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कोरोना में अपनों को खो चुके 1783 बच्चों को मिलेगा ‘न्याय’, परवरिश में मदद करेगा हाईकोर्ट

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इंदौर

हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ अब ऐसे बच्चों का सहारा बनेगी - Dainik Bhaskar

हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ अब ऐसे बच्चों का सहारा बनेगी

  • इंदौर खंडपीठ में आने वाले 16 जिलों में किए चिह्नित, इनमें शहर के 300 बच्चे शामिल

हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ अब ऐसे बच्चों का सहारा बनेगी, जो कोरोना में अपने पिता या मां (सिंगल पेरेंट्स) को खो चुके हैं। कोर्ट इनकी परवरिश में आर्थिक मदद करेगा। खंडपीठ के अंतर्गत आने वाले उज्जैन-इंदौर संभाग के 16 जिलों के ऐसे 1783 बच्चे चिह्नित किए हैं। इनमें इंदौर के 300 बच्चे शामिल हैं। हाईकोर्ट के पब्लिक वेलफेयर फंड से यह मदद की जाएगी। ऐसे 457 बच्चों को लाभ दिलाया भी जा चुका है।

प्रारंभिक तौर पर 2000 रुपए तक सहायता देंगे। यदि किसी बच्चे को स्कूल फीस या अन्य कोई बड़ी आर्थिक सहायता की जरूरत है तो उन्हें महिला बाल विकास विभाग के जरिए अलग से आवेदन देना होगा। इसके बाद हाई कोर्ट किसी संस्था, संगठन या सरकार के जरिए उन्हें मदद दिलाएगा।

अब तक 457 बच्चों को आर्थिक सहायता दिलाई जा चुकी

महिला एवं बाल विकास विभाग ने इन जिलों में ऐसे बच्चों की सूची तैयार की है। इन सभी को विभाग की ही फास्टर केयर योजना का लाभ देना संभव नहीं हो पा रहा था। रेडक्रॉस सोसायटी की तरह हाईकोर्ट के पास एक पब्लिक वेलफेयर फंड होता है जिसका उपयोग बुजुर्ग और बच्चों के लिए किया जाता है।

महिला बाल विकास विभाग की संभागीय संयुक्त संचालक डॉ. संध्या व्यास ने जिन बच्चों के सामने आजीविका का संकट है उनकी मदद के लिए एक प्रस्ताव हाई कोर्ट को भेजा था। अतिरिक्त महाधिवक्ता पुष्यमित्र भार्गव ने विभाग के समन्वय से प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। योजना को सभी जिलों में कोऑर्डिनेट कर रहीं सहायक संचालक शुभांगी मजुमदार ने बताया कि अभी तक 457 बच्चों को लाभ दिलवाया जा चुका है।

फास्टर केयर योजना में इंदौर जिले का बजट सिर्फ 10 लाख रु. है
महिला बाल विकास विभाग अपनी फास्टर योजना के तहत कोरोना में परिजन को खो चुके बच्चों की मदद कर रहा है, लेकिन बजट सीमित होने के कारण सभी बच्चों को मदद नहीं मिल पा रही है। इसके तहत इंदौर जिले के लिए सिर्फ 10 लाख रुपए का बजट मिलता है। विभाग ने पूरे कोरोना काल में अब तक सिर्फ 36 केस ही ऐसे मंजूर किए हैं। ये मामले भी कोरोना की पहली लहर के ही हैं। दूसरी लहर का एक भी केस मंजूर नहीं हुआ।

इसमें बच्चों की परवरिश करने वाले (नाना-नानी, दादा-दादी, चाचा-चाची या अन्य रिश्तेदार) को 2 हजार रुपए मासिक भुगतान किया जाता है। हालांकि महिला बाल विकास विभाग की इस योजना के तहत सभी बच्चों को मदद नहीं मिल पाती है। जिला कार्यक्रम अधिकारी सीएल पासी ने बताया कि मुख्यमंत्री कोविड बाल कल्याण योजना से केसों को मंजूर किया जा रहा है।

Ramswaroop Mantri

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