अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

विनोद हास्य पूर्ण नहीं हास्यास्पद

Share

शशिकांत गुप्ते

आज सीतारामजी पूर्ण रूप से मजाक के मुड़ है। मिलते ही कहने लगे आज सिर्फ हास्य विनोद की बातें ही करेंगे।
पुरानी और नई हास्य प्रधान फिल्मों की चर्चा करेंगे।
मैने पूछा आज ऐसा क्या हो गया? आप एकदम बदल गए?
सीतारामजी ने कहा हमेशा गम्भीर विषयों पर चर्चा करने से मस्तिष्क पर जोर पड़ता है।
मैने कहा इनदिनों तो साधारण चर्चा में भी गम्भीर विषय नदारद ही है। और जो गम्भीर विषय से जुड़े मुद्दें हैं, उन पर कोई गम्भीरता से विचार ही नहीं कर रहा है।
सीतारामजी ने कहा यही व्यंग्यकारों में कमी है, हरएक बात पर व्यंग्य कर देतें हैं।
सीतारामजी ने कहा आज हमें सिर्फ हास्य विनोद की बातें ही करनी हैं।
यह कहते हुए सीतारामजी, राधेश्यामजी के बारे में बता लग गए। राधेश्याम मेरा बचपन का मित्र है,राधेश्याम की एक आदत थी,बात बात में नाम बदलने की धमकी देता था।
किसी भी विषय की बात चल रही हो राधेश्याम कहता था,यदि मेरी बात गलत निकल जाय तो मेरा नाम बदल देना।
मैने पूछा इसका मतलब राधेश्यामजी को हरएक विषय का
अच्छा खासा ज्ञान होगा?
सीतारामजी ने कहा नहीं ज्ञानवान कुछ नहीं था, सिर्फ मुँहजोरी करने की आदत थी। एक बार कोई मिल गया सेर का सव्वा सेर सारी हेकड़ी मिट गई।
यह कहते हुए सीतारामजी कहने लगे विषयांतर हो रहा है।
पचास और साठ के दशक की फिल्मों का स्मरण करते हुए कहने लगे,इन दशकों में बनने वाली फिल्मों में अभिनेता, निर्माता से बाकयदा पारिश्रमिक तय कर अग्रिम (Advance) रकम प्राप्त कर लेने के बाद अभिनय करता था।
अभिनेता पढालिखा होकर भी बेरोजगार का अभिनय करता था।
निर्माता दो चार जगह No Vacancy का बोर्ड लटका देता था। अथक प्रयास का अभिनय करने के बाद अभिनेता को नोकरी मिल जाती थी।
इस दृश्य में एक खास बात देखने को मिलती थी। अभिनेता नोकरी करने का अभिनय करता है, और पहली पगार मिलते ही अभिनेता सम्पूर्ण परिवार के सदस्यों के लिए उपहार लेकर आता है।
मैने कहा ऐसे दृश्य पूंजीवाद को बढ़ावा देने वाले दृश्य होतें हैं।
सीतारामजी ने क्रोधित होते हुए कहा कुछ समय के लिए अपने अंदर के व्यंग्यकार के स्वयं से अलग रखों।
मैने कहा एक बात जरूर चिंतन मनन करने जैसी है। फिल्मी अभिनेता पारिश्रमिक प्राप्त करने के पश्यात बेरोजगार का अभिनय करता है।
व्यवहारिक तौर पर बेरोजगरों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो रही है।
अभिनेता पढालिखा होकर नोकरी करने का सिर्फ अभिनय करता है। वास्तविक जिंदगी में स्थिति भयावह है।
यह सुनने के बाद सीतारामजी पूर्णतया अपनी व्यंग्यकार की भूमिका में आ गए।
सीतारामजी ने सन 1962 में प्रदर्शित फ़िल्म अनपढ़ का स्मरण किया। इस फ़िल्म के इस गीत की निम्न पंक्तिया सुनाने लग गए।
राजा महेंदी अली खान ने यह गीत लिखा है।

सिकंदर ने पोरुस से
की थी लड़ाई जो की थी लड़ाई
तो में क्या करूँ
कौरव ने पांडव से
की हाथापाई जो की हाथापाई
तो में क्या करूँ
ओ Put पुट हैं तो But बट हैं
ज़माने का दस्तूर
कितना उलट हैं
ये ज़ाहील घसीता
मगर खाए हलवा
हर रोज़ लुटे मिठाई का जलवा
ये बी ए हैं लेकिन चलाये ये ठेला
ये एम ए हैं लेकिन ये बेचे करेला
अगर तीन दिन से ये भूखा हैं भाई
तो में क्या करूँ
सीतारामजी गीत की पंक्तियां सनाते हुए एकदम गम्भीर हो गए,और कहने लगे, साठ वर्ष पूर्व बी ए पास ठेला चलाता था। और एम ए पास करेला बेचता था।
करेला की तासीर जैसा ही सत्य भी कड़वा होता है।
आज तो यह स्थिति है कि, आज का युवक अत्याधुनिक तकनीक के क्षेत्र में भी इंजीनियर की पढ़ाई पास करले,उसे गटर की गैस से ईंधन प्राप्त कर पकौड़े तलने का रोजगार करने की योग्य सलाह दी जाती है।
मैने कहा तो मैं क्या करूँ
सुनकर सीतारामजी को जोर से हँसी आ गई।
मैने सीतारामजी से पूछा ये Startup क्या है।
सीतारामजी ने कहा विस्तार से तो नहीं जानता हूँ। लेकिन स्टार्ट का मतलब चालू होता है। इतना मालूम है। मैन दोहराया चालू।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें