शशिकांत गुप्ते
सीतारामजी आज मिलते ही कहने लगे इन दिनों कुछ कहावतें चरितार्थ हो रही है। कागजी घोड़े दौड़ाना,कन्नी काटना, मुंह मोड़ना।
मैने कहा मुझे एक कहावत का स्मरण हुआ है।
अंधा सिपाही कानी घोड़ी, विधि ने खूब मिलाई जोड़ी.
दो अयोग्य व्यक्ति मिल कर कोई काम कर रहे हों तो उन का मज़ाक उड़ाने के लिए यह कहा जाता है।
इस कहावत की याद आतें ही सन 1945 में प्रदर्शित फिल्म पहली नजर के गीत की कुछ पंक्तियों का स्मरण होता है।
इस गीत के गीतकार हैं आह सीतापुरी
दिल जलता है तो जलने दे
आंसू न बहा फ़रियाद ना कर
बिस्मिल को बिस्मिल और बना
अब शर्म-ओ-हया के परदे में
*यूं छुप छुप के बेदाद ना कर
(बिस्मिल = ज़ख्मी। बेदाद= अत्याचार)
उपर्युक्त कहावत के अलावा मुझे और भी कुछ कहावतों का स्मरण होता है।
अंधों की दुनियां में आईना न बेंच, अंधें के हाथ बटेर लगना, ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना
सीतारामजी ने कहा मैं तो कुछ कहावतो को चरितार्थ होते देख रहा हूं। आप तो कहावतों का प्रयोग व्यंग्य के रूप में करे रहें हो।
मै ने कहा कहावतें अपने आप में व्यंग्य ही तो है।
मै ने कहा आपने भी तो कागजी घोड़ें दौड़ना वाली कहावत, व्यंग्य के रूप में ही तो कही है। इन दिनों कागजी घौड़े दौड़ाना वाली कहावत को सिर्फ एक शब्द में बोला जाता है।
यह शब्द है जुमला,।
सीतारामजी ने कहा सच में इन दिनों अमृत भी काल के वश हो गया है।
मै ने कहा अमृत का नाम सुनकर मुझे समुद्र मंथन की कथा का स्मरण होता है। आश्चर्य की बात तो यह कि, तात्कालिक समय में भी अमृत असुरों के हाथों लगा था।
तात्कालिक असुरों में इतनी प्रामाणिकता थी,वे असुर होकर भी अमृत कलश लेकर विदेश में भाग कर नहीं गए,अपने देश के भीतर ही भागते रहें हैं।
सीतारामजी ने कहा आप भी कहां की बात कहां तक ले जाते हो।
मै ने कहा इसे ही कहते हैं।
बात निकलती है दूर तक जाती है
सीतारामजी ने मुस्कराते हुए कहा बस करो नहीं तो रायता ज्यादा ही फैलेगा।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





