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कृष्ण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

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        डॉ. विकास मानव

महाभारत में प्राप्त कृष्ण सम्बन्धी सन्दर्भों से उनके ऐतिहासिक व्यक्तित्व की सूचना मिलती है और ज्ञात होता है कि वे वृष्णि वंशीय सात्वत जाति के पूज्य पुरुष थे। 

     यह भी संकेत मिलता है कि महाभारत और पुराणों में वर्णित कृष्ण के चरित्र और किन्हीं ऐतिहासिक वासुदेव कृष्ण सम्बन्धी कथा में कुछ अन्तर अवश्य रहा होगा, क्योंकि महाभारत और पुराणों में अनेक स्थलों पर इस बात पर बल दिया गया है कि यही कृष्ण वास्तविक वासुदेव हैं, यही द्वितीय वासुदेव हैं। 

     द्वितीय वासुदेव कहने का अभिप्राय यह था कि कुछ अन्य राजा भी अपने को द्वितीय वासुदेव के नाम से प्रसिद्ध करने का यत्न करते थे। पौण्ड्र राजा पुरुषोत्तम और करवीरपुर के राजा श्रृगाल इसी प्रकार के व्यक्ति थे, जिन्हें मारकर कृष्ण ने सिद्ध किया कि उनका वासुदेवत्व मिथ्या है तथा वे ही स्वयं एकमात्र वासुदेव हैं।

      महाभारत, हरिवंश पुराण तथा विष्णु पुराण, वायु पुराण, वामन पुराण, भागवत पुराण आदि पुराणों में कृष्ण की तुलना में इन्द्र की हीनता सिद्ध करने के लिए अनेक कथाएँ दी गयी हैं; परन्तु फिर भी गोवर्धन पर्वत धारण के प्रसंग में उनके इन्द्र द्वारा अभिषिक्त होने और ‘उपेन्द्र’ नाम से स्वीकृत होने का उल्लेख हुआ है। 

     पुराणों में विविध कथाओं के माध्यम से उत्तरोत्तर कृष्ण की महत्ता और उसी अनुपात में इन्द्र की हीनता प्रमाणित की गयी है। महाभारत में कृष्ण के ऐश्वर्य और देवत्व का प्रचुर वर्णन है परन्तु उनके लालित्य और माधुर्य का कोई संकेत नहीं मिलता।    

      महाभारत उनके गोप जीवन और गोपी प्रेम के सम्बन्ध में सर्वथा मौन है। सभा पर्व के उस प्रसंग में भी, जिसे प्रक्षिप्त कहा जाता है और जिसमें शिशुपाल कृष्ण की निन्दा करते हुए उनके द्वारा पूतना, बकासुर, केशी, वत्सासुर और कंस के वध तथा गोवर्धन धारण किये जाने का उल्लेख करता है, गोपियों से उनके प्रेम का कोई संकेत नहीं किया गया है। 

      इससे यह स्पष्ट सूचित होता है कि गोपाल कृष्ण का ललित और मधुर चरित मूलत: महाभारत के कृष्ण के चरित से भिन्न था। 

     पुराणों में वर्णित कृष्ण सम्बन्धी ललित कथाएँ उनमें उत्तरोत्तर वृद्धि पाती गयी हैं। उदाहरण के लिए हरिवंश में जिसे ‘वास्तव में महाभारत का परिशिष्ट कहा जाता है, उनके गोपाल रूप सम्बन्धी सन्दर्भ अतयन्त संक्षिप्त है। उनकी तुलना में उनके ऐश्वर्य रूप की भोग-विलास सम्बन्धी अनेक कथाएँ कहीं अधिक विस्तार से वर्णित हैं। 

     विष्णु पुराण में भी लगभग ऐसी ही स्थिति है। किन्तु भागवत, पद्म पुराण , ब्रह्म वैवर्त पुराण तथा कुछ अन्य पुराणों में, जिन्हें परवर्ती कहा जा सकता है, गोपाल कृष्ण सम्बन्धी कथन अधिक विस्तृत होने लगे हैं।

     पुराणों के भोग-ऐश्वर्य सम्बन्धी आख्यानों और गोप-गोपी लीला सम्बन्धी मधुर कथाओं में वातावरण का बहुत अन्तर पाया जाता है। यदि एक में घोर भौतिकता, विलासिता और नग्न ऐन्द्रियता है तो दूसरे में भावात्मक कोमलता, हार्दिक उत्फुल्लता, सूक्ष्म अनुभूति और अलौकिकता की ओर उन्मुख उदात्तता है।

     कुछ अन्वेषक कहते हैं कि गोपाल कृष्ण मूलत: शूरसेन प्रदेश के सात्वत वृष्णिवंशी पशुपालक क्षत्रियों के कुल देवता थे और उनके क्रीड़ा कौतुक की मनोरंजक कथाएँ मौखिक रूप में लोक-प्रचलित थीं। 

       इन कथाओं के लोक-प्रचलित होने के प्रमाण कुछ पाषाण मूर्तियों और शिलापट्टों पर उत्कीर्ण चित्रों में मिले है। मथुरा में प्राप्त एक खण्डित शिलापट्ट में वसुदेव नवजात कृष्ण को एक सूप में सिर पर रखकर यमुना पार करते हुए दिखाये गये हैं। 

    5वीं शताब्दी ईसवी के एक दूसरे खण्डित शिलापट्ट में कालिय-दमन का दृश्य दिखाया गया है। यह छठी शताब्दी ईस्वी की अनुमान की गयी है। 

     बंगाल के पहाड़पुर नामक स्थान में छठी शताब्दी की कुछ मृण्मूर्तियाँ मिली हैं जिनमें धेनुकासुर वध, यमलार्जुन उद्धार तथा मृष्टिक चाणूर के साथ मल्ल-युद्ध के दृश्य दिखाये गये हैं। 

     यहीं पर एक अन्य मूर्ति मिली है जिसमें कृष्ण को किसी गोपी के साथ प्रसिद्ध मुद्रा में खड़े दिखाया गया है। अनुमान किया गया है कि यह गोपी सम्भवत: राधा का सबसे प्राचीन मूर्तिगत प्रमाण प्रस्तुत करती है। 

      राजस्थान के मण्डोर तथा बीकानेर के पास सूरतगढ़ में क्रमश: द्वारपाटों पर उत्कीर्ण गोवर्द्धन –धारण, नवनीत-चौर्य, शकटभंजन और कालिय-दमन के चित्र उत्कीर्ण मिले हैं तथा गोवर्धन-धारण और दान-लीला का दृश्यांकन प्रस्तुत करने वाले कुछ सुन्दर मिट्टी के खिलौने प्राप्त हुए हैं। 

     मण्डोर के चित्र चौथी-पाँचवी शताब्दी ईस्वी के अनुमान किये गये हैं। 

      दक्षिण भारत के बादामी के पहाड़ी क़िले पर कृष्ण-जन्म, पूतना-वध, शकट-भंजन, कंस-वध आदि के अनेक दृश्य गुफ़ाओं में उत्कीर्ण मिले हैं। जो छठी-सातवीं शताब्दी ईस्वी के माने जाते हैं।

Ramswaroop Mantri

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