अंजनी कुमार
भंवर मेघवंशी का नाम एक पत्रकार और उससे भी अधिक उनके आरएसएस से हुए मोहभंग पर उनका अपना शानदार बयान, जो पुस्तकाकार प्रकाशित है, से जाना जाता है। यदि आप उनकी दोस्ती, समाज के प्रति दृष्टिकोण, इतिहासबोध और भूगोल के प्रति जागरूकता से परिचित होना चाहते हैं, तब आप जरूर ही उनकी पुस्तक ‘ पथिक मैं अरावली का’ को जरूर पढ़ें।
यह सिर्फ उनका महीने भर चला यात्रा-वृतांत नहीं है। यह उनकी अपनी जड़ों को तलाशती वह जिज्ञासाएं हैं जिनसे वह अस्तित्व और अस्मिता जैसे सवालों को हल करना चाहते हैं। वह अरावली की पहाड़ियों में दर्ज इतिहास को तलाशते हुए जोखिम भरी यात्रा से कतराते नहीं हैं।
वह पहाड़ियों के बीच बसे गांवों में जनश्रुतियों में लिखे इतिहास को परखते हैं और गांव में बने भोजन का ठाठ के साथ खाकर वहीं बिछी खाट पर सो जाने में भी कोई आलस नहीं करते। अरावली से उनका प्रेम उनके इस यात्रा-वृतांत में यहां बसे समाज का दस्तावेज बनता गया है।
उनके इस यात्रा-वृतांत से मेरा साबका तब पड़ा जब मैं खुद भी अरावली के कुछ ऐतिहासिक स्थलों को देखकर बस लौटा ही था। माउंट आबू, उदयपुर, चित्तौगढ़ को मैंने उनकी पुस्तक के माध्यम से एक और बार देखा। हालांकि कुंभलगढ़ का किला देखना रह गया। अरावली की पहाड़ियां गुजरात से शुरू होकर राजस्थान और दिल्ली तक आती हैं।
इसके ठीक ऊपर सिंध की बेसिन में भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता का जन्म हुआ जो कच्छ तक फैला हुआ था। बाद के समय में, जिसे आमतौर पर ‘उत्तरवर्ती’ शब्द दे दिया गया, यह सभ्यता राजस्थान के निचले इलाकों, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर-प्रदेश तक फैल गया। हड़प्पा-मोहनजोदड़ों की सभ्यता राजस्थान में, खासकर बनास नदी के किनारों पर अपनी नई विशिष्टता के साथ विकसित हुई। राजस्थान एक ऐसी जगह है जहां सभ्यता का इतिहास अपनी गति का अटूट बनाये रखा।
भंवर मेघवंशी की यात्रा गुजरात के बनासकांठा के इडर से शुरू होती है।
वह लिखते हैं: ‘‘इडर का इतिहास एक भील आदिवासी राजा से जुड़ा हुआ बताया जात है जिसका नाम मांडलिक भील था। यह भी दावा किया जाता है कि मांडलिक ने ही गुहिल वंश के राजा गुहादित्य को अपने इलाके में शरण दी थी, किन्तु आदिवासीयों का लिखित इतिहास अप्राप्य होने की वजह से यह इतिहास बोध केवल लोक चेतना और उस पर आधाारित किंवदंतियों पर आश्रित रह जाता है, इडर का लिखित इतिहास कुछ और ही कहानी बयां करता है।’’
उनकी यह पुस्तक इसी लिखित इतिहास और लोक चेतना पर आधारित किंवदंतियों, पुरातात्विक अवशेष और इतिहास की गाथाओं से जुड़े किले और स्मारक, राजाओं के महल और आदिवासी जीवन, मंदिर, खदान और स्थानीय जीवन के बीच चल रहे संवाद को सामने लाती है।
आबू पर्वत के निचले हिस्से में बसे चंद्रावती नगर के अवशेष और पुरातत्व की उपेक्षा भरी स्थिति को पढ़ते हुए किसी का भी मन विचलित हो सकता है। इसी से आगे भूला वालोरिया का भील विद्रोह के स्थल पर पहुंचते हैं।
1922 में पूरे भारत में किसानों का आंदोलन भड़क उठा था। यहां उठे विद्रोह का दबाने के लिए सिर्फ अंग्रेजों की फौज ही नहीं लगी थी, यहां सामंत शासकों ने मिलकर भील आदिवासी किसानों पर हमला किया। चारों तरफ घेर कर गोलीबारी कर मारे आदिवासी किसानों की संख्या अलग-अलग दर्ज की गई। कहीं 800 तो कहीं 1800। तीर कमान से लड़ने वाले भील किसानों ने अपने संघर्ष को आने वाले समय में भी जारी रखा।
इन्हीं संदर्भों में जब लेखक याद दिलाते हैं कि प्रख्यात इतिहासकार गौरीशंकर ओझा ने ‘सिरोही राज्य का इतिहास’ लिखा तब उसमें से इस वीभत्स नरसंहार का उल्लेख तक नहीं किया जबकि वह इसी क्षेत्र के निवासी थे। आज भी इस घटना को याद दिलाने वाला शहीद स्मारक भयावह दुर्दशा की स्थिति में है।
आबू पर्वत अरावली की सबसे ऊंची पर्वत शृंखला है, समुद्र तल से 5653 फीट ऊंचा। इस ऊंचे शिखर पर बहुत से मंदिर हैं जिसमें प्रधानता तो जैन धर्म की है, लेकिन, अन्य मंदिर भी हैं। इसी पर्वत को केंद्र में रखकर राजपूतों की पौराणिक वंशावलियां और उनकी उत्पत्ति को रखा गया।
इसके बाद की यात्रा सिरोही जिले की ओर बढ़ जाती है। वह यहां के सारणेश्वर महादेव मंदिर के बारे में बताते हैं जहां होली के समय में कई दिनों के मेला लगता है। एक परम्परा के अनुसार एक दिन यहां सिर्फ देवासी लोग ही हिस्सेदार होते हैं और उनका अपना गैर नृत्य होता है। यह मंदिर तो विष्णु का है लेकिन यहां 108 शिवलिंग भी स्थापित है। धार्मिक अंतरक्रिया का यह नमूना किसी इतिहास में नहीं सिर्फ वहां के व्यवहार में उपस्थित है।
वह सिरोही से रोहिड़ा पहुंचने दौरान देखे गये एक परिदृश्य पर लिखते हैं: ‘‘कोटड़ा पहुंचने तक सड़क के दोनों तरफ झोपड़ी, दुकानें और टी-स्टाल दिखे, पहाड़ों पर छितरे मकान और बिखरी हुई आबादी, खजूर के पत्तों से बने घर आते रहे, सजे-संवरे स्टाइलिश आदिवासी युवक-युवतियां गांव-गांव में घूमते मिले। कुछ गांवों में पहाड़ की टेकरियों पर लोग जमा थे।
पूछने पर ज्ञात हुआ कि आजकल आदिवासी अंचल में उत्सवों का मौसम है। देवी-देवताओं की नई मूर्तियों की स्थापना से लेकर शादी-ब्याह तक इन्हीं दिनों चलते हैं। आदिवासी समाज मूलतः संतोषी, अपरिग्रही और उत्सवधर्मी है। वह अभावों में नाच सकता है और जी भर कर गा सकता है, वह नैसर्गिक है, उसमें बनावटीपन अब भी उतना प्रभावी नहीं है, जितना अन्य समुदायों में घर कर गया है।’’
एक ओर सामंतों और राजाओं के किलों के वर्णन हैं और उसी के सामानान्तर आदिवासी समुदाय के जीवन का गहन चित्रण है। जहां इन दोनों का सम्मिलन होता है वहां एक और महाराणा प्रताप के संघर्षों की गाथा है और दूसरी अमर बलिदानी कालीबाई भील को रावलों द्वारा घृणित तरीके से मार दिया जाना है।
भंवर मेघवंशी ने डूंगरपुर के बारे में हेमन्त खराड़ी के हवाले से बताते हैं कि इसे बसाने वाले डूंगर भील थे, रावल ने धोखे से उनसे उनका राज्य छीन लिया और उनका कत्लेआम कराया। हालांकि जिस तरह की कहानी का उन्होंने जिक्र किया है, ऐसी कहानियां मैंने पूर्वांचल के गांवों में भी सुनी हैं।
यहाँ यह कहानी भरों और शिवरी के किलों पर राजपूतों द्वारा कब्जा करने संदर्भ में सुनाई जाती है। जनश्रुतियां अपने साथ नृजातीय तत्वों को लेकर चलती है जिसमें शासक वर्ग और शासित के बीच के अंतर्संबंध उसमें निहित होते हैं।
इस पुस्तक में कालीबाई और नाना लाल जी खांट के बलिदान कहानी को पढ़ना एक शानदार अनुभव से गुजरना है।
‘‘रास्तापाल गांव में नाना लाल खांट के घर में विद्यालय संचालित होता था, जिसमें कालीबाई कलसुआ भी पढ़ती थी। डूंगरपुर नरेश प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं के दमन में जुटा था। रास्तापाल स्कूल बंद करने का आदेश दिया गया, जिसे मााने से नाना लाल खांट ने इनकार कर दिया तो उन पर तरह तरह के अत्याचार किये गये।
19 जून, 1949 को को अंग्रेज सैनिक आये और उन्होंने रास्तापाल स्कूल के शिक्षक सेंगा भाई भील को ट्रक के पीछे बांध कर घसीट कर ले जाने लगे। कालीबाई भील अपने खेत से घास काट कर लौट रही थी, जब उसने अपने गुरूजी पर यह जुल्म देखा तो उससे रहा नहीं गया। पूरे गांव में किसी ने हिम्मत नहीं की लेकिन छोटी सी बालिका कालीबाई दराती हाथ में लेकर ट्रक के पीछे दौड़ पड़ी और चिल्लाई, ‘मेरे गुरूजी को कहां ले जा रहे हो, उनको छोड़ो।’
ऐसा कहते हुए कालीबाई ने उस रस्से को काट डाला जिससे बांधकर सेंगा भाई घसीटे जा रहे थे, इससे सेंगा भाई की जान तो बच गई, लेकिन, बेरहम अंग्रेजों ने उस अदम्य साहती नन्हीं बालिका को गोली मार कर घायल कर दिया।’’ इस गोलीबारी में कालीबाई नन्हीं बालिका शहीद हो गई। लेकिन, उसने शिक्षा जगत में अपनी मशाल जला दिया।
चित्तौड़गढ़ की कथा इसके आसपास के इलाकों में फैली हुई है। राजपाट, षडयंत्र, संघर्ष और युद्ध की कथा वापस उदयपुर तक पहुंच जाती है। पन्ना धाय की कहानी आदिवासी समुदाय के गांवों और उनकी कथाओं के बीच से गुजरती है। महाराणा प्रताप की कहानी भी पहाड़ों में बसे आदिवासीयों के बीच गये बिना अधूरी है।
भंवर मेघवंशी की यात्रा किलों और मंदिरों तक महफूज नहीं है। वह अरावली की गुफाओं और वहां बसे गांवों में जाने, बात करने और उनके साथ समय गुजारने के साथ रची बसी है।
इन यात्राओं से होते हुए वह कुम्भलगढ़ पहुंचते हैं। इसका नाम राजा कुम्भा के नाम से जाना जाता है। राणा कुम्भा सिर्फ योद्धा नहीं थे, वह विद्वान और लेखक थे। वह अपने साम्राज्य का तेजी से विस्तार कर रह थे, लेकिन बाबर को लेकर उनकी अपनी गई रणनीति उनके ही खिलाफ गई। बाबर ने बारूद का रणनीतिक प्रयोग कर एक हारे हुए युद्ध को जीत में बदल दिया और भारत के नक्शें अपनी उपस्थिति को दर्ज करा दिया। यह मान्यता भी दर्ज है कि कुम्भलगढ़ का किला राणा कुम्भा ने बनवाया था।
लेकिन, सच्चाई यही है कि यह मौर्य काल में मौजूद था और अशोक के पुत्र को यह किला उत्तराधिकार में मिला था। स्थानीय कहानियों में यह बात दर्ज है कि राणा कुम्भा के हार जाने के बाद भी इस किले की रक्षा धीणा हाटेला ने कई महीनों तक की। लेखक ने दर्ज किया है इस नायक की कुर्बानी बिना लिखे रह गई। उनके साथ चल रहे उनके मित्र ने पूछा है कि ‘‘इतिहास दलितों के प्रति इतना निर्मम क्यों है, जबकि बैराठ दुर्ग के चारों तरफ की दीवार का नाम आज भी धीणा कोट ही है?’’
प्रकृति, जीवन, इतिहास, कथा, जनश्रुतियों से गुजरते हुए भंवर मेघवंशी के साथ कई लोगों ने यात्राएं की हैं। उनकी पूरी यात्रा शिक्षकों, पत्रकारों, चित्रकारों, समाजसेवी, मेहनतकश आदि लोगों के साथ पूरी हुई। हालांकि अरावली की यह यात्रा एक पड़ाव की तरह है। लेकिन, यह यात्रा जीवन की परतों का परत दर परत खोलने का काम करती है। यह यात्रा एक संवाद की तरह चलती है।
पहाड़ों के उन्नत शिखरों तक पहुंचने, उनकी गुफाओं को देखने और नदी की धार के साथ यात्रा करने की उनकी आकांक्षाएं आपको अपने परिवेश को देखने की नई दृष्टि देती है। यह यात्रा वृतांत जीवन के जमीनी अनुभवों से होकर गुजरने की कथा है। देखना, सिर्फ एक क्रिया नहीं है, यह चिंतन की अप्रतिम अनुभूति भी है। यह यात्रा वृतांत आपकों इन अनुभूतियों की सैर कराती है।
पथिक मैं अरावली का – भंवर मेघवंशी
प्रकाशक – राजपाल, प्रकाशन वर्ष – 2024
मूल्य – 375 रूपया





