~ राजेंद्र शुक्ला, मुंबई
केवल तब तक दिखाई देते हैं जब तक उन्होंने बोलना शुरू नहीं किया होता। जब बच्चा बोलने लगता है तो चीजें खोने लगती हैं।
बोलते ही बच्चा समाज का हिस्सा बन जाता है। जब तक बच्चा चुप रहता है, बोलना नहीं सीखा होता, तब तक बच्चा वह सब चीजें देखता है जिन्हें कोई संत देखता है, जिन्हें कोई बुद्ध पुरुष देखता है। ठीक उसी तरह ही देखता है।
बच्चा संत ही होता है। लेकिन वह केवल एक समय तक ही ऐसा रहता है। यदि बच्चा छह महीने तक, नौ महीने तक, एक साल तक नहीं बोलता—तो उस समय तक बच्चा आभा-मंडल देखेगा, अनुभव करेगा गहराई से। जब बच्चा बोलना शुरू कर देता है, तो वह बच्चा फिर बच्चा नहीं रहता।
फिर बच्चा संसार का हिस्सा हो जाता है; भाषा के, बुद्धि के, मन के संसार का हिस्सा हो जाता है। तब धीरे-धीरे वे गुण तिरोहित होने लगते हैं।
छह महीने तक बच्चे को पिछले जन्म की स्मृति रहती है। यह बात सच है, क्योंकि छह महीने तक बच्चा बहुत शांत और मौन रहता है और उसका बोध बहुत गहरा होता है।
फिर रोज-रोज संसार और— और ज्यादा जुड़ता जाता है उसके साथ—हम सिखाते हैं उसे, संस्कारित करते हैं उसे—तो बच्चा समाज का हिस्सा ज्यादा हो जाता है और अस्तित्व से उसका संबंध टूटता जाता है।
बच्चा संसार में खो जाता है। यही है आदम का गिरना, ज्ञान का फल चख लिया जाता है। ज्ञान के वृक्ष का फल तब चखा जाता है जब बच्चा बोलना शुरू करता है।
फिर दोबारा अगर आप उस निर्दोषता को पाना चाहते हो, उसे फिर आविष्कृत करना चाहते हो, तो आपको आंतरिक मौन सीखना होगा—इसीलिए तो मौन के लिए, ध्यान के लिए इतना ज्यादा जोर है। आपको फिर भाषा को भूलना होगा।
भीतर की सब बातचीत, भीतर का सारा शोरगुल बंद करना होगा। आपको फिर निर्दोष, भाषाविहीन होना होगा—भीतर कोई शब्द न रहें, शुद्ध अंतस सत्ता मात्र रह जाए, फिर से आप बच्चे हो जाओ। ध्यान या गहन प्रेम से यह संभव है. वास्तविक यानी प्रेम आधारित स्वस्थ संभोग से भी यह संभव है.
स्मरण रखना, जीसस बार-बार कहते हैं, ‘जो बच्चों की भांति हैं केवल वही प्रवेश करेंगे मेरे प्रभु के राज्य में।’





