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*धरोहर : पतंजलि का महाभाष्य एवं योगसूत्र*

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         ~ सुधा सिंह 

योगेन चित्तस्य पदेन वाचं मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।

योsपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोsस्मि॥

       जिन मुनिवर पतंजलि ने चित्त की अशुद्धियों को योग से, वाणी की अशुद्धियों को व्याकरण से, और शरीर की अशुद्धियों को वैद्यक से दूर किया, उनके  सामने हाथ जोड़कर नतमस्तक हूँ— राजा (परमारदेव) भोज (ग्यारहवीं शताब्दी), पातंजल योगसूत्र पर उनके भाष्य ‘राजमार्तण्ड’ से.

इस देश ने जिन विलक्षण बहुमुखी प्रतिभाओं को जन्म दिया है, उनमें कृष्णद्वैपायन व्यास, पाणिनि, भरत और  पतंजलि सबसे अग्रणी हैं—उनके परवर्ती भर्तृहरि, अमीर खुसरो, अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना इत्यादि उसी कोटि में आते हैं. 

       अधिकांश पाश्चात्य विद्वान पाणिनि की अष्टाध्यायी के भाष्यकार पतंजलि और योगसूत्र के प्रणेता पतंजलि को अलग-अलग समय में पैदा हुए दो अलग व्यक्ति मानते हैं, चरकसंहिता की तो कोई बात ही नहीं, उसके प्रणेता का तो नाम भी दूसरा दिया हुआ है. भारतीय परंपरा एक  ही व्यक्ति—पतंजलि–को तीनों का प्रणेता मानती है.

        पाश्चात्य विद्वान महाभाष्य और योगसूत्र की भाषा और शैली में साम्य खोजते हैं, जो मिल ही नहीं सकता—दोनों दो अलग विधा की रचनाएँ हैं. ये विद्वान ठहरे ‘विशेषज्ञ’ , इन्हें बहुआयामी भारतीय व्यक्तित्व समझ में ही नहीं आता, इन्हें लगता है, जो पाणिनि के (व्याकरण-विषयक) सूत्रों पर भाष्य लिख सकता है, वह स्वयं (योग-विषयक) सूत्र कैसे लिख सकता है !

       अजीब बात है. यह तो ऐसे ही हुआ जैसे कोई कहे कि कथाकार कविता कैसे लिख सकता है, या जो गम्भीर लेखन करता है वह व्यंग्य कैसे लिख सकता है ? सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे. टॉमस हार्डी ने अपने प्रसिद्ध उपन्यासों से अधिक उम्दा मानी जानेवाली कविताएँ लिखी हैं. हमारे ही समय में श्रीलाल शुक्ल के गम्भीर शैली में लिखे गए दुखांत उपन्यास ‘सूनी घाटी का सूरज’ और व्यंग्य शैली में लिखे गए ‘राग दरबारी’ को पढ़कर ठीक यही सवाल उठाया जा सकता है, जो व्यर्थ होगा. 

        भारतीय विद्वानों के साथ समस्या दूसरी है. वे कोई असाधारण प्रतिभा  देखते ही पट से उसमें किसी अलौकिक अवतार को आरोपित कर देते  हैं. पतंजलि को भी शेष का अवतार मान लिया गया है. वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी  के प्रणेता भट्टोजि दीक्षित-प्रभृति सारे परवर्ती वैयाकरण शेषावतार के बोझ से दबे बिना पतंजलि का ज़िक्र ही नहीं कर पाते.

उपरोक्त राजा भोज तक इस प्रवृत्ति के शिकार हुए है :

जयन्ति वाच: फणिभर्तुरान्तरस्फुरत्तमस्तोमनिशाकरत्विष:।

विभाव्यमाना सततं मनांसि या: सतां सदाssनन्दमयानि कुर्वते॥ 

      [जो अंत:करण के अज्ञानांधकार को दूर करने हेतु चंद्र-किरणों की तरह प्रकाशमान है, जो निरंतर अनुशीलन करने पर साधु पुरुषों के मन को आनंदित करती है, शेषावतार महर्षि पतंजलि की वह वाणी सर्वोपरि है.

मनुष्य प्रकृति की ऐसी संरचना है कि उसमें (ऊपर उठने और नीचे गिरने दोनों की) अनंत संभावना संगर्भित है. किसी मनुष्य में अननुकरणीय अवतार का रहस्यारोपण कर देने से वह पूजा की वस्तु बनकर हमसे दूर हो जाता है.

      योगदर्शन के आचार्य पतंजलि को लेकर उत्तरी और दक्षिणी भारत में एक रोचक किस्म की छीना-झपटी भी है. 

परवर्ती व्याकरण-ग्रंथों में पतंजलि को गोनार्ड का निवासी कहा गया है. माना जाता है कि गोनार्ड  उत्तर प्रदेश के गोंडा का प्राचीन नाम है जो अयोध्या से 50 कि. मी. उत्तर पड़ता है. श्रावस्ती के अवशेष (सेत-महेत) गोंडा से और उत्तर लगभग उतनी ही दूरी पर स्थित हैं, जो परम्परानुसार प्राचीन काल में संस्कृत-शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र था.

        यह मत यूनानी इतिवृत्तों से भी पुष्ट होता है, जिनके आधार पर पतंजलि का काल-निर्धारण हुआ है. यूनानी इतिवृत्तों में 120 ई. पू. में साकेत (अयोध्या) की यूनानी घेराबंदी के संदर्भ में पतंजलि का ज़िक्र आता है, जो उनके साकेत के निकट का निवासी होने का संकेत करता है. पतंजलि भी अपने महाभाष्य में व्याकरण-सम्बंधी एक उदाहरण में साकेत की इस यूनानी घेराबंदी का उल्लेख करते हैं. यही कारण है कि यूनानी इतिवृत्तों के आलोक में महाभाष्यकार पतंजलि का काल निर्विवाद रूप से दूसरी सदी ई.पू. मान लिया गया है. इस तरह काल और जन्मस्थान दोनों के निर्धारण परस्पर जुड़ जाते हैं.

        उधर योगसूत्रकार पतंजलि को महाभाष्यकार पतंजलि से अलग माननेवाले विद्वान उन्हें 400 ई.पू. से 400 ई. के बीच झुला रहे हैं. पातंजल योगसूत्र पर व्यास के नाम से एक भाष्य है. कुछ विद्वान दोनों का प्रणेता पतंजलि को मानते हैं और उन्हें 400 ई.पू. में रखते हैं.  दूसरी ओर कुछ विद्वान पतंजलि को सांख्य दर्शन का आचार्य मानते हैं और सांख्य दर्शन के प्रवर्तक कपिल के ‘सांख्य-सूत्र’ के बाद सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथ ‘सांख्य-कारिका’ के प्रणेता ईश्वर कृष्ण के समकालीन के रूप में उन्हें 400 ई. के आसपास रखते हैं लिए.

योगसूत्र-प्रणेता पतंजलि के बारे में दक्षिण भारतीय परंपरा सर्वथा अलग मार्ग पर चलती है. उसके अनुसार पतंजलि 18 तमिल शैव ‘सिद्धों’ में से एक हैं ; उनका जन्म ‘दक्षिण कैलाश’ कहे जानेवाले त्रिणकोमली के कोणेस्वरम्‌ मंदिर परिसर के पास स्थित ‘गोनार्ड’ में हुआ था, जो श्रीलंका के पूर्वी प्रांत में पड़ता है.

      इस परंपरा के अनुसार पतंजलि शास्त्रीय नृत्य के भी आचार्य थे और जब वे नटराज का दर्शन करने चिदम्बरम्‌ (तमिलनाडु) आए, तो उन्होंने नटराज स्तोत्र की रचना की जिसका गायन आज भी प्रचलित है. इस परंपरा के अनुसार चिदम्बरम्‌ के पास  थिल्लई में सम्पन्न हुए मिथकीय शिव-काली नृत्य के 108 चरणों को पतंजलि ने देवताओं के साथ साक्षात्‌ देखा था, जो नाट्य-योग का आधार बना. इस परंपरा का उल्लेख सातवीं सदी के तिरुमल-रचित तमिल ग्रंथ तिरुमंधिरम्‌ में मिलता है. सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने आधारहीन, चमत्कारिक अतिशयोक्तियों से संवलित अपनी ख़ास प्रवचन-शैली में नटराज से जुड़े योगसूत्र-प्रणेता पतंजलि को संगीतज्ञ भी बताया है, जो, जग्गी के अनुसार, कई रागों के प्रणेता और वीणावादक थे.

       तिरुपत्तूर के ब्रह्मपुरीश्वर मंदिर में स्थित एक समाधि को पतंजलि की समाधि बताया जाता है. जब मुझे वह समाधि दिखाई गई, पहले तो मैंने यही समझा कि पतंजलि उत्तर से दक्षिण-यात्रा पर आए होंगे और यहीं देहांत हो गया होगा. यह तो बाद में मालूम हुआ कि समूचे पतंजलि को ही उत्तर से छीनकर दक्षिण में समानांतर साक्ष्य जोड़ लिए गए हैं.

      दुर्भाग्य यह है कि इस दक्षिणी परंपरा में तार्किक इतिहास-पद्धति से कुछ भी पुष्ट नहीं होता, सिवाय इसके कि पतंजलि का योगदर्शन उत्तर की तरह दक्षिण में भी अत्यधिक सम्मान की दृष्टि से, और आस्था के साथ देखा जाता रहा है.

तमाम दिमाग़ी कसरत के बाद, राजा भोज का अनुसरण करते हुए, दूसरी सदी ई. पू.  में विद्यमान महाभाष्यकार पतंजलि को ही योगसूत्र-प्रणेता पतंजलि  मानना सबसे समीचीन लगता है. राजा भोज का उपरोक्त वंदना-श्लोक भर्तृहरि (पाँचवीं शताब्दी) के एक श्लोक से मेल खाता है जिसमें बिना नाम लिए,  एक साथ योग, वैद्यक एवं व्याकरण के प्रकांड ज्ञाता एक विशिष्ट व्यक्तित्व का ज़िक्र आता है, जो पतंजलि के अलावा और कोई हो नहीं सकता.

        जहाँ तक चरकसंहिता का सवाल है, इसके शरीरस्थान शीर्षकवाले अंतिम अध्याय में योग का भी संक्षिप्त विवेचन है. इस ग्रंथ पर एक बंगाली विद्वान चक्रपाणिदत्त (11वीं सदी) की टीका और 16वीं सदी की एक रचना ‘पतंजलिचरित’ में ‘चरकप्रतिसंस्कृत:’ नाम से पतंजलि-प्रणीत एक अन्य ग्रंथ का उल्लेख मिलता है, जो नाम से ही चरकसंहिता का संशोधित रूप लगता है,  अब अनुपलब्ध है. चरक संहिता स्वयं ऐत्रेय के प्राचीनतर वैद्यक ग्रंथ और दूसरे प्राचीनतर अग्निवेश तंत्र का संशोधित-परिवर्धित रूप है. चरक ऐसे विद्वान को कहा जाता था जो निरंतर भ्रमण करता हो. इस तरह चरक किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं है, हाँ, यह किसी की उपाधि ज़रूर हो सकती है. ऐसे में चरकसंहिता को भी पतंजलि की ही रचना मानने में कोई व्यवधान नहीं दिखता. चरक पतंजलि का ही दूसरा उपनाम हो सकता है, जैसे चाणक्य का उपनाम कौटिल्य था. न भी हो तो इतना तो निश्चित है कि चरकप्रतिसंस्कृत: के निर्विवाद प्रणेता के रूप में  पतंजलि वैद्यक के भी विशिष्ट ज्ञाता थे और इस दृष्टि से राजा भोज की वंदना में कोई अतिशयोक्ति नहीं है. 

*महाभाष्य :*

      पतंजलि का महाभाष्य पाणिनीय अष्टाध्यायी की व्याख्या के साथ-साथ कात्यायन के 1500 वार्तिकों (व्याख्यापरक नियमों)  की भी आलोचनात्मक व्याख्या है; कात्यायन पाणिनि और पतंजलि के बीच के समय (अनुमानत: तीसरी शताब्दी ई.पू.), में हुए और उन्होंने अपने वार्तिकों में पाणिनीय व्याकरण की पहली व्याख्या प्रस्तुत की. इस तरह महाभाष्य संस्कृत व्याकरण का तीसरा ग्रंथ है, जिसके साथ भारतीय भाषाशास्त्र का एक निश्चित स्वरूप स्थिर हो सका.

    कात्यायन के वार्तिक अब स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं हैं और उनके बारे में हम उतना ही जानते हैं जितना महाभाष्य में उपलब्ध है.

अपने व्याकरण में पाणिनि का मुख्य प्रयास शुद्ध रूपों और अर्थों को अशुद्ध से पृथक करना था. कात्यायन ने व्याकरण में अर्थ-वैविध्य पर  विमर्श की शुरुआत की. पतंजलि ने इस विमर्श को तत्वमीमांसा की ऊँचाई तक पहुँचा दिया और व्याकरण तथा व्याकरण-दर्शन को एक कर दिया.

      उनके भाष्य की यह तत्वमीमांसक ऊँचाई ही उनके योगसूत्र का भी प्रणेता होने का प्रमाण है.

      विषय इतना विशद और जटिल है कि कुछ उदाहरण ही दिए जा सकते हैं :  पाणिनि के एक सूत्र (1.2.58) में आता है कि जब किसी प्रजाति का प्रसंग हो, तो एकवचन के अर्थ में बहुवचन का प्रयोग हो सकता है. पतंजलि ने सवाल उठाया कि उस दशा में शब्द का अर्थ वस्तु के द्रव्य को इंगित करेगा या उसकी आकृति) को—“किं पुनराकृति: पदार्थ: अहोस्विद्‌ द्रव्यम्‌”. आश्चर्य यह है कि यहाँ बिना किसी बड़बोलेपन के, बहुत सरलता के साथ पतंजलि ने  प्लेटो के सोद्देश्यवाद (teleology) का समानांतर विचार दे दिया  है.

       प्लेटो के अनुसार किसी वस्तु का प्रत्यय (idea) शास्वत और अपरिवर्तनीय है, वही उसकी वास्तविक प्रकृति  है और वही उसका लक्ष्य भी, क्योंकि हर वस्तु उसी को प्राप्त करने की ओर उन्मुख है. घोड़े यथार्थ में अच्छे-बुरे भांति-भांति के हो सकते हैं, किंतु घोड़े का प्रत्यय—‘घोड़ापन’—सब में सामान्य होगा, वह एक स्थाई, शाश्वत भाव है, जो घोड़ा होने का लक्ष्य है; इस दृष्टि से उसकी वास्तविक प्रकृति भी. 

पतंजलि ने दिखाया कि शब्द और अर्थ किस तरह परस्पर संयुक्त हैं.

    “शब्दप्रमाण:”. शब्दों का साक्ष्यगत मूल्य ( वह जिसके वे संकेत हैं) उनमें अंतर्निहित है. उनकी व्युत्पत्ति जो भी हो, वह अर्थ-बोध के लिए हमेशा ज़रूरी नहीं होती. सामान्यत: लोग शब्द बनवाने किसी वैयाकरण के पास नहीं जाते, जैसे ज़रूरत के हिसाब से  बरतन बनवाने या खरीदने कुम्हार के पास जाते हैं. हमारे भीतर जो भाव उठते हैं उनके लिए पहले से मौजूद कोई शब्द ढूँढ़कर हम काम चला लेते हैं.

     अनुवाद अलग विषय है जहाँ एक भाषा में किसी भाव के लिए पहले से कोई जाना-माना शब्द होता है किंतु दूसरी में नहीं, और तब दूसरी भाषा को अपने उपलब्ध औज़ारों से उसे गढ़ना पड़ता है.

       पतंजलि में ध्वनि-केंद्रित स्फोटवाद भी अपने बीज-रूप में मौजूद है, जो बाद में भर्तृहरि में पूर्ण रूप से विकसित हुआ. इसके अनुसार शब्द की ध्वनि सुनते ही हमारे भीतर उसके अर्थ का स्फोट होता है जिसका कारण शब्द की संरचना नहीं, हमारी स्मृति में पहले से पड़े हुए संस्कार हैं. भर्तृहरि के अलावा ध्वनि पर संस्कृत काव्यशास्त्र में भी बहुत काम हुआ है—आनंदवर्धन-प्रणीत ध्वन्यालोक एक अप्रतिम रचना है, जिसने काव्यशास्त्र में एक स्वतंत्र सम्प्रदाय (school) का सूत्रपात किया. 

*पातंजल योगसूत्र :*

       भारत की योग-परम्परा बहुत प्राचीन है–पतंजलि के बहुत पहले से चली आ रही है. पतंजलि ने योग-विषयक 186 सूत्रों का एक समुच्चय प्रस्तुत किया, वही पातंजल योगसूत्र है. वह राजयोग (योग के तीन मार्गों—ज्ञानयोग ,भक्तियोग और कर्मयोग– में से प्रथम, ज्ञानयोग) से सम्बंधित समस्त विमर्श को सूत्रबद्ध कर उसका एक सांगोपांग, क्रमबद्ध और सुव्यवस्थित रूप सामने रख देता है.

       इसे अष्टांग योग भी कहते हैं क्योंकि इसके आठ साधन या सोपान हैं—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि. पतंजलि ने योगसूत्र को चार पादों में विभक्त किया है—समाधिपाद (51सूत्र), साधनपाद (55 सूत्र), विभूतिपाद ( 56 सूत्र) और कैवल्य पाद (34 सूत्र).

          समाधिपाद योग की परिभाषा से शुरू होता है जिसके अनुसार चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है. फिर वृत्तियों के पाँच भेद बताए गए हैं. पाँचों वृत्तियाँ क्लिष्ट (कष्टकर) और अक्लिष्ट (प्रीतिकर) दो कोटि की हैं. योग-सिद्धि के लिए दोनों तरह की वृत्तियों का निरोध आवश्यक है, जो अभ्यास और वैराग्य से हो सकता है. फिर वैराग्य के लक्षण और भेद बताए गए हैं. इसी क्रम में संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात दो तरह की समाधि  और उनकी सिद्धि  प्राप्त करने की  प्रविधि का वर्णन है. साधनपाद में अविद्या आदि सांसारिक क्लेशों, उनके परिणामों और उनके उच्छेद के उपायों का वर्णन है. विभूतिपाद में योग से प्राप्य सिद्धियों का वर्णन है, जिन्हें समाधि-अवस्था के लिए विघ्न-स्वरूप बताया गया है. कैवल्यपाद में चित्त के स्वरूप का वर्णन करने के बाद धर्ममेध समाधि एवं उसके फलित का विवेचन है.

        इसकी निष्पत्ति क्लेश और कर्मों के अभाव तथा गुणों के परिणाम के अवसान के रूप में होती है. इसके फलस्वरूप  कार्य के कारण में विलीन हो जाने से पुनर्जन्म-शृंखला की समाप्ति तथा कैवल्य की प्राप्ति हो जाती है, जो योग का अंतिम लक्ष्य है. 

योग और सांख्य दर्शन का घनिष्ठ सम्बंध है. वस्तुत: सांख्य के सिद्धांतों का जीवन में व्यावहारिक प्रयोग ही योग है. सांख्य के अनुसार तत्वज्ञान ही मुक्ति का साधन है और योग के अनुसार योगाभ्यास से अपने स्वरूप की पहचान या तत्वज्ञान  संभव है. यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि कपिल द्वारा ‘सांख्य-सूत्र’ में प्रतिपादित सांख्य दर्शन निरीश्वरवादी है; कपिल के अनुसार ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता. इसलिए उसे निरीश्वर सांख्य कहते हैं. किंतु योग-दर्शन ईश्वर का प्रतिपादन करता है :

    ईश्वरप्रणिधानाद्वा। क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:। तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्‌। पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात्‌। तस्य वाचक: प्रणव:। तज्जपस्तदर्थभावनम्‌। तत: प्रत्यक्चेतनाधिगमोsप्यन्तरायाभावश्च।    

    (पातंजल योगसूत्र,1:23-29).

 अथवा, ईश्वर की शरण में जाने से भी वह (असंप्रज्ञात या निर्बीज  समाधि) शीघ्र सिद्ध होती है. क्लेश, कर्म, उसके फल और तज्जनित संस्कारपुंज से असंपृक्त पुरुष विशेष ही ईश्वर है. उसमें सर्वज्ञता का बीज असीमित रूप से विद्यमान है. वह पूर्वजों का भी गुरु है, क्योंकि वह काल से अविच्छिन्न है. उसका वाचक (संकेत-ध्वनि) प्रणव (ॐकार) है. इस (ॐ) का जप तथा इसके अर्थ का चिंतन करना चाहिए. इससे विघ्नों का अभाव और अंतरात्मा के स्वरूप का ज्ञान भी हो जाता है. इसलिए योग-दर्शन को ‘सेश्वर सांख्य’ भी कहा जाता है.

         यहाँ यह ध्यातव्य है कि शास्त्रीय अर्थ में दर्शन के बजाए योग के सांख्य-सिद्धांतों के प्रयोग की व्यावहारिक विधि होने से योगसूत्र में ईश्वर के अस्तित्व-अनस्तित्व पर कोई चिंतन नहीं है, यहाँ ईश्वर को स्वत:सिद्ध मानकर असंप्रज्ञात समाधि की सिद्धि में शीघ्रता के लिए  उसका वैकल्पिक सहारा लिया गया है, जब कि कपिल के निरीश्वर सांख्य में इस प्रश्न पर विशद चिंतन हुआ है. जैसा कि ऊपर कहा गया, योगसूत्र के कैवल्य पाद में कार्य के कारण में विलीन होने का प्रसंग आता है, जो सांख्य का सत्कार्यवाद का सिद्धांत है.

      इन दो कारणों से यहाँ  सांख्य दर्शन की मूल अवधारणाओं पर एक विहंगम दृष्टि डाल लेना प्रासंगिक होगा.

सत्कार्यवाद सांख्य दर्शन का मूलाधार है, जिसका तात्पर्य यह है कि कार्य की सत्ता कारण में पहले से मौजूद होती है. इसके विपरीत न्याय-वैशेषिक और बौद्ध दर्शन असत्कार्यवाद का प्रतिपादन करते हैं, जिनके अनुसार यदि कार्य कारण में पहले से मौजूद होता तो निमित्त कारण का कोई प्रयोजन ही न रहता. इसे मिट्टी, घड़ा और कुम्हार के उदाहरण से समझा जा सकता है. मिट्टी उपादान कारण है, कुम्हार निमित्त कारण है और घड़ा कार्य है. सांख्य का तर्क है कि कार्य कारण में मौजूद न होता तो किसी भी यत्न से उसका आविर्भाव नहीं हो सकता था. बालू पेरने से तेल या आकाश मथने से मक्खन नहीं निकल सकता. तिल पेरने से तेल इसलिए निकलता है कि तिल में पहले से तेल मौजूद होता है.

       मूल उपादान कारण प्रकृति  है जिसके विकार ( या कार्य)  का नाम संसार है. संसार का सारा दु:ख-सुख प्रकृति में पहले से अंतर्निहित है; सत्व,  रज,  तम प्रकृति के गुण हैं, और प्रकृति है जड़. प्रकृति के अलावा दूसरा तत्व है पुरुष, जो चेतन है. वही आत्मा है, जो अस्तित्व का, दु:ख-सुख का बोध कराती है. मनुष्य दु:ख से बचना चाहता है और सुख पाना चाहता है. किंतु सभी सुख दु:खों के साथ मिश्रित हैं. इसलिए सुखवाद (hedonism) का परित्याग कर मनुष्य को दु:ख की निवृत्ति से ही संतोष करना चाहिए. इसी निवृत्ति का नाम है मुक्ति या अपवर्ग. यह तत्वज्ञान से संभव है. तत्वज्ञान और कुछ नहीं, मनुष्य को अपने स्वरूप का ज्ञान होना है, यह ज्ञान कि वह शुद्ध चेतन या आत्मा है, और संसार का सारा व्यापार, सारा सुख-दु:ख उसके मनोमय शरीर या प्रकृति का गुण है, जिससे वह पृथक्‌ है.

       वेदांत मोक्ष की अवस्था को आनंदमय बताता है जब कि सांख्य के अनुसार वह सुख-दु:ख दोनों से निरपेक्ष है, सिर्फ़ एक (दु:ख़) से निरपेक्ष होना संभव ही नहीं है. निरीश्वर सांख्य ईश्वर के अनस्तित्व के समर्थन में तर्क देता है कि इस संसाररूपी कार्य-शृंखला का आदि कारण ईश्वर नहीं हो सकता, क्योंकि उपादान कारण में विकार उत्पन्न हुए बिना कार्य नहीं हो सकता जब कि ईश्वर को निर्विकार माना गया है. ईश्वर निमित्त कारण भी नहीं हो सकता क्योंकि निमित्त कारण कार्य की प्रक्रिया में प्रभावित और परिवर्तित होता है जब कि ईश्वर अपरिवर्तनशील माना गया है.

       अनीश्वरवाद के लिए सांख्य का सबसे बड़ा तर्क यह है कि यदि ईश्वर में विश्वास किया जाए तो जीव-स्वातंत्र्य खंडित  हो जाएगा, फिर तो जीव न कोई संकल्प कर सकेगा, न तत्वज्ञान प्राप्त कर सकेगा, न ही उसकी मुक्ति संभव हो सकेगी. तब तो वह ईश्वरीय संकल्प का दास बनकर रह जाएगा.  सांख्य का एक और तर्क है कि जब संसार इतने पापों और कष्टों से भरा हुआ है, यह कहना असंगत होगा कि ईश्वर ने जीवों के हित-साधन के लिए (जैसा कि कहा जाता है) या किसी अन्य लक्ष्य से ऐसे संसार की सृष्टि की है.

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि निरीश्वर सांख्य से सेश्वर सांख्य (या योग) में यह अंतरण ईश्वर की सत्ता को महज़ एक सहायक के तौर पर स्वीकार करता है, वह भी वैकल्पिक सहायक के तौर पर. समाधिपाद में उपरोक्त प्रसंग है असंप्रज्ञात या निर्बीज समाधि के सिद्ध होने का, जिसका एकमात्र उपाय है श्रद्धा, वीर्य, स्मृति समाधि और प्रज्ञा ( योगसूत्र,1:20). यह सिद्धि उनकी शीघ्र होती है जिनके साधन की गति तीव्र है (1:21). साधन की मात्रा हल्की, मध्यम और उच्च होने से तीव्रता में भी तदनुरूप भेद हो जाता है (1:22). “अथवा” ईश्वर की शरण में जाने से सिद्धि शीघ्र होती है. (ऊपर उद्धृत 1:23). तो ईश्वरीय सत्ता का सहारा अपरिहार्य नहीं है. 

     योग का लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति नहीं है. पहले समाधिपाद के तीसरे सूत्र और अंतिम कैवल्य पाद के अंतिम (38वें) सूत्र में यह लक्ष्य दिया हुआ है, जो तत्वत: एक ही है. 1:3 के अनुसार लक्ष्य है द्रष्टा या साधक का अपने स्वरूप में अवस्थित होना (तदा द्रष्टु: स्वरूपेsवस्थानम्‌). 4:38 के अनुसार लक्ष्य है कैवल्य प्राप्त होना या द्रष्टा का अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होना, जो कर्तव्य-शून्य हुए पुरुष के गुणों के अपने-अपने कारणों में विलीन हो जाने से होता है (पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसव: कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति). अपने स्वरूप में अवस्थित या प्रतिष्ठित  होना ठीक वही है जो निरीश्वर सांख्य में पुरुष को तत्वज्ञान होना—कि वह शुद्ध चेतन है. इस तरह पातंजल योग ईश्वर की ओष्ठ-सेवा भर करता है और वह निरीश्वर सांख्य से दूर नहीं जा पाता. मूल अवधारणा दोनों की वही रहती है. सांख्य के संदर्भ के बिना योगसूत्र पढ़ने से थोड़ी भ्रांति अवश्य हो सकती है. 

इतना तो स्पष्ट है कि योग की यह प्रविधि महज़ आसन नहीं है. यह  ज्ञान-ध्यान की एक प्रक्रिया है, जिसका लक्ष्य आत्म-स्वरूप का साक्षात्कार करना है, जो मोक्ष या कैवल्य का ही दूसरा नाम है. यहाँ वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टि से यह सवाल उठाया जा सकता है कि क्या यह प्रक्रिया मानवीय धरातल पर अपना घोषित लक्ष्य प्राप्त कर सकती है, या साधक को कोई मनोवैज्ञानिक या अन्य किसी तरह का बोधगम्य लाभ पहुँचा सकती है. इस बिंदु पर पंडित नेहरू के विचार बहुत विवेकपूर्ण और संतुलित लगते है.

Ramswaroop Mantri

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