अग्नि आलोक
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भारतीय साहित्य में होली

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भारतीय संस्कृति में होली के विभिन्न रंग [आलेख] - कृष्ण कुमार यादव

पुष्पा गुप्ता(महमूदाबाद)

  _"फागु की भीर, अभीरिन ने गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी_

भाय करी मन की पद्माकर उपर नाई अबीर की झोरी
छीने पीतांबर कम्मर तें सु बिदा कई दई मीड़ि कपोलन रोरी।
नैन नचाय कही मुसकाय ”लला फिर आइयो खेलन होरी।”
रीतिकालीन कवि पद्माकर के ये प्रसिद्ध पँक्तियाँ कृष्ण और गोपियों की प्रसिद्ध होली का मधुर चित्र खींचती है।
पूरा ब्रज क्षेत्र अद्भुत रास-रंग में डूब जाता है। फूलों की होली, लठमार होली देशी-विदेशी सैलानियों को बहुत आकर्षित करती है।
भागवत पुराण के अनुसार कथा है कि असुर राजा हिरण्यकशिपु का पुत्र विष्णु-भक्त था। राजा के आदेश पर उसकी बहन होलिका, जिसे वरदान था कि अग्नि जला नहीं सकती, बालक को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गयी। बालक प्रह्लाद का बाल भी बांका न हुआ और होलिका जल मरी। होलिका उत्पीड़न और वैर का प्रतीक हो गयी और प्रह्लाद निर्दोष भक्ति और विश्वास का।

एक अन्य मिथकीय कथा है कि भगवान शिव ने बसन्तपंचमी के दिन कामदेव को बाण मारने के कारण अपने क्रोध की अग्नि से भष्म कर दिया था और विरक्त होकर चले गए थे।
पार्वती ने तपस्या से उनको प्रसन्न किया। रति के विलाप से द्रवित होकर उन्होंने कामदेव को जीवित कर दिया। यह बसन्तपंचमी के चालीसवें दिन हुआ।

एक अन्य लोककथा ढूंढी नामक राक्षसी की है, जो राजा पृथु के समय में थी। वह बच्चों को खा जाती थी।
बच्चों ने राजपुरोहित की सलाह पर अग्नि जलाकर उसकी प्रदक्षिणा करते हुए ख़ूब शोर-शराबा किया जिसे सुनकर वह आयी। बच्चों ने एक समूह बनाकर नगाड़े बजाते हुए राक्षसी को घेरा, धूल और कीचड़ फेंकते हुए उसको शोरगुल करते हुए नगर के बाहर खदेड़ दिया।
प्रथम पुरुष मनु का जन्म भी इसीदिन हुआ था, ऐसी मान्यता है।

फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका-दहन किया जाता है। द्वेष, वैर, घृणा सबको इसी अग्नि में जलाकर प्रेम और मित्रता का स्वागत करने का त्यौहार है होली।

वैदिक काल में इस पर्व को नवानैष्टि यज्ञ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा।
होली बसंतोत्सव और मदनोत्सव के रूप में बहुत समय से मनाई जाती रही है। संस्कृत साहित्य में हर्ष, कालिदास, माघ, भारवि आदि कवियों ने इस त्यौहार का उल्लेख किया है। कालिदास ने ऋतुसंहार में लिखा है-
‘दुमा: सपुष्पा: सलिलं सपद्यम्
स्त्रियः सकायाः पवनः सुगन्धि
सुखा प्रदोषा दिवसाश्च रम्या:
सर्व प्रिये चारुतरं वसंते।
भक्तिकाल और रीतिकाल में अनेक कवियों ने राधा-कृष्ण की होली का मनभावन चित्रण किया है। सूर, मीरा, पद्माकर, बिहारी, रहीम, रसखान आदि के काव्य में होली की ख़ूब चर्चा है।
सूर ने होली का बहुत रमणीक वर्णन किया है।
‘हरि संग खेलति हैं सब फाग।
इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।।’

भारतीय शास्त्रीय संगीत में कई राग होली के समय विशेष रूप से गाये जाते हैं, राग बसन्त, बहार, हिंडोल, धमार आदि जिनमें प्रमुख हैं।
होली में फाग और जोगीरे आदि गाने का भी प्रचलन लोक में है।
कई देवी-देवताओं से इसे जोड़कर बहुत तरह के गीत गाये जाते हैं जिनमें :
‘खेलत रघुपति होरी हो, संगे जनक किसोरी
इत राम लखन भरत शत्रुघ्न, उत जानकी सभ गोरी, केसर रंग घोरी।’
‘होली खेले रघुवीरा अवध में, होली खेले

राम-सीता को जोड़कर गाया जाता है। कृष्ण-राधा से जुड़े तो सैंकड़ो गीत हैं जिनमें ‘चलो गुइयाँ आज खेलें होरी कन्हैया संग’ ‘होली खेलें राधा संग नन्दलाल’ और आज ‘बिरज में होली रे रसिया’ आदि बहुत लोकप्रिय हैं।
भगवान शंकर की बारात भी निकाली जाती है कई जगह, मान्यता है कि वे सांसारिक जीवन में लौट आये थे।
‘सदासिव खेलत होरी, भूत जमात बटोरी
गिरि कैलास सिखर के उपर बट छाया चहुँ ओरी
पीत बितान तने चहुँ दिसि के, अनुपम साज सजोरी
छवि इंद्रासन सोरी।’ और खेले मसाने में होली दिगम्बर बहुत प्रसिद्ध हैं।

  होली कमोबेश थोड़े-थोड़े अंतर के साथ पूरे देश में मनाई जाती है। तमिलनाडु में यह कामदेव की याद में 'कामन पोडिगई' कहा जाता है, वहाँ चंदन की लकड़ी दान करने की परंपरा है। कुमाऊँ में बैठकी होली, बिहार-उत्तरप्रदेश में फगुआ, महाराष्ट्र में रँगपंचमी, कोंकण क्षेत्र में शिमगो, बंगाल में बसन्तो उत्सव, उड़ीसा में दोल-उत्सव, राजस्थान और हरियाणा में धुलेंडी कहा जाता है।
 पुआ, दही-बड़े, गुझिया इस त्यौहार पर खूब बनाये-खिलाये जाते हैं। कहीं नारियल के लड्डू और कहीं-कहीं भाँग-ठंडाई का भी प्रचलन है।

इस त्यौहार की मूल भावना को भूलकर लोग उच्चशृंखल और अराजक व्यवहार भी करते हैं। त्यौहार की आड़ में ‘बुरा न मानो होली है’ कहकर कुछ भी करने की छूट लोग लेने लगते हैं। यह हमारी गौरवशाली परंपरा की कृत्रिम विकृति है। छेड़छाड़ की घटनाएँ बहुत बढ़ जाती हैं। केमिकल रंगो के प्रयोग से बहुत तरह की एलर्जियों के भी कई मामले सामने आते हैं। (चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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