कश्मीर समस्या के पीछे का सचभाग 8
*अजय असुर*
भारत सरकार कश्मीर राज्य की सरकार पर यह दबाव डालने लगी कि राज्य सरकार केन्द्र को और ज्यादा अधिकर प्रदान करें। जिससे मई, 1949 में राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार के प्रतिनिधियों के बीच यह तय हुआ कि राज्य की संवैधानिक सभा ही यह तय करेगी कि भारत सरकार को कौन सी शक्तियाँ हस्तांतरित की जायें और जुलाई 1949 में शेख अब्दुल्ला, मिर्जा अफसल बेग, मसूदी और मोती राम बागड़ा को भारत की संविधान सभा का हिस्सा बनाया गया। संविधानसभा में संशोधन व विचार-विमर्श के बाद 27 मई, 1949 को संविधान सभा में अनुच्छेद 306A जिसको बाद में 370 में डाल डाल दिया गया, पारित हुआ फिर करीब पांच महीने बाद 17 अक्टूबर, 1949 को अनुच्छेद 370 को भारतीय संविधान का हिस्सा बनाया गया। अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा मिलेगा। वहीं जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री और राज्यपाल को सदरे रियासत का दर्जा दिया जाएगा।
जब राज्य की संविधान सभा अपने अधिवेशन में राज्य के संविधान पर और महाराजा पर संघीय क्षेत्राधिकार की सीमा पर निर्णय से लेगी तो संविधान सभा की सिफारिश पर राष्ट्रपति एक निर्देश दे सकते हैं कि अनुच्छेद 370 को उनके द्वारा बताये अपवादों और संशोधनों के साथ लागू या रद्द किया जायेगा। इस प्रकार कश्मीर राज्य को जो संवैधानिक हैसियत मिली यह भारत सरकार ने नहीं प्रदान की, बल्कि उसे उन संबद्ध प्रावधानों से स्वीकृत प्रदान हुई है जो 1935 के भारतीय शासन अधिनियम, 1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के भारतीय (अंतरिम) संविधान आदेश और विलयन अंगीकार पत्र में समाहित हैं। महाराजा और उसके बाद सत्ता संभालने वाले इस हैसियत को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। राज्य की संविधान सभा में बोलते हुए अब्दुल्ला ने व्याख्या की कि, “जबकि दूसरे महाराजाओं ने अपने राज्यों में भारतीय संविधान को लागू करने की मान्यता दे दी तो महाराजा हरि सिंह ने इस मान्यता से इंकार कर दिया। उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत की संविधान सभा या इसकी उत्तराधिकारी संसद को अनुच्छेद 370 को संशोधित या रद्द करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं था। यह अधिकर सिर्फ राज्य की संविधान सभा को था।
अनुच्छेद 370 कश्मीर राज्य के लिए केन्द्रीय सूची और समवर्ती सूची के उन मामलों पर कानून बनाने के संसद के अधिकारों को सीमित करता है जिन्हें राष्ट्रपति विलयन संबंधी दस्तावेज में दर्ज मामलों से संबद्ध करार दें और ऐसे कुछ मामले जो “राज्य सरकार की सम्मति से राष्ट्रपति निर्धारित कर सकते हैं। विलयन दस्तावेज और अन्य प्रावधानों में संघीय सरकार और कश्मीर राज्य के संबंधों में इतनी स्पष्टता के बावजूद राज्य सरकार शब्द की व्याख्या पर विवाद पैदा किया गया। शेख अब्दुल्ला ने केन्द्र-राज्य संबंधों को हमेशा के लिए परिभाषित करने के लिए यह सलाह दी कि अनुच्छेद 370 में ‘राज्य सरकार का अर्थ सिर्फ महाराजा द्वारा पहली बार 5 मार्च 1948 को नियुक्त मंत्रिमंडल होना चाहिए। लेकिन आयंगर बाद की सरकारों को भी शामिल करने के पक्ष में थे, जिससे कि बाद की राज्य सरकारों के साथ भी गोलभाव करके या धौसपट्टी से नए केन्द्रीय कानूनों को राज्य पर लागू करने का अधिकार हासिल किया जा सके।
1951 में जम्मू-कश्मीर की अलग से अपनी संविधान सभा का आयोजन किया जाता है और मजे की बात ये है कि इस संविधान सभा के सभी सदस्य शेख अब्दुल्ला के नेशनल कॉन्फ्रेंस के ही होते हैं और अन्ततः नवम्बर 1956 में जम्मूकश्मीर का अपना संविधान बनकर तैयार हो जाता है और 26 जनवरी, 1957 को जम्मू-कश्मीर का संविधान लागू हो जाता है। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर भारतीय संघ का एक अभिन्न अंग बन गया। इस वजह से जम्मूकश्मीर की संविधान सभा भंग हुई और विधानसभा ने इसकी जगह ली।
अनुच्छेद 370 संविधान के भाग 21 का अनुच्छेद है, जिसका शीर्षक है- ‘अस्थायी, परिवर्तनीय और विशेष प्रावधान’ (Temporary, Transitional and Special Provisions) और अनुच्छेद 370 के शीर्षक के शब्द हैं – जम्मू–कश्मीर के सम्बन्ध में अस्थायी प्रावधान (“Temporary provisions with respect to the State of Jammu and Kashmir” जम्मू और कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी प्रावधान अनुच्छेद 370-
(1) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी,-
(ए) अनुच्छेद 238 के प्रावधान अब जम्मू और कश्मीर राज्य के संबंध में लागू नहीं होंगे;
(बी) उक्त राज्य के लिए कानून बनाने की संसद की शक्ति सीमित होगी-
(i) संघ सूची और समवर्ती सूची में वे मामले, जो राज्य की सरकार के परामर्श से, राष्ट्रपति द्वारा घोषित किए जाते हैं, जो राज्य के भारत के अधिराज्य को नियंत्रित करने वाले परिग्रहण के साधन में निर्दिष्ट मामलों के अनुरूप हैं। उन मामलों के रूप में जिनके संबंध में डोमिनियन विधानमंडल उस राज्य के लिए कानून बना सकता है; तथा
(ii) उक्त सूचियों में ऐसे अन्य मामले, जो राज्य सरकार की सहमति से राष्ट्रपति आदेश द्वारा निर्दिष्ट करें।
स्पष्टीकरण [1950 शब्द]: इस अनुच्छेद के प्रयोजन के लिए, राज्य की सरकार का अर्थ उस व्यक्ति से है जिसे राष्ट्रपति द्वारा जम्मू और कश्मीर के महाराजा के रूप में मान्यता दी गई है, जो उस समय के लिए मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य कर रहा है। मार्च 1948 के पांचवें दिन महामहाराजा की उद्घोषणा के तहत कार्यालय;
स्पष्टीकरण [1952 शब्द]: इस अनुच्छेद के प्रयोजन के लिए, राज्य सरकार का अर्थ उस व्यक्ति से है जिसे राष्ट्रपति द्वारा राज्य की विधान सभा की सिफारिश पर सदर-ए-रियासत (अब राज्यपाल) के रूप में मान्यता दी गई है। जम्मू और कश्मीर के, राज्य के मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करना, जो फिलहाल कार्यालय में है।
(सी) अनुच्छेद 1 और इस अनुच्छेद के प्रावधान उस राज्य के संबंध में लागू होंगे;
(डी) इस संविधान के अन्य प्रावधान उस राज्य के संबंध में ऐसे अपवादों और संशोधनों के अधीन लागू होंगे जिन्हें राष्ट्रपति आदेश द्वारा निर्दिष्ट कर सकते हैं:
बशर्ते कि ऐसा कोई आदेश जो राज्य के विलय के साधन में निर्दिष्ट मामलों से संबंधित है, जो उप-खंड (बी) के पैराग्राफ (i) में निर्दिष्ट है, राज्य सरकार के परामर्श के अलावा जारी नहीं किया जाएगा:
परंतु यह और कि ऐसा कोई आदेश जो पिछले पूर्ववर्ती परंतुक में निर्दिष्ट मामलों के अलावा अन्य मामलों से संबंधित हो, उस सरकार की सहमति के बिना जारी नहीं किया जाएगा।
(2) यदि खंड (1) के उपखंड (बी) के पैराग्राफ (ii) में निर्दिष्ट राज्य सरकार की सहमति या उस खंड के उप-खंड (डी) के दूसरे प्रावधान में पहले दिया जाए राज्य के संविधान के निर्माण के उद्देश्य से संविधान सभा बुलाई जाती है, इसे ऐसे निर्णय के लिए ऐसी विधानसभा के समक्ष रखा जाएगा जो उस पर ले सकते हैं।
(3) इस अनुच्छेद के पूर्वगामी प्रावधानों में किसी भी बात के होते हुए भी, राष्ट्रपति, सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा, यह घोषणा कर सकते हैं कि यह लेख लागू नहीं होगा या केवल ऐसे अपवादों और संशोधनों के साथ और ऐसी तारीख से, जो वह निर्दिष्ट करें, लागू होगा:
बशर्ते कि राष्ट्रपति द्वारा ऐसी अधिसूचना जारी करने से पहले खंड (2) में निर्दिष्ट राज्य की संविधान सभा की सिफारिश आवश्यक होगी।
*शेष अगले भाग में…*
*अजय असुर*





