा मेरे पास सारे अनुभव है।मै मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मा हूँ।मध्यम वर्गीय के लिए एक कहावत प्रचलित है।माँ कहती है घर में खाने को कुछ नहीं है और पिताश्री कहतें हैं, बेटा किसी से मांगोगे तो ईज्जत चली जाएगी।मध्यम वर्गीय अपनी थोथी ईज्जत का बचाएं रखने के प्रयासों में ही जीवन गुजार देता है।मैने सुना है कि,जो नग्न होता है उसके नवग्रह ही बलवान होतें है।इसीलिए मैं बनावटी नहीं,ऑफिसियल नग्ना हो गया हूँ।यही वस्तुस्थिति है श्रीमान अपने देश में मध्यम वर्गीयकी।
समझदार व्यक्ति इन पंचों का यथार्थ सुनकर अपने होश खो बैठा।अभी अस्पताल में भर्ती है।वेंटिलेटर पर है।कभी भी खबर आ सकती है।वेंटिलेटर वह चिकित्सीय शस्त्र जो मरीज के परिजनों को Wait करवाता है,कि मरीज कभी भीlate हो सकता है?
शशिकांत गुप्ते इंदौर





