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आख़िर कब तक चुप रहेंगे बहुजन?

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(दरभंगा, एससी-एसटी अधिनियम और संसद में राहुल गांधी का बयान)

–          तेजपाल सिंह ‘तेज’

प्रस्तावना: सवाल सिर्फ़ एक घटना का नहीं, व्यवस्था का है

            भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि कानून सबके लिए समान हैं। काग़ज़ों पर यह बात जितनी सुंदर दिखती है, ज़मीनी यथार्थ उतना ही भयावह है। जब हम दरभंगा की उस घटना को देखते हैं, जहाँ एक दलित परिवार पर लगभग 200 गैर-दलित परिवारों द्वारा हमला किया गया और अंततः एक युवक की हत्या कर दी गई, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि सामाजिक सत्ता-संतुलन का प्रश्न है।

            यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि झगड़ा कैसे शुरू हुआ, या आर्थिक लेन-देन का विवाद क्या था। असली प्रश्न यह है कि क्या किसी एक परिवार के विरुद्ध पूरे गाँव का संगठित रूप से खड़ा हो जाना सामान्य अपराध की श्रेणी में आता है, या यह जाति आधारित हिंसा का स्पष्ट उदाहरण है। जब शक्ति-संपन्न समुदाय अपनी संख्या, सामाजिक दबदबे और स्थानीय तंत्र का प्रयोग कर किसी कमजोर जाति के परिवार को “सबक सिखाने” निकल पड़े, तब उस हिंसा को व्यक्तिगत अपराध कहना स्वयं को धोखा देना है।

            ऐसे मामलों में जब पीड़ित दलित परिवार संविधान द्वारा प्रदत्त एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत न्याय की माँग करता है, तो अचानक एक नया विमर्श खड़ा कर दिया जाता है—“क़ानून का दुरुपयोग।” यह विमर्श अपने आप में सत्ता की भाषा है, क्योंकि इसमें हिंसा नहीं, बल्कि हिंसा से बचाव के क़ानून को समस्या बना दिया जाता है। यह प्रस्तावना इसी बिंदु को रेखांकित करती है कि दरभंगा की घटना को समझने के लिए हमें अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना को केंद्र में रखना होगा।

संसद से दरभंगा तक :

            संसद में राहुल गांधी का एक बयान आया— उन्होंने कहा कि भाजपा में चाहे ओबीसी  सांसद हों या मंत्री, किसी के पास वास्तविक शक्ति नहीं है; सब चुप हैं। यह सच है या झूठ—इसका निर्णय मैं आप पर छोड़ता हूँ। लेकिन जब हम दरभंगा की घटना को देखते हैं, तो राहुल गांधी का कथन केवल बयान नहीं, बल्कि एक भयावह सच्चाई जैसा प्रतीत होता है।

एक बयान और उसकी पृष्ठभूमि:

            संसद में राहुल गांधी द्वारा दिया गया यह कथन कि भाजपा में ओबीसी हों, सांसद हों या मंत्री—किसी के पास वास्तविक शक्ति नहीं है और सब चुप हैं—महज़ एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं है। यह बयान हमें ज़मीनी घटनाओं को देखने और समझने के लिए बाध्य करता है। जब हम बिहार के दरभंगा से सामने आई घटना को विस्तार से देखते हैं, तो यह प्रश्न और गहरा हो जाता है कि क्या वाकई सत्ता संरचना में बहुजन समाज केवल संख्या भर है, निर्णयकर्ता नहीं।

दरभंगा की घटना: आर्थिक शोषण से सामाजिक हिंसा तक:

            दरभंगा में पासवान समुदाय का एक व्यक्ति वर्षों तक एक सवर्ण परिवार के यहां मजदूरी करता रहा। पाँच वर्षों तक उसकी मेहनत की कमाई, लगभग ढाई लाख रुपये, उसे नहीं दी गई। जब वह न्याय की उम्मीद लेकर पंचायत पहुँचा, तो वहाँ उसे इंसाफ़ नहीं, बल्कि सामाजिक अपमान झेलना पड़ा। पंचायत में उसकी जाति को उसकी औक़ात बताई गई, क्योंकि वह परिवार उस गाँव में अल्पसंख्यक था—सिर्फ़ दो घर, जबकि शेष लगभग दो सौ परिवार प्रभुत्वशाली जाति के थे। पंचायत के बाद मामला शांत नहीं हुआ। अपमान की यह आग हिंसा में बदली। उस परिवार के घर पर हमला हुआ और अंततः उनके बेटे की हत्या कर दी गई। यह कोई व्यक्तिगत विवाद नहीं था, बल्कि संगठित जातिगत हिंसा का उदाहरण था, जहाँ संख्या, ताकत और सामाजिक प्रभुत्व ने न्याय को कुचल दिया।

कहानी दरभंगा की: एक परिवार बनाम पूरा गाँव

            दरभंगा में पासवान समुदाय का एक व्यक्ति पाँच साल तक एक सवर्ण परिवार के यहाँ मजदूरी करता रहा। ढाई लाख रुपये की मजदूरी  दी गई। मामला पंचायत तक पहुँचा—जहाँ न्याय नहीं, बल्कि अपमान मिला। पासवान परिवार उस गाँव में केवल दो घरों का समूह था, जबकि शेष लगभग 200 परिवार प्रभावशाली जाति के थे। पंचायत में अपमान के बाद उनके घर पर हमला हुआ, और अंततः उनके बेटे की हत्या कर दी गई। यह केवल एक हत्या नहीं थी— यह सामूहिक जातिगत हिंसा  थी।

न्याय की मांग या अपराध का आरोप?

            जब पीड़ित परिवार ने एससी–एसटी अधिनियम के अंतर्गत एफआईआर दर्ज कराई, तो पूरा विमर्श उलट दिया गया। अब सवाल यह नहीं रह गया कि हत्या क्यों हुई, बल्कि यह बना दिया गया कि “एससी–एसटी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है।”
यहाँ तक कि दलित समाज से आने वाले कुछ नेता भी, जिनकी सामाजिक और पारिवारिक निष्ठाएँ सवर्ण समाज से जुड़ी हैं, यह कहने लगे कि यदि 200 लोग किसी एक परिवार पर हमला करें, तो हत्या स्वाभाविक है और उस पर मुक़दमा दर्ज कराना ग़लत। यह सोच दरअसल संविधान, क़ानून और मानवता—तीनों के विरुद्ध है। जब भीड़ द्वारा हत्या को जायज ठहराया जाए और पीड़ित की शिकायत को अपराध कहा जाए, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या क़ानून में नहीं, सत्ता-संरचना में है।

पीड़ित ही अपराधी क्यों?

            जब दलित परिवार ने न्याय माँगा और एफआईआर दर्ज कराई, तो बहस शुरू हो गई— “एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है।” एक दलित नेता, जिनके पारिवारिक संबंध सवर्ण समाज से हैं, खुलेआम कहते हैं कि “जब 200 लोग एक परिवार पर हमला करें, तो मारना जायज है।” यह कैसी न्याय-व्यवस्था है?  जहाँ हत्या जायज है और कानून के तहत शिकायत करना अपराध?

मीडिया की भूमिका और ‘दुरुपयोग’ का नैरेटिव:

            सभी तथाकथित स्वतंत्र और जाति-आधारित मीडिया चैनल एक सुर में बोलने लगे— एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है। ब्राह्मण समाज के पूर्व न्यायाधीश आंदोलन की घोषणा करते हैं। कुछ वकील आरक्षण समाप्त करने की बात करते हैं।

लेकिन सवाल यह है— क्या कभी इन मीडिया संस्थानों ने दलितों पर हो रही रोज़ाना की हत्या, बलात्कार और उत्पीड़न को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया? इस घटना के बाद जिस तरह से मीडिया ने एससी–एसटी अधिनियम के “दुरुपयोग” का शोर मचाया, वह भी विचारणीय है। लगभग सभी तथाकथित स्वतंत्र और जाति-आधारित मीडिया मंचों ने पीड़ित की पीड़ा के बजाय क़ानून को कटघरे में खड़ा किया। पूर्व न्यायाधीश आंदोलन की घोषणा करने लगे, वकील आरक्षण समाप्त करने की बातें करने लगे, लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि यदि यह अधिनियम न होता, तो उस दलित परिवार के पास न्याय पाने का कौन-सा रास्ता बचता।

यूजीसी दिशानिर्देश और दोहरा मापदंड:

            जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने केवल इतना कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायत पर परामर्श और शिकायत की व्यवस्था होगी, तब पूरे सवर्ण समाज में असाधारण एकजुटता देखने को मिली। पत्रकार, बुद्धिजीवी, कलाकार, नेता और टीवी चैनल—सब एक साथ विरोध में खड़े हो गए। यह दिखाता है कि जब मुद्दा प्रभुत्वशाली वर्ग के हितों को छूता है, तो वैचारिक मतभेद भी समाप्त हो जाते हैं। इसके उलट, जब दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के साथ अन्याय होता है, तब यही समाज ‘क़ानून के दुरुपयोग’ की दुहाई देने लगता है। यूजीसी के एक साधारण से दिशानिर्देश— कि जातिगत भेदभाव की शिकायत पर परामर्श और शिकायत की व्यवस्था होगी—पर सवर्ण समाज एकजुट हो गया। टीवी चैनल, पत्रकार, नेता, बुद्धिजीवी—सब सड़कों पर उतर आए। जब “उनका समाज” प्रभावित हुआ, तो सत्ता, विपक्ष और मीडिया—तीनों एक साथ खड़े हो गए।

बहुजन नेतृत्व की चुप्पी:

            सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बहुजन समाज के निर्वाचित प्रतिनिधि—सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री—इन मुद्दों पर लगभग मौन हैं। सरकारी नौकरियाँ समाप्त हो रही हैं, शिक्षा महँगी होती जा रही है, आरक्षण को बदनाम किया जा रहा है, लेकिन प्रतिक्रिया न के बराबर है। यह चुप्पी डर की है या सत्ता-लालच की—यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता।

लेकिन बहुजन समाज क्यों चुप है?

            दलित, पिछड़ा, आदिवासी, किसान, अल्पसंख्यक—सबके अधिकार एक-एक कर छीने जा रहे हैं। सरकारी नौकरियाँ खत्म होती जा रही हैं। शिक्षा महंगी होती जा रही है। आरक्षण को बदनाम किया जा रहा है। लेकिन बहुजन समाज के नेता—
सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री— या तो चुप हैं, या सत्ता के लालच में बंधे हैं।

चिराग पासवान और बहुजन नेतृत्व का संकट:

            यह चेतावनी केवल किसी एक नेता के लिए नहीं है, बल्कि पूरे बहुजन नेतृत्व के लिए है। सत्ता बहुजन चेहरे को तब तक स्वीकार करती है, जब तक उसका समाज संगठित रूप से उसके पीछे खड़ा रहता है। जैसे ही समाज छूटता है, नेता भी अप्रासंगिक हो जाता है। यह इतिहास बार-बार साबित कर चुका है।चिराग पासवान को चेतावनी दी जानी चाहिए—जिस दिन पासवान समाज ने साथ छोड़ा, उस दिन न भाजपा साथ रहेगी, न कांग्रेस। सत्ता बहुजन नेता को तभी तक स्वीकार करती है जब तक उसका समाज उसके पीछे खड़ा है।

इतिहास, संघर्ष और वर्तमान की तुलना:

            मंडल आयोग के दौर में सड़क से संसद तक संघर्ष हुआ। उस समय नेतृत्व ने जोखिम उठाया, सत्ता से टकराया। आज वही समाज अपेक्षाकृत शिक्षित और संसाधन युक्त होने के बावजूद चुप है। यह चुप्पी केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक आत्मसमर्पण का संकेत है।

इतिहास की सीख और वर्तमान की चुप्पी:

            एससी-एसटी एक्ट कांग्रेस शासन में बना। मंडल आयोग पर लड़ाइयाँ लड़ी गईं। लालू यादव, शरद यादव, रामविलास पासवान जैसे नेताओं ने सड़क से संसद तक संघर्ष किया। आज वही समाज डर, भ्रम और सोशल मीडिया के शोर में उलझा हुआ है।

आने वाला ख़तरा: सबकी बारी आएगी:

            आज निशाना दलित हैं। कल पिछड़े होंगे। परसों किसान और आदिवासी। बुलडोज़र, एनकाउंटर, निष्कासन—यह किसी एक जाति की कहानी नहीं है। यह 4000 जातियों के भविष्य का सवाल है।

चुप्पी का मूल्य

            आज निशाने पर दलित हैं, कल पिछड़े होंगे, और उसके बाद किसान, आदिवासी तथा अन्य वंचित समूह। यदि अब भी बहुजन समाज ने संगठित होकर आवाज़ नहीं उठाई, तो संविधान केवल औपचारिक दस्तावेज़ बनकर रह जाएगा। राहुल गांधी की बात से सहमत होना अनिवार्य नहीं है, लेकिन जिस सच्चाई की ओर वह इशारा कर रहे हैं, उसे नज़रअंदाज़ करना ख़ुद अपने भविष्य से मुँह मोड़ना होगा। अब प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सी पार्टी सही है, प्रश्न यह है कि बहुजन समाज कब बोलेगा।

अब चुप्पी अपराध है:

            राहुल गांधी से सहमत होना ज़रूरी नहीं, लेकिन उनकी बात को नजरअंदाज करना आत्मघाती है। यदि बहुजन समाज अब भी नहीं बोला— तो संविधान केवल किताबों में रह जाएगा और अधिकार केवल इतिहास बन जाएँगे। अब समय है—सोचने का, सीखने का, और बोलने का। जागो, सतर्क रहो, संगठित रहो। यही आखिरी रास्ता है। “एक दलित परिवार पर 200 गैर-दलित परिवारों द्वारा किया गया हमला कितना जायज है, और ऐसे मामलों में एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को गैर जरूरी बताना कितना तर्कसंगत है?”—उसी को वैचारिक धुरी बनाया गया है।

उपसंहार: हिंसा को जायज ठहराने की मानसिकता और क़ानून की अनिवार्यता

            एक दलित परिवार पर 200 गैर-दलित परिवारों द्वारा किया गया हमला किसी भी नैतिक, संवैधानिक या कानूनी कसौटी पर जायज नहीं ठहराया जा सकता। यदि किसी समाज में यह तर्क स्वीकार कर लिया जाए कि संख्या के बल पर न्याय तय होगा, तो फिर संविधान, अदालत और क़ानून—सब निरर्थक हो जाते हैं। यह तर्क दरअसल लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदल देने का रास्ता खोलता है।

            एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को ऐसे मामलों में “गैरज़रूरी” बताना न केवल तर्कहीन है, बल्कि ख़तरनाक भी है। यह अधिनियम किसी को विशेषाधिकार देने के लिए नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक असमानता को संतुलित करने के लिए बनाया गया था, जिसमें दलित समाज सदियों से बिना संरक्षण के हिंसा झेलता रहा है। जब सामान्य कानूनी प्रावधान सामाजिक दबाव, पुलिस की निष्क्रियता और स्थानीय सत्ता के आगे बेबस हो जाते हैं, तब विशेष क़ानून ही पीड़ित को बोलने का साहस देता है। जो लोग यह कहते हैं कि “200 लोगों ने हमला किया, तो एफआईआर क्यों?” वे असल में यह मान चुके होते हैं कि दलित का जीवन सामूहिक हिंसा के आगे कोई मूल्य नहीं रखता। यह सोच क़ानून के दुरुपयोग की नहीं, बल्कि कानून की आवश्यकता की सबसे बड़ी गवाही है।

            दरभंगा की घटना हमें यह समझाती है कि समस्या केवल किसी एक जिले, एक राज्य या एक पार्टी की नहीं है। समस्या उस मानसिकता की है जो जातिगत हिंसा को सामाजिक प्रतिक्रिया और क़ानूनी कार्रवाई को अपराध मानती है। जब तक इस सोच को चुनौती नहीं दी जाएगी, तब तक दलित अत्याचार निवारण अधिनियम को कमजोर करने की मांग दरअसल दलितों को और अधिक असुरक्षित बनाने की माँग ही रहेगी। अंततः प्रश्न यह नहीं है कि यह अधिनियम रहना चाहिए या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या भारतीय समाज अब भी इतना असमान है कि बिना इस क़ानून के दलित नागरिक न्याय की कल्पना भी नहीं कर सकते। दरभंगा की घटना का उत्तर स्पष्ट है—हाँ, यह क़ानून आज भी उतना ही आवश्यक है, जितना अपने बनाए जाने के समय था। (https://youtu.be/6bIQZSRdZFE?si=uVXp3TrLIpY8Bfml)

Ramswaroop Mantri

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