अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*इंडिया गेट पर हिडिमा:अभी भी समय है, इन आवाजों को सुना जाए*

Share

कहते हैं किसी भी बात की अति उसे विपरीत में बदल देती है। जिस समय नक्सलवाद के बड़े-बड़े नेता आत्मसमर्पण कर चुके हैं,, बहुत से लोग निष्क्रिय जीवन की ओर जाने के बाध्य कर दिये गये हैं और सैकड़ों लोगों को मार दिया गया है या मार दिया जा रहा है उस समय इंडिया गेट पर गिनती भर से भी कम कुछ छात्र हिडिमा के समर्थन में नारे लगाते हुए दिखना एक अलग ही नजारा पेश पेश करता है।

वे हिडिमा को ‘माॅडल’ बता रहे थे जो देश के विकास और पर्यावरण की समस्या को ‘हल’ कर सकता है। मीडिया समूह के एंकर और कैमरामैन इन छात्रों को कवर करते हुए उनकी बात को जिस तरह से सामने लेकर आये, उससे वे छात्र भले ही जेल भेज दिये गये, लेकिन इंडिया गेट पर हिडिमा की उपस्थिति हमेशा के लिए दर्ज हो गई। इसके पहले शायद ही कभी इंडिया गेट पर नक्सलवाद की इस तरह की आवाज सुनाई दी हो।

कुछ समय पहले की बात है जब भारत में उपराष्ट्रपति पद का चुनाव हुआ। इस वैधानिक सर्वोच्च पद के चुनाव के समय भी नक्सलवाद की आवाज सुनाई दी। इंडिया गठबंधन की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व जज सुदर्शन रेड्डी को प्रत्याशी बनाया गया था। उनके बारे में गृहमंत्री अमित शाह की टिप्पणी काफी विवादित रही। उन्होंने उन्हें ‘नक्सलियों का समर्थक’ कहा था। इस बयान का संदर्भ जस्टिस सुदर्शन रेड्डी का सलवा जुडुम को लेकर दिया गया एक निर्णय था। इसे लेकर काफी विवाद हुआ।

जस्टिस सुदर्शन रेड्डी ने अपने चुनावी अभियान में साफ तौर पर कहा कि ‘विकसित भारत का सपना तभी पूरा होगा जब आदिवासी समुदाय की भलाई सुनिश्चित हो’। इस चुनाव में जस्टिस सुदर्शन रेड्डी उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर वोट की संख्या में काफी पीछे रह गये। लेकिन, इस विवाद से एक बार फिर सलवा जुडुम की पृष्ठिभूमि, आदिवासी और नक्सलवाद की बहस कुछ समय के लिए चल निकली।

सलवा जुडुम के ठीक पहले भारत सरकार के प्रतिष्ठानों की ओर से दी गई कई सारी रिपोर्ट नक्सलवाद और आदिवासी समुदाय के बीच के रिश्तों और मैदानी हिस्सों में किसानों की बदतर स्थिति और नक्सलवाद की उपस्थिति को लेकर सामने आ चुकी थीं। इन सभी रिपोर्ट में एक बात सामान्य तौर पर थी, और वह थी नक्सलवाद की राजनीतिक अर्थशास्त्र की व्याख्या।

ये सभी रिपोर्ट बता रही थी कि जब तक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संकट आदिवासी और किसानों के बीच बना रहेगा तब तक नक्सलवाद को पनपने से रोकना मुश्किल होगा। इस संदर्भ में कई सारे जमीनी सर्वेक्षणों की रिपोर्ट भी थी जिसके माध्यम से बताया गया था कि जहां जहां विकास की पहुंच हुई है, इनका प्रभाव कम हुआ है, और जहां-जहां राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ा है वहां पर भी इसके असर को देखा जा सकता है।

इस संदर्भ में, कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही नेतृत्व में यह दावा किया जाता रहा कि विकास का रास्ता जारी रहेगा, लेकिन नक्सलवाद की हिंसा को ‘राज्य की सुरक्षा’ के संदर्भ में ही निपटा जाएगा। पिछले दस सालों में ‘राज्य की सुरक्षा’ का दावा और भी कई रूप लेता चला गया है और इस पर जोर काफी बढ़ गया।

‘विकास’ की कहानी जंगलों के बर्बाद होने के तौर पर और किसानों की बर्बादी, सालों चले आंदोलनों के आईने में हम देख सकते हैं। अब मुख्य बात नक्सलवाद की भौतिक सच्चाई को खत्म कर देना रह गया है। पिछले कुछ सालों से गृहमंत्री इसकी समय सीमा तय कर नक्सलवाद की भौतिक उपस्थिति को खत्म करने में लगे हुए हैं।

एक देश और समाज में एक खास विचारधारा से जुड़े समूहों को खत्म कर देने का कोई भी अभियान पूरे देश और समाज के लिए चेतावनी की तरह काम करता है। यह नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही तरह का रुख लेकर सामने आता है। डकैती एक बेहद बुरी चीज होती है। पूरी दुनिया में, और खासकर यूरोप में 15वीं से 18वीं सदी तक डकैतों ने प्रतिरोध का एक अलग ही ढांचा खड़ा कर दिया था।

ऐसी स्थिति को हम चंबल के क्षेत्र में 1970 के दशक में उभरे डकैतों की कहानी में हम देख सकते हैं। हमारे देश के इतिहास में सामंतवाद के पतन के दौर में जिस तेजी से तवायफों का उभार हुआ वह पतन की गाथा का एक हिस्सा है। अंग्रेजों के हमले में ये तवायफें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर हो गईं और छोटे-छोटे शहरें और गांव-कस्बों में बिखर गईं। ये ही भारत की सांस्कृतिक परम्परा की संरक्षक में बदलती गईं। वे जितनी बदनाम हुईं, उनकी उन्हीं बदनाम शिराओं से होती हुई सांस्कृतिक परम्पराएं आगे बढ़ पाईं।

इतिहास हमलों से न खत्म होता है और न ही बनता है। भारत की भू-प्रणाली 5वीं-7वीं सदी में जो बनी वह आने वाले समय में थोड़े-थोड़े बदलाव के साथ अंग्रेजों की भू-प्रणाली तक बनी रही। इसमें न तो धर्म आड़े आया और न ही राजाओं के बदलाव। अंग्रेजों ने भी पुरानी भू-प्रणाली से जुड़े पुराने नामों के बनाये रखा, जिससे कि भ्रम बना रहे।

अस्तित्व का सवाल ही इतिहास की गति को आगे ले जाता है। आज भारत में छात्र-युवा और किसान आत्महत्या करने वाले सर्वोच्च समूह में तब्दील हो रहे हैं। उनके सामने विकास का जो माॅडल पेश किया जा रहा है उस पर उनका भरोसा नहीं बन रहा है। वे अथाह निराशा और तबाही की जिंदगी का सामना कर रहे हैं। बेरोजगारी भयावह तरीके से बढ़ रही है। गांव के खेतों पर दबाव बढ़ रहा है जिससे वहां अपराध की संख्या में तेजी आ रही है।

दूसरी ओर शहरों में सरकार के आदेशों पर अतिक्रमण को ढहाने के लिए बुलडोजर दौड़ रहे हैं। राजनीतिक प्रतिनिधित्व और चुनाव को लेकर लोगों में गहरी आशंका बैठती जा रही है। चुने हुए प्रतिनिधियों में धनाढ्यों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है जबकि जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व का आंकड़ा बिगड़ता जा रहा है। आज का हमारे देश का जो राजनीतिक-अर्थशास्त्र है, उसे भले ही सत्ता पक्ष और उसके समर्थक पसंद कर रहे हों, लेकिन इसे सभी पसंद करें, यह संभव नहीं है।

निश्चित ही, इंडिया गेट पर चंद छात्रों-युवाओं द्वारा हिडिमा के समर्थन में लगाये नारे पर कुछ लोग हैरान होंगे और होना भी चाहिए। मैं भी हैरान हूं। संभवतः वे जेल में भेज दिये गये हैं। कई सारे केस उन पर दर्ज हुए हैं। अब न्यायपालिका ही तय करेगी कि उनका अपराध क्या था, था भी या नहीं था।

लेकिन, इस इतिहास की ओर हमें जरूर देख लेना चाहिए जब उसका उभार हुआ था। बंगाल के एक छोटे से गांव के आदिवासियों के विद्रोह को नेतृत्व देने वाले चारू मजुमदार ने जब कोलकाता के काॅलेज स्ट्रीट का नारा बना दिया था और देखते-देखते वह देश भर में फैल गया। वे आदिवासी और खुद चारू मजुमदार मार दिये गये, लेकिन वे नारे थे कि फैलते ही गये।

यह अनवरत चलता रहा। इस बार बस्तर से चलते हुए इंडिया गेट तक आ गया। इस बार भी वे मारे जा रहे हैं और एक पार्टी के तौर पर गृहमंत्री के शब्दों में ‘खत्म होने को हैं’।

किसी भी देश और समाज में जब तक इतिहास है, चाहे वह लिखा गया हो या न लिखा गया हो, उसे झूठा बनाया गया हो या सच्चा बनाया गया हो; उसमें कई विचारधाराएं, चिंतन और प्रतिनिधि समूह होते हैं और वही समाज बनाते हैं। इसमें से कोई एक प्रभुत्वकारी होता है। जो प्रभुत्वकारी समूह लोगों को गुलाम बनाने, दूसरों के श्रम का शोषण करने और प्रतिरोध करने वाली चिंतन प्रणालियों को खत्म करने की ओर जाता है, उसकी असफलता निश्चित है।

यह काम वह चाहे जिस भी नाम से करे और इसके लिए चाहे वह कितने ही लोगों को मौत के घाट उतार दे। अब तक का इतिहास ऐसे ही पतन की गाथा है जिसमें प्रतिरोध की धाराएं शक्ल लेते हुए इतिहास रचती रही हैं। आज भारत में भीषण वैचारिक उहापोह की उपस्थिति है। लोकतंत्र को लेकर बहस चल रही है। यहां तक कि वोट की प्रक्रिया को लेकर बहस उठ खड़ी हुई है। बहुत तरह की आवाजें हैं। लगातार दमन के बावजूद छात्र बोलने से रुक नहीं रहे हैं।

अभी भी समय है, इन आवाजों को सुना जाए। इतिहास गवाह है, अनसुनी आवाजें आने वाले समय में शक्ल लेती हैं। कहते हैं कि भूत पीछा नहीं छोड़ते। इसे आसान सभ्य भाषा में कहें तो अतीत वर्तमान के साथ चलता हुआ हमारे सामने आ खड़ा होता है। उम्मीद है, इन आवाजों को हम जरूर सुनेंगे।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें