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*कितना मुक्त हो सकता है भारत का विदेशी व्यापार?*

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अरुण कुमार

इस समय भारत से अपेक्षा की जा रही है कि वह अपने टैरिफ़ कम करे और आयात प्रतिस्पर्धा को स्वीकार करे। यह भी कहा जा रहा है कि इससे भारत को फ़ायदा होगा, चाहे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप कुछ भी चाहें। प्रधानमंत्री ने 10वीं नीति आयोग संचालन परिषद की बैठक में राज्यों से कहा कि वे भारत द्वारा विभिन्न देशों के साथ किए जा रहे मुक्त व्यापार समझौतों (एफ़टीए) का लाभ उठाएँ। साफ़ है कि एफ़टीए अब एक ‘नया सामान्य’ (new normal) बनने जा रहे हैं।

अब तक भारत का एफ़टीए अनुभव अच्छा नहीं रहा है, इसलिए प्रधानमंत्री मोदी के पहले दो कार्यकालों में संरक्षणवाद (protectionism) को बढ़ाया गया।

मुक्त व्यापार के पैरोकारों ने 2025-26 के केंद्रीय बजट में टैरिफ़ कटौती का स्वागत किया है। उनका तर्क है कि जैसे भारत अन्य देशों से बाज़ार तक पहुँच चाहता है, वैसे ही उसे भी अपने बाज़ार को आयात के लिए खोल देना चाहिए। लेकिन क्या यह न्यायोचित है, जब दुनिया के देश अलग-अलग स्तर के विकास पर हैं और ख़ासकर जब अमेरिका खुद संरक्षणवाद की राह पर है?

राष्ट्रपति ट्रंप लगातार दो बार एप्पल के सीईओ टिम कुक से कह चुके हैं कि वे भारत में नहीं, अमेरिका में निर्माण करें। इससे भारत में विदेशी निवेश को भी नुक़सान पहुँचा है, ख़ासतौर पर ऐसे समय में जब भारत में शुद्ध विदेशी निवेश 96% तक गिर चुका है। जबकि भारत को अपनी आर्थिक वृद्धि के लिए अधिक निवेश की सख़्त ज़रूरत है।

बाज़ार खोलने का भारत का अनुभव

1980 के दशक में भारत ने यह सोचकर आयात को बढ़ावा देना शुरू किया था कि कुछ समय बाद निर्यात भी बढ़ेगा—जिसे ‘जे-कर्व’ (J-curve) की अवधारणा कहा गया। उस समय कहा गया कि भारत बहुत कम आयात करता है। नतीजा यह हुआ कि खाड़ी देशों से भारी मात्रा में विदेशी रेमिटेंस आने के बावजूद विदेशी कर्ज़ तेज़ी से बढ़ गया।

1988-89 तक भारत को विदेशी मुद्रा संकट का सामना करना पड़ा, जो खाड़ी संकट से और गहरा गया, और भारत कर्ज़ चुकाने में डिफ़ॉल्ट के कगार पर पहुँच गया। तब भारत को IMF से समायोजन पैकेज और विश्व बैंक से ऋण लेना पड़ा।

भारत की टैरिफ़ दरें विश्व व्यापार संगठन (WTO) के अंतर्गत बहुपक्षीय समझौतों का परिणाम रही हैं, जिनमें देशों के बीच लेन-देन हुआ। भारत ने TRIPS, TRIMS और सेवाओं के क्षेत्र में रियायतें दीं। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप अब इन सबको नकार कर उन उद्योगों और नौकरियों को अमेरिका वापस लाना चाहते हैं जो मज़दूरी के अंतर के कारण चीन आदि देशों में चले गए थे। इसका अर्थ यह है कि अमेरिका को स्थायी रूप से भारी संरक्षणवादी टैरिफ़ लगाने होंगे।

इसके बदले में अन्य देश भी अमेरिका से आयात पर जवाबी टैरिफ़ लगाएंगे। इससे अमेरिका के साथ व्यापार घटेगा, महँगाई बढ़ेगी और माँग में गिरावट आएगी। तब हर देश दूसरे बाज़ारों की तलाश करेगा। ऐसे में यदि भारत सामान्यतः और एकतरफा रूप से टैरिफ़ कम करता है, तो यह अन्य देशों के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा।

भारत का कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और आसियान के साथ एफ़टीए अनुभव निराशाजनक रहा है। आयात के बढ़ने से व्यापार घाटा बढ़ा है। यानी द्विपक्षीय समझौते भारत के विनिर्माण और व्यापार को बढ़ाने में सफल नहीं रहे।

हालांकि यह विषय विवादास्पद है, लेकिन यह संकेत मिलता है कि वर्तमान कीमतों पर भारत की विनिर्माण हिस्सेदारी हाल के वर्षों में घटी है।

इसी कारण भारत को UK, EU और अन्य देशों के साथ एफ़टीए वार्ताओं को जल्द समाप्त करने में कठिनाई आई है। अब UK के साथ एक समझौता हो चुका है, लेकिन यह देखना बाकी है कि यह भारत के लिए कितना लाभकारी होगा। अतः यह तर्क कि भारत टैरिफ़ घटाए और आयात को बढ़ावा दे, हालिया अनुभवों से उचित नहीं ठहरता।

मुक्त व्यापार की सीमाएं

आयात प्रतिस्पर्धा की छूट देने का तर्क ‘मुक्त व्यापार’ की अवधारणा पर आधारित है। यह तर्क उस काल्पनिक ‘पहले श्रेष्ठ’ (first-best) स्थिति में ही सही बैठता है, जहाँ कोई विकृति नहीं होती। लेकिन असल दुनिया में ‘दूसरी श्रेष्ठ’ (second-best) स्थिति है, जहाँ अनेक विकृतियाँ मौजूद हैं।

यदि भारत अपनी अर्थव्यवस्था खोलता है, जबकि दूसरे देश टैरिफ़ और गैर-टैरिफ़ अड़चनों से अपने बाज़ारों की रक्षा करते हैं, तो भारत की अर्थव्यवस्था पर भारी असर पड़ेगा। यही राष्ट्रपति ट्रंप का भी तर्क है कि अमेरिका को अपनी रक्षा के लिए भारी टैरिफ़ लगाने चाहिए।

ऐसी परिस्थिति में केवल बहुपक्षीय समझौते ही समाधान दे सकते हैं—जैसे WTO करता है। दुर्भाग्यवश राष्ट्रपति ट्रंप WTO की उपलब्धियों को भी पीछे धकेल रहे हैं।

अगर अमेरिका को खुद को संरक्षण देने की आवश्यकता महसूस होती है, तो भारत के लिए मुक्त व्यापार में टिके रहना कठिन होगा। मुक्त व्यापार का आधार ‘तुलनात्मक लाभ’ (comparative advantage) है, जो मानता है कि पूँजी और श्रम विभिन्न क्षेत्रों में सहजता से स्थानांतरित हो सकते हैं।

लेकिन भारतीय सच्चाई यह नहीं है। भारत में कृषि और व्यापार क्षेत्रों में ‘छिपी बेरोज़गारी’ (disguised unemployment) है क्योंकि न वैकल्पिक रोज़गार है और न ही पूँजी की उपलब्धता के चलते आत्म-रोज़गार की संभावना।

मुक्त व्यापार विभिन्न क्षेत्रों और सामाजिक वर्गों में विषमता बढ़ाता है—कुछ को लाभ होता है, कुछ को हानि। उदाहरण के लिए भारत, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की माँग के अनुसार कृषि क्षेत्र को नहीं खोल सकता।

भारत के अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास पाँच एकड़ से कम ज़मीन है। उनकी पूँजी, ऋण तक पहुँच और आय—सब कुछ निम्न स्तर पर है। इसके विपरीत एक औसत अमेरिकी किसान भारतीय मानकों पर बड़ा होता है और उसे सालाना औसतन 26 लाख रुपये की सब्सिडी मिलती है।

अगर भारत अपने कृषि क्षेत्र को मुक्त व्यापार के तहत खोलता है, तो यह उन 60% भारतीयों को प्रभावित करेगा, जिनकी रोज़ी-रोटी सीधे या परोक्ष रूप से कृषि से जुड़ी है।

यहाँ तक कि भारतीय उद्योगों को भी अब तक हस्ताक्षरित एफ़टीए से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ है।

तकनीक: प्रतिस्पर्धा की आधारशिला

भारत की तकनीकी कमजोरी को भी मुक्त व्यापार के तर्क में शामिल किया जाना चाहिए। जिनके पास उन्नत तकनीक है, उनके साथ बराबरी पर प्रतिस्पर्धा कर पाना कठिन है।

यहाँ ‘शिशु उद्योग’ (infant industry) यानी नवोदित उद्योग का तर्क आता है—कि किसी उद्योग को विकसित होने के लिए संरक्षण चाहिए, वरना वह समय से पहले मर जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि इस तर्क का सहारा कब तक लिया जा सकता है?

जवाब यह है—जब तक देश के पास तकनीक विकसित करने की क्षमता न हो, और यह उसकी R&D पर निर्भर करता है। भारत इस मामले में पीछे है—GDP का केवल 0.65% R&D पर खर्च करता है, क्योंकि निजी क्षेत्र बहुत कम निवेश करता है। जबकि अन्य गतिशील देश 2% से 4% तक खर्च करते हैं।

तकनीक लगातार बदलती रहती है—आज की उन्नत तकनीक कल की सामान्य और फिर निम्न तकनीक बन जाती है। भारत तकनीकी सीढ़ी पर ऊपर तो चढ़ा है, लेकिन अभी भी मुख्यतः मध्यवर्ती और निम्न तकनीकी स्तर पर ही है। इसलिए उसे अन्य विकासशील देशों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है, जिससे व्यापार की शर्तें प्रतिकूल हो जाती हैं।

आर्थिक चिंतक कालडॉर (Kaldor) ने कहा था कि ‘देर से शुरुआत करने का लाभ’ होता है, क्योंकि तकनीकी रास्ता पहले से स्पष्ट होता है और तेज़ प्रगति संभव होती है। लेकिन यह तभी संभव है जब देश के पास R&D की क्षमता हो। अगर वह नहीं है, तो यह ‘देर से शुरुआत करने का नुक़सान’ बन जाता है। भारत अभी इसी नुक़सान को झेल रहा है।

आधुनिक तकनीकों की लागत बहुत अधिक होती है और अधिकांश विकासशील देशों के पास इतना निवेश करने की क्षमता नहीं होती। भारत कर सकता है, लेकिन इसे अभी वह प्राथमिकता नहीं मिली जिसकी आवश्यकता है।

संक्षेप में, यह सामान्य तर्क कि भारत को टैरिफ़ घटा देने चाहिए और आयात प्रतिस्पर्धा की अनुमति देनी चाहिए—वास्तविक आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों की जटिलता को नहीं समझता।

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर रह चुके हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

 साभार: द लीफ़लेट

Ramswaroop Mantri

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