( यूटिएस को सड़ने और शरीर को खोखला होने से बचाएं )
♂ आरती शर्मा (बोधगया)
_योनि में हमेशा गीलापन, लसलसापन, रिसाव, खरासपन, या बदबू की सेचुयेशन रहती है तो यह एक तरह से रोग है और भविष्य की सड़न का सूचक है. योनि को साफ, पाक और गुलाब की खुशबू से लबरेज रहना चाहिए._
यह लेख दिल्ली/मेरठ/देहरादून से संबद्ध जानी-मानी सर्जन डॉ. गीता शुक्ला से संवाद पर आधारित है. वे हमारे चेतना विकास मिशन से संबंधित हैं. किसी भी तरह के यौनरोग या संतानहीनता का निःशुल्क समाधान मिशन के अधिकृत व्हाट्सप्प नंबर 9997741245 पर संपर्क कर के लिया जा सकता है.
_योनि से पानी जाने को ल्यूकोरिया, वेजाइनल डिचार्ज और प्रदर भी कहा जाता है. रोग पुराना होने पर योनि से पानी की जगह मवाद का निकलना शुरू हो जाता है. जब योनि से खून आने लगता है, तब इसे रक्तप्रदर कहा जाता है._
यह दुष्ट रोग स्त्रियों को प्रायः सब ही अवस्थाओं में हो जाता है O7 वर्ष की बालिका से 60 वर्ष की वृद्धा तक इस रोग से पीड़ित देखने में आती हैं।रोग होने के कारण :
प्रकृति विरुद्ध अधिक गर्म और रुखा भोजन करने से, कच्चा गर्भ गिरने से, विकृत वीर्य वाले या गंदे पुरूष से सहवास (सेक्स) करने से, सहवास के बाद योनि को साफ ना करने से, गहरी चोट लगने से, तीक्ष्ण पदार्थों के अधिक सेवन से, मासिक धर्म के समय सहवास करने जैसे कारणों से यह रोग हो जाता है।
आयुर्वेदीय ग्रन्थ चरक संहिता के अनुसार :
रजः प्रदीर्यते यस्मात्प्रदरस्तेन स स्मृतः।
लक्षण और ख़तरे :
इलाज में देर होने पर योनि और गर्भाशय में सूजन उत्तपन्न होने से एक प्रकार का घाव हो जाता है। उसमें से सफेद, कफ के समान चिकना और पतला पदार्थ निकलने लगता है।
यही पुराना होने पर मवाद का रूप ले लेता है। अधिक पुराना होने पर भीतर सड़न पैदा होने लगती है और यह दुर्गंधयुक्त होकर निरंतर बहता रहता है।
कभी-कभी यह रोग अत्यंत भयानक रूप धारण करता है और प्राणों को संकट में डाल देता है।
इसके बढ़ जाने से शरीर की सारी शक्ति घटने लगती है और मंदाग्नि (कांस्टीपेशन), मूर्छा, कमर में दर्द, सिर में दर्द, नेत्रों और हाथों पावों में जलन,कमजोरी का अनुभव, हाथ-पैरों और कमर-पेट-पेडू में दर्द, पिंडलियों में खिंचाव, शरीर भारी रहना, चिड़चिड़ापन, चक्कर आना, आंखों के सामने अंधेरा छा जाना, भूख न लगना, शौच साफ न होना, बार-बार यूरीन, पेट में भारीपन, जी मिचलाना, गुप्तांग में खुजली आदि अनेक उपद्रव उठ खड़े होते हैं।
उपचार :
एलोपैथी में कोई भी स्थायी उपचार नहीं है। व्यर्थ की दवाएं, फिर केमिकल या यंत्र से सफाई और अंततः सर्जरी से शरीर का सत्यानाश.
कारणों का निवारण पहला उपचार है।
आयुर्वेद में औषधियां हैं, जो कारगर हैं। विशुद्धतम वीर्य का योनिस्पर्श /योनिमसाज भी कारगर परिणाम देता है।
होमियोपैथ में मेगफास, सीपिया, थूजा, बोरॉक्स, पल्सेटिला जैसी कारगर दवाएं हैं। इनमें से माकूल दवा का चयन रोगी के लक्षण-परीक्षण के बाद संभव होता है।
याद रखें :
यह रोग ख़ासकर 3 कारणों से होता है —
(1). योनि की ठीक से सफाई नहीं करने से. उंगली, खीरा, बैगन, सैक्स्टॉय वेगैरह उसमे घुसेड़ने से.
(ऐसे में फंगस, कीटाणु पनपने लगते है और योनि रोगी बनती है )
(2). जिसका वीर्य गंदा हो चुका हो, जो एक के बजाए अनेक से सेक्स करने वाला दुराचारी हो ; उससे सेक्स करवाने से. या फिर एक से अधिक का कचरा खुद में डलवाने से
(ऐसे में वह वीर्य यूटीएस में फ़ैल जाता है. भीतर तक के शरीर को उसके वैक्टीरिया ज़ख्म दे देते हैं.)
(3). सेक्स के समय स्त्री के डिस्चार्ज न होने से.
(जब सेक्स में स्त्री पूरी तरह गरम होकर, पिघलकर, नीचुड़कर बेसुध नहीं होती तब गर्मी भीतर ही फ़ैल जाती है और यह रोग होता है. अगर स्त्री ठंडी नहीं है तो इसके लिए उस को कम से कम 45 से 60 मिनट का सेक्स चाहिए होता है.)
कारणों से बचें, इनका निवारण करें : किसी भी तरह के यौनरोग के निःशुल्क इलाज के लिए हमसे संपर्क किया जा सकता है.
💹चेतना विकास मिशन





