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*डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की गारंटी ?पूरी करें ! है हिम्मत ?*

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कनक तिवारी

एक बहुत दिलचस्प स्थिति और है। नरेन्द्र मोदी भारतीय जनता पार्टी के सर्वमान्य नेता हैं। इस पार्टी के पूर्वज का नाम भारतीय जनसंघ है। उसके संस्थापक तब हिन्दू महासभा में रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मदद से आए डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी हैं। डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अनोखा और ऐतिहासिक काम तो किया था। मैं संघ और भाजपा की विचारधारा से कई मुद्दो से इत्तफाक नहीं रखता। लेकिन डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जो संविधान बनाने के वक्त संविधान को लेकर कहा था, उसकी अनदेखी करने में कांग्रेस और डाॅ. अम्बेडकर से गलती तो हुई है। परिस्थितियां कुछ भी रही हों।

डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने नोट में 17 अप्रेल 1947 को जो लिखा था, वह लागू हो जाता तो भारत का लोकतंत्रीय चेहरा कुछ अलग होता। अब पूर्वज की यह चुनौती मोदी जी के ही सामने है। अगर वे अपने पितातुल्य पूर्वज की ही बातों को लागू नहीं कर सकते, तो बाकी छोटी मोटी गारंटी का क्या लेना देना?

कहा था डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कि भारत का कोई राजधर्म नहीं होगा। अर्थात उसका अर्थ यही तो हुआ कि भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित नहीं किया जा सकेगा। तब यह अनपेक्षित ढंग से बड़बोलापन क्यों हो रहा है कि भारत हिन्दू राष्ट्र बनेगा। उन्होंने कहा था राज्य हर मजहब के लिए निष्पक्ष, निरपेक्ष और तटस्थ रहेगा। यह बात उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अगस्त 1931 के बम्बई सम्मेलन से प्रेरित होकर कही थी। यह सामंजस्य का कितना बड़ा उदाहरण है!

आज सभी सियासी पार्टियां आपस में खुट्टी किए बैठी हैं। भले जनता का नुकसान हो। उन्होंने कहा था हर व्यक्ति को पत्र व्यवहार की गोपनीयता की गारंटी है। आज तो विपक्षी नेता खुले आम शिकायत कर रहे है कि उनके टेलीफोन तक टैप किए जा रहे हैं। मामला अब तो यहां तक है कि इजरायली खुफिया तंत्र पेगासस सबकी जासूसी कर रहा है और सुप्रीम कोर्ट ही सरकार पर भरोसा किए बैठा है।

कहा था डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कि सरकारी नौकरियां 50 प्रतिशत तुलनात्मक मेरिट के आधार पर भरी जाएं। बाकी 50 प्रतिशत नौकरियां आबादी की संख्या के अनुपात में भरी जाएं। धीरे धीरे इस आरक्षण को खत्म किया जाए और बीस वर्षों बाद आरक्षण खत्म किया जा सके। इस बात की गारंटी क्या कभी दी जा सकती है ? ऐसा हो तो अल्पसंख्यकों को 15-17 प्रतिशत नौकरियां मिल जाएंगी। उससे भी आपका वोट बैंक पक्का हो सकता है। डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की उपेक्षा क्यों की जाए?

डाॅ. मुखर्जी ने स्पष्ट कहा था ‘भारत एक मजहबपरस्त राज्य नहीं बनेगा।‘ कहा था उन्होंने ‘सभी अल्पसंख्यकों को अपने खर्च पर परोपकारी धार्मिक और सांस्कृतिक शिक्षा के लिए स्कूल को चलाने में बराबरी का अधिकार होगा। वहां अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चे अपनी भाषा और लिपि का शिक्षा पाने के लिए इस्तेमाल कर सकेंगे।‘ शिक्षा के मामले में उन्होंने सोवियत संविधान के अनुच्छेद 121 को चुना था। इस तरह उनकी समझ का दायरा देश के बाहर भी था।

आपकी सरकार की वैचारिकता में भी क्या चीन और रूस आदि के संविधान से कुछ लिया जा सकता है ? डाॅ. मुखर्जी वैचारिक रूप से प्रगतिशील भले नहीं कहे जाते, लेकिन उन्होंने यह कहा था कि धार्मिक स्थलों में टूटफूट हो जाने पर उनकी मरम्मत करने की गारंटी भी देनी चाहिए। बेचारी बाबरी मस्जिद को यह नहीं बताया गया! यही तो विवेकानन्द ने भी कहा था कि केन्द्र और राज्य में अल्पसंख्यक आयोग बनाने को लेकर उनकी सिफारिश चीन के संविधान से ली गई। यह भी उनके दिमागी खुलेपन का एक उदाहरण है। उन्होंने तो मांग की थी कि शुरुआत में विधायिकाओं में हर समुदाय का आनुपातिक प्रतिनिधित्व हो और अल्पसंख्यकों का भरोसा इस तरह जीता जाए। अब तो यह है कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक!

सरदार पटेल ने डाॅ. मुखर्जी का सुझाव खारिज करते हुए कहा कि आबादी के अनुपात में नौकरियां दिए जाने का संवैधानिक प्रावधान दुनिया के किसी संविधान में है, यह मुझे नहीं मालूम। आज सरदार पटेल की दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति नरेन्द्र मोदी जी ने गुजरात में लगाई है लेकिन डाॅ. मुखर्जी के द्वारा दी गई सुरक्षाएं हलचल और गुमनामी के अंधेरे में डूब गई हैं। देश के छोटे छोटे बच्चों को शिक्षा का मूल अधिकार देने की मांग सबसे पहले डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1931 में उठाई थी। वह अब संविधान के अनुच्छेद 21 क में 2002 से आधा अधूरा शामिल हुआ है। आज इतने सरकारी स्कूल क्यों नहीं हैं कि उनकी यह गारंटी भी पूरी कर दी जाए? निजी स्कूलों का कारोबार कितना और कब तक फैलेगा ? डाॅ. मुखर्जी तो शिक्षा का खर्च सरकार के बजट के 30 प्रतिशत तक करने को कहते थे, जो दुनिया में सबसे ज्यादा होता। मोदी जी बताएं शिक्षा का केन्द्रीय बजट कितना है ? लेकिन खैर! डाॅ. मुखर्जी की सोच एक भग्न हो गया सपना है। यह भी कहा था उन्होंने कि छुआछूत की जातीय बीमारी तो गैरहिन्दुओं में नहीं होती, हिन्दुओं में ही जातीय बीमारी क्यों है ? साथ ही साम्प्रदायिक भी जिसके कारण अल्पसंख्यकों की माॅब लिंचिंग भी हो रही है।

नागरिक अधिकारों पर सरकारी डकैती का विरोध भी डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने किया था। वे होते तो ई.डी. और सी.बी.आई. के अधिकारियों को लेकर ऐसा कुछ कहते जिसका उल्टा आज हो रहा है। उन्होंने कहा था कि यदि कोई सरकारी अधिकारी नागरिक अधिकार छीनता है तो नागरिक को सरकार से हर्जाना मांगने के साथ साथ उस अधिकारी के खिलाफ अनुशासात्मक कार्रवाई के अलावा दीवानी और फौजदारी मुकदमा करने का हक भी दिया जाए।

है हिम्मत,
आज किसी को यह नागरिक गारंटी देने की?

Ramswaroop Mantri

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