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हिन्दुओं को एक से अधिक पत्नी रखने का अधिकार नहीं है, पर मुसलमान 3-4 पत्नियाँ रख सकता है ?हरिशंकर परसाई जी का उत्तर

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भ्रम और धार्मिककूपमंडकता तथा मजहबी संकीर्णता का एक नमूना

जो आप कह रहे हैं वह ‘विश्व हिन्दू परिषद्’ और ‘आरएसएस’ का प्रचार है . आपको कई भ्रमों में फँसा लिया गया है . इस देश पर सात सौ साल मुसलमानों का शासन रहा है फिर भी हिन्दू कम नहीं हुए. अभी हिन्दू 85 फीसदी हैं . मगर हिन्दू हैं कौन? अछूत तथा नीची जाति के लोग क्या हिन्दू हैं ? ये हिन्दू हैं तो ऊंची जाति के लोग इन्हें छोटे क्यों नहीं? इन्हें सामूहिक रूप से क्यों मारते हैं? इनके झोपड़े क्यों जलाते हैं? हिन्दू कोई नहीं है – ब्राह्मण हैं, कायस्थ हैं, अग्रवाल हैं, बढई हैं, नाई हैं, भंगी हैं, चमार हैं.एक बात सोचिये, हज़ारों सालों से इस देश में हिन्दू हमेशा करोडो रहे हैं और हमला करने वाले सिर्फ हज़ारों . मगर हारे हिन्दू ही हैं . नादिरशाह के पास सिर्फ एक हज़ार सिपाही थे . अगर हिन्दू पत्थर मारते तो भी वे मर जाते . दस हज़ार अंग्रेज़ तीस करोड़ भारतीयों पर राज करते रहे हैं . संख्या से कुछ नहीं होता .आप सौ मुसलामानों का यूं ही पता लगाइए . इनमें कितनों की 3-4 बीवियाँ हैं . आपको किसी की नहीं मिलेगी . हज़ारों में कोई एक मुसलमान एक से ज्यादा बीवी रखता है बाकि सब एक बीवी ही रखते हैं . मुसलमान नसबंदी कराते हैं . मुसलमान औरतें भी ऑपरेशन कराती हैं . अभी संख्या ज़रूर कुछ कम है .अच्छा हिन्दू बढाने के लिए संतति निरोध बंद कर देते हैं और हर हिन्दू को 3-4 पत्नियाँ रखने का अधिकार दे दें तो बेहिसाब हिन्दू पैदा होंगे . पर आम हिन्दू के 15-20 बच्चे होंगे इन्हें वो कैसे पालेगा? क्या खिला सकेगा? कपडे पहना सकेगा? शिक्षा दे सकेगा? ये भुखमरे, मरियल , अशिक्षित करोड़ों हिन्दू होंगे या कीड़ें और केचुएँ? क्या कीड़ें और केचुए से किसी जाति की उन्नति होती है?आबादी बढ़ती रही तो कितना ही उत्पादन हो, हम भूखे और गरीब रहेंगे, मगर हिन्दू-मुसलमान दोनों के साम्प्रदायिक नेता अपनी जाति बढ़ाने के लिए कहते हैं. जो बात विश्व हिन्दू परिषद् वाले और आरएसएस वाले हिन्दुओं से कहते हैं वैसी ही बात मुल्ला मुसलामानों से कहते हैं – नसबंदी मत कराओ. मुसलमान बढ़ाओ. अब मुसलामानों की गरीबी, अशिक्षा आदि देखो.शैतान धार्मिक नेताओं और सांप्रदायिक राजनीतिवालों ने यह सिखा दिया है कि हिन्दू और मुसलमान दोनों के जीवन का एकमात्र उद्देश्य और महान राष्ट्रिय कर्म एक दुसरे को दबाना है. यह हद दर्जे की बेवकूफी और बदमाशी है. ऐसा सिखाना देशद्रोह और राष्ट्रद्रोह है. हमें भारतीयता के नज़रिए से सोचना चाहिऐ.
* पूछिए परसाई से (अंक दिनाँक:  5 फरवरी 1984) #देशबन्धु

 संकलन-निर्मल कुमार शर्मा

Ramswaroop Mantri

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