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*दरकता हिमालय: क्या सरकार ने हिमालय को बचाने के लिए उचित प्रयास किए*

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निशांत आनंद

उत्तर भारत के एक हिमालयी गांव में अचानक आई बाढ़ में कम से कम चार लोगों की मौत हो गई है और 50 से अधिक लोग लापता हैं। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि मृतकों की संख्या और बढ़ सकती है। यह घटना उत्तराखंड के धराली गाँव में 5-6 अगस्त को हुई, जब प्रारंभिक सूचना के अनुसार बादल फटने की घटना सामने आई थी, जिसने कुछ ही देर में एक फ्लैश फ्लड का रूप धारण कर लिया। प्रारंभिक आधिकारिक और मीडिया बयानों में सटीक कारण को लेकर मतभेद है।

कुछ स्थानीय/आधिकारिक बयानों में तेज़ और स्थानीयकृत वर्षा/बादल फटने की घटना को कारण बताया गया है, जबकि कई वैज्ञानिक/मैदानी टिप्पणीकारों और लेखों में ऐसे “संकेत” बताए गए हैं जो खीर गंगा चैनल के ऊपरी हिस्से में स्थित किसी हिम नदी झील के फटने या हिमनद/बर्फ के ढहने की घटना से मेल खाते हैं। बचाव और मैदानी टीमों के स्रोत की जांच का कार्य सौंपा गया है।

बहरहाल, इसके सटीक कारण का बता पाना तो मुश्किल है, परंतु क्या इस घटना को पहले से देख पाना इतना मुश्किल था क्या? और अगर मुश्किल नहीं था तो फिर सैलानियों के लगातार उत्तर की ओर जाने को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने कोई कारगर कदम क्यों नहीं उठाए? क्या सरकार ने हिमालय को बचाने के लिए उचित प्रयास किए, और किए तो वे किस दिशा में और कितने कारगर होते हुए जान पड़ते हैं? इन बिंदुओं पर चर्चा किए बिना यह घटना, जो अपने कड़ी की एकाकी घटना नहीं है, का सही परीक्षण कर पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।

उत्तर भारत में स्थित विशाल हिमालय का निर्माण अवसादी चट्टानों से हुआ है, जिसकी प्रकृति बेहद कमजोर और जल्दी टूटने वाली है। अर्थात, हिमालय जब वर्तमान समय में अपने निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रहा है और उसमें उपस्थित चट्टानें अपने आप में ज्यादा पर्यावरणीय मार झेलने की हालत में नहीं हैं, तो ऐसे हालात में सैलानियों के प्रवाह को लगातार प्रोत्साहित करना और बड़े परियोजनाओं को मंजूरी देना अपने आप में केवल पर्यावरणीय प्रकोप तो नहीं कहा जा सकता है। सरकार ने इसे कारगर रूप देने के लिए कुछ कदम उठाए हैं।

पर्यावरण संरक्षण एवं संवेदनशीलता योजनाएँ
एनडीएमए की सिफारिशें:

2013 की आपदा के बाद किए गए आकलनों में जीएलओएफ (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड) संभावित क्षेत्रों के आसपास बफर ज़ोन बनाने और पर्यटन पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया था, लेकिन इसका क्रियान्वयन अब भी अधूरा है।

राष्ट्रीय सतत हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र मिशन (एनएपीसीसी):
भारत की जलवायु कार्ययोजना का 2008 से हिस्सा रहे इस मिशन का उद्देश्य हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की निगरानी और संरक्षण करना है, जिसके लिए प्रारंभिक रूप से लगभग 550 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था।

एनएमएसएचई (भारत की एनएपीसीसी के तहत शुरू किया गया) का उद्देश्य हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य की निगरानी के लिए राष्ट्रीय क्षमता का निर्माण करना, नीतियों को जानकारी प्रदान करना और राज्य-स्तरीय कार्रवाई का समर्थन करना था। व्यवहार में इस मिशन ने कुछ उपयोगी छोटे पैमाने के शोध परियोजनाएँ और निगरानी पायलट तैयार किए हैं, लेकिन यह ज्ञान को पूरे क्षेत्र में व्यापक, व्यवस्थित कार्रवाई में बदलने में विफल रहा है, क्योंकि इसे लगातार अपर्याप्त संसाधन, कमजोर संस्थागत ढांचा, मंत्रालयों के बीच खराब समन्वय, स्थानीय शासन और समुदायों के साथ अपर्याप्त सहभागिता, तथा ज़मीनी विकास संबंधी निर्णयों को बदलने के लिए कमजोर अधिकार जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। इन संरचनात्मक खामियों का मतलब है कि एनएमएसएचई का उन मुख्य कारकों — अव्यवस्थित पर्यटन, सड़क/हाइड्रो विस्तार, और अनियंत्रित निर्माण — पर सीमित प्रभाव पड़ा है, जो हिमालय की संवेदनशीलता को तेज़ी से बढ़ा रहे हैं।

जहाँ दुनिया भर के हाइड्रोलॉजिस्ट से लेकर वैज्ञानिक एक सुर से इस बात को बोल रहे हैं कि बड़े बहुउद्देश्यीय परियोजनाओं से पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों से बचना चाहिए, वहीं भारत सरकार ने इसे खुले दिल से अपनाने का कार्य किया है। जम्मू और कश्मीर में पाकल दुल बाँध का निर्माण 2018 में शुरू हुआ और इसे सितंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य है। यह 167 मीटर ऊँचा कंक्रीट-फेस रॉक-फिल एमबैंकमेंट बाँध है, जिसका उद्देश्य 1,000 मेगावाट विद्युत उत्पादन है। इसके अलावा, अरुणाचल प्रदेश में ऊपर सियांग बहुउद्देश्यीय परियोजना की योजना अप्रैल 2009 में शुरू हुई। सियांग नदी पर बनने वाली यह परियोजना लगभग 11,000 मेगावाट बिजली उत्पादन के साथ-साथ जल नियंत्रण रणनीति का भी हिस्सा है और इसका रणनीतिक महत्व चीन के मेडोग बाँध परियोजना से जुड़ा हुआ है।

वैज्ञानिक और कार्यकर्ता हिमालय में बड़े बांध परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं, विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश में सियांग अपर बहुउद्देश्यीय परियोजना को लेकर। उनका कहना है कि इन परियोजनाओं से नाज़ुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और आदिवासी समुदायों पर संभावित पारिस्थितिक, सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभाव पड़ सकते हैं। विरोध प्रदर्शनों में यह भी रेखांकित किया गया है कि यह क्षेत्र पहले से ही बाढ़ और भूस्खलन जैसी जलवायु-जनित आपदाओं का सामना कर रहा है, और इन परियोजनाओं से क्षेत्र की स्थिरता और अधिक खतरे में पड़ सकती है। 

इससे पहले, एक लंबे समय से अतुल सती जी ने उत्तराखंड में एक व्यापक पर्यावरणीय समस्या को ध्यान में रखते हुए एक बड़े पर्यावरण आंदोलन की शुरुआत की, जो अभी तक जारी है। परंतु सरकार रोज़ नई टनल परियोजना, सड़क परियोजना, बहुउद्देश्यीय परियोजना के दम पर हिमालय को पूरी तरह तबाह करने पर आमादा मालूम होती है। परंतु इसका खामियाज़ा केवल हिमालय ही नहीं भुगत रहा है। अगर हम उत्तर भारत के अंदर की बाढ़ की स्थिति का जायज़ा लें, तो हमें यह साफ़ पता चल जाएगा कि जिस स्तर से नदियाँ अपने साथ अवसाद लेकर आ रही हैं, वह उनके जलस्तर को लगातार बढ़ाएगा, जो व्यापक भू-स्खलन के कारण और भी बढ़ते जाएँगे।

वहीं, नदियों के साथ अधिक अवसाद आने का सीधा नुकसान बड़े बाँधों पर भी पड़ता है, जिसके दबाव के कारण बाँध टूटने की संभावना भी हमेशा बनी रहती है। इसके अलावा, पूरे उत्तर भारत में नदी तटीय मैदानी क्षेत्रों में बालू माफिया और ज़मीन अधिग्रहण की वजह से स्थिति और भी खराब होती जा रही है।

हाल ही में टैरिफ मामले की सरगर्मी में डब्ल्यूटीओ फिर से चर्चा में आ गया है, जहाँ अमेरिका ने भारत के आयातों पर 50 फ़ीसदी से ज़्यादा टैरिफ लगा दिया है, वहीं डब्ल्यूटीओ ने अब तक अमेरिका पर प्रत्यावर्ती शुल्क (countervailing duties) नहीं लगाया है। अगर डब्ल्यूटीओ के नियम और क़ानूनों के अनुसार देखा जाए तो यह एक व्यापार-विरोधी प्रक्रिया है, जिसे ख़त्म किया जाना चाहिए। परंतु जब बात बड़े बाँध परियोजनाओं या बड़े आधारभूत संरचनाओं के निर्माण पर हो रही हो, तो डब्ल्यूटीओ एक प्रासंगिक इकाई बन जाती है।

विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) स्वयं सीधे बड़े बाँधों की योजना, वित्तपोषण या निर्माण नहीं करता — लेकिन इसके व्यापार नियम, विवाद निपटान तंत्र और वैश्विक वित्त तथा अवसंरचना बाजारों के साथ उनकी सहभागिता ने अप्रत्यक्ष रूप से बड़े बाँध परियोजनाओं को बढ़ावा दिया है, विशेषकर विकासशील देशों में। कई पर्यावरणविद और जल-अधिकार कार्यकर्ता तर्क देते हैं कि डब्ल्यूटीओ का ढांचा, संबद्ध संस्थान (विश्व बैंक, आईएमएफ, क्षेत्रीय विकास बैंक) के साथ मिलकर, ऐसा आर्थिक और कानूनी माहौल तैयार करता है जो छोटे पैमाने की, समुदाय-आधारित वैकल्पिक परियोजनाओं की तुलना में बड़े अवसंरचना प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता देता है। वह डब्ल्यूटीओ संस्था थी जिसने बड़े बाँध परियोजनाओं को व्यापार से जोड़कर विदेशी पूँजियों को उनकी ओर आकर्षित किया।

सामान्य व्यापार समझौता सेवाओं पर (GATS) के तहत, जल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन को व्यापार योग्य सेवाओं के रूप में माना जाता है। इससे राष्ट्रीय जल और ऊर्जा क्षेत्रों को विदेशी कंपनियों -जिनमें बाँध निर्माण फर्म, बड़ी इंजीनियरिंग कंपनियाँ और ऊर्जा उपयोगिताएँ शामिल हैं- के लिए खोल दिया जाता है।

डब्ल्यूटीओ के नियम विदेशी निवेश संरक्षण को प्रोत्साहित करते हैं, जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए विकासशील देशों के जल विद्युत बाजारों में प्रवेश करना और प्रभुत्व स्थापित करना आसान हो जाता है। सरकार पर अवसंरचना अनुबंधों को वैश्विक निविदा के लिए खोलने का दबाव डाला जाता है, जो अक्सर छोटे, स्थानीय विकल्पों की तुलना में बड़े बांध निर्माण के पक्ष में जाता है।

यह एक तय सत्य है कि सरकार आज एनडीआरएफ (नेशनल डिजास्टर रिलीफ फोर्स) के दम पर जितनी वाहवाही बटोरनी है बटोर ले कि हमने तो लोगों का नुकसान होने से बचाया है या लोगों की जानें बचाई हैं। परंतु सच यही है कि वर्तमान की पर्यावरण नीति वास्तविकता में वहाँ के स्थानीय और पर्यावरण — दोनों के हित में नहीं है, जिस पर गंभीरता से सोचने और अमल में लाने की आवश्यकता है।

(निशांत आनंद पेशे से एडवोकेट हैं और लेखन का भी काम करते हैं।)

Ramswaroop Mantri

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