डॉ. नीलम ज्योति
मेरा नाम रामनिवास है। उम्र 78 वर्ष हो चुकी है। सिर के सारे बाल सफेद हो चुके हैं, शरीर झुक गया है, आंखों पर चश्मा है और अब तो चलने में भी लाठी का सहारा लेना पड़ता है। एक ज़माना था, जब मैं गाँव का सबसे तेज़ दौड़ने वाला युवक था, और आज… एक कदम भी बढ़ाने में साँस फूल जाती है।
पर क्या सिर्फ शारीरिक कमज़ोरी ही बुजुर्ग होना है? नहीं। बुजुर्ग होना एक लंबा इतिहास जी लेने का दूसरा नाम है। मैं वो पुस्तक हूँ जिसके पन्नों में समय के कई युग सिमटे हुए हैं।
*मेरा बचपन – संघर्ष और सीधा-सादा जीवन*
मेरा जन्म 1947 के वर्ष में हुआ था – उसी साल जब देश आज़ाद हुआ। मेरे पिता किसान थे। घर मिट्टी का था, पर रिश्तों की दीवारें पक्की थीं। माँ सुबह सूरज के साथ उठतीं और शाम को ढलते ही चूल्हा सुलगा देतीं।
हमारे पास पैसे नहीं थे, पर हर चीज़ में संतोष था। स्कूल जाने के लिए चार किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। कपड़े सीमित थे, किताबें भी एक ही मिलती थी – वो भी दूसरे के बाद में। लेकिन पढ़ाई की ललक थी, और गुरुजन ऐसे थे जो प्यार से पढ़ाते, डाँट से सुधारते।
*जवानी – मेहनत, आत्मनिर्भरता और परिवार*
स्कूल के बाद मैंने शिक्षक बनने का सपना देखा और पूरा भी किया। प्राथमिक शिक्षक बना – वहीं गाँव के स्कूल में। 3000 रुपये तनख्वाह मिलती थी। तब लगा जैसे मैं राजा हूँ! माँ-पिता को मेरी नौकरी पर गर्व था। शादी हुई। धीरे-धीरे परिवार बढ़ा – तीन बच्चे हुए।
मेरी दुनिया सिमटी थी – स्कूल, खेत, परिवार।
मैंने सब बच्चों को पढ़ाया, ईमानदारी से नौकरी की, रिश्वत का नाम भी न लिया। मेरी पत्नी मेरे साथ हर सुख-दुख में रही। जब भी तनख्वाह मिलती, हम पहले घर के बुज़ुर्गों के लिए कपड़े लेते, फिर बच्चों के लिए किताबें और अंत में अपने लिए कुछ बचा तो अच्छा, नहीं तो कोई ग़म नहीं।
मैंने जीवन को साधारणता में जिया, पर हर दिन को जिम्मेदारी और आत्म-संतोष के साथ जिया।
*जीवन का उत्तरार्ध – बच्चों की उन्नति, मेरा अकेलापन*
समय बीता। बच्चे बड़े हुए। सब पढ़े-लिखे। बेटा इंजीनियर बनकर शहर चला गया, बेटी की शादी हो गई। एक बेटा विदेश चला गया। मैं और पत्नी गाँव में रह गए। शुरुआत में तो बच्चे पत्र लिखते, फ़ोन करते। धीरे-धीरे सब कुछ कम होता गया।
पत्नी की तबीयत बिगड़ी। अस्पताल-दवा के चक्कर। एक दिन वो चुपचाप चली गई – मुझे एकदम अकेला कर गई।
अब घर बड़ा लगता है, पर मन सूना।
*आज मेरी स्थिति*
अब मैं घर के बाहर पुराने नीम के पेड़ के नीचे बैठा रहता हूँ। सुबह की चाय खुद बनाता हूँ, दोपहर में कोई न कोई पड़ोसी रोटी दे देता है। कुछ समय रेडियो सुनता हूँ, कभी पुरानी डायरी पढ़ता हूँ। बेटा साल में एक बार आता है – त्योहारों में। बहू व्यस्त रहती है, पोते अब हिंदी में ठीक से बात भी नहीं करते।
कभी वे मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, कभी कान में ईयरफोन लगाए होते हैं। मैं कुछ कहना चाहता हूँ, पर समझता हूँ – उनका युग अलग है।
*समाज की दृष्टि*
गाँव के लोग आज भी मुझे “गुरुजी” कहकर बुलाते हैं। मेरे पढ़ाए हुए कई बच्चे अब अधिकारी हैं, कहीं-कहीं मेरे पैर छूने आते हैं। ये सम्मान मुझे जीवित रखता है।
पर सच कहूँ तो आज बुज़ुर्गों को समाज एक ‘बोझ’ की तरह देखने लगा है। उन्हें लगता है – ‘अब इनका क्या उपयोग?’
मुझे पेंशन मिलती है – पर उससे ज्यादा ज़रूरत किसी को अपनापन देने की है।
*मेरी आत्मा की आवाज़*
हर रात जब मैं अकेला लेटता हूँ, पुराने दिन आँखों के आगे चलचित्र की तरह दौड़ते हैं – बच्चों की किलकारियाँ, पत्नी की हँसी, माँ की गोदी, पिता का स्नेह।
मेरे पास कोई नहीं है – फिर भी सब हैं। यादों में।
मैं सोचता हूँ – क्या जीवन की सार्थकता केवल कमाने, खर्च करने और मर जाने तक है?
नहीं। जीवन का मूल्य रिश्तों में है, आत्मीयता से है.
मैं आज जो भी हूँ, उसका आधार मेरा संघर्ष, सच्चाई और संतोष रहा है। मैं चाहता हूँ कि नई पीढ़ी बुज़ुर्गों को सिर्फ ज़रूरत या दया से न देखे, बल्कि उन्हें आदर और संवाद से समझे।
हम बुज़ुर्ग टूटे हुए नहीं हैं, हम अनुभवी हैं।
हम बीते हुए नहीं हैं, हम दिशा देने वाले हैं।
लोग मुझे बूढ़ा कहते हैं, पर मेरी आत्मा अब भी जवान है –
जब कोई बच्चा ‘गुरुजी’ कहकर मुस्कराता है,
जब कोई पंछी मेरी खिड़की पर आकर चहचहाता है,
जब कोई पुरानी किताब से धूल झटकता है,
तो लगता है – मैं अब भी ज़िंदा हूँ।





