
-तेजपाल सिंह ‘तेज’
जब भारत के संविधान निर्माताओं ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को लोकतंत्र की
नींव बनाया, तो उनकी कल्पना एक ऐसे राष्ट्र की थी, जहाँ हर नागरिक को समान राजनैतिक
अधिकार प्राप्त हो, चाहे उसकी जाति, धर्म, वर्ग या लिंग कुछ भी हो। परंतु आज, 21वीं सदी के
भारत में, विशेषकर बिहार जैसे राज्य में, एक नई और खतरनाक परिघटना उभर रही है —
‘वोट बंदी’। यह नोटबंदी की तरह एक अचानक घोषित सरकारी निर्णय नहीं है, बल्कि एक
धीमी, सुनियोजित और लक्षित प्रक्रिया है, जिसके ज़रिए गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों को
वोट देने के उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित किया जा रहा है।
‘वोट बंदी’ क्या है?
‘वोट बंदी’ का अर्थ है—राजनीतिक और प्रशासनिक साधनों के माध्यम से कुछ वर्गों को
मतदान प्रक्रिया से रोकना या उन्हें उसमें भाग लेने से डराना। यह एक नई तरह की चुनावी
असमानता है, जो ‘वोट का अधिकार’ तो दिखावटी रूप से देती है, लेकिन उसे जमीन पर
निष्क्रिय बना देती है। इसका सबसे प्रमुख और खतरनाक रूप देखा गया है बिहार के कुछ जिलों
में, जहाँ खासकर चुनावों के दिन निम्नलिखित पैटर्न उभरते हैं:
दलित-मुस्लिम बहुल इलाकों में मशीनें बार-बार खराब होना
मतदाता सूची से नाम ग़ायब मिलना
बूथ पर पहुँचने से पहले ही डराया जाना
स्थानीय पुलिस की भूमिका ‘दर्शक’ या ‘शामिल’ जैसी
‘शांतिपूर्ण मतदान’ के नाम पर सख्त धारा 144, लेकिन केवल गरीब इलाकों में
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और बदली हुई रणनीति:
1980 और 1990 के दशक में जब बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति उफान पर
थी, तब दलित, पिछड़े और मुसलमानों ने अपने वोट की ताकत से सत्ता के चरित्र को ही बदल
दिया। लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और बाद में मायावती जैसे नेताओं का उभार
इसी राजनीतिक मताधिकार की सफलता की कहानी थी। लेकिन अब वही वर्ग यदि
लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाए, तो सत्ता का चरित्र दोबारा ‘सवर्ण और पूंजी
केंद्रित’ बनाया जा सकता है। यह ‘वोट बंदी’ सामाजिक न्याय के खिलाफ एक प्रतिक्रांति है।
‘वोट बंदी’ के राजनीतिक असर:
- सामाजिक न्याय की राजनीति का कमजोर होना: जब दलित और अल्पसंख्यक वर्ग मतदान
से वंचित कर दिए जाते हैं, तो स्वाभाविक है कि उनके हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली
पार्टियाँ कमजोर होंगी। इससे सामाजिक न्याय के एजेंडे को पीछे धकेलने का रास्ता साफ़ होता
है। - बहुसंख्यकवादी राजनीति को बल मिलना: ‘वोट बंदी’ के ज़रिए जिनका वोट काटा जा रहा
है, वे वही हैं जो बीजेपी या संघ के एजेंडे से असहमत हैं। जब उनका ही वोट घटता है, तो
ध्रुवीकरण की राजनीति को फ़ायदा होता है। बहुसंख्यकवाद बिना प्रतिरोध के सत्ता पा लेता है। - ‘सत्ता के विरुद्ध जनादेश’ को रोकने की साजिश: जब जनता में असंतोष होता है, तब चुनाव
ही उसका एकमात्र वैधानिक हथियार होता है। लेकिन अगर मतदान का अधिकार ही निष्क्रिय
बना दिया जाए, तो सत्ता के विरुद्ध असंतोष कभी परिणाम तक नहीं पहुँच पाता। - लोकतंत्र का खोखलापन और जनता का मोहभंग: बार-बार यह अनुभव होना कि “हमारे
वोट से कुछ नहीं होता” या “हमारे इलाके में तो मशीन ही खराब रहती है” — यह जनता में
लोकतंत्र से निराशा और अलगाव पैदा करता है, जो भविष्य में आलोचना या क्रांति नहीं, बल्कि
चुप्पी और ग़ुलामी को जन्म देता है।
चुनाव आयोग की भूमिका और उसकी सीमाएँ: भारतीय चुनाव आयोग संवैधानिक रूप से
स्वतंत्र संस्था है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसके निर्णय और चुप्पी संदेह के घेरे में रहे हैं। अगर
वह बूथों पर बार-बार मशीन खराब होने की शिकायत को गंभीरता से नहीं लेता, या
शिकायतकर्ता ही दोषी बना दिए जाते हैं, तो यह साफ़ संकेत है कि संविधान के प्रहरी सो चुके
हैं।
डॉ. अंबेडकर की चेतावनी: आज की स्थिति पर सटीक : “राजनीतिक समानता बिना सामाजिक
और आर्थिक समानता के लंबे समय तक टिक नहीं सकती। यह केवल एक छलावा बनकर रह
जाएगी।” डॉ. अंबेडकर ने जिस सावधान भविष्य की बात की थी, वह आज की ‘वोट बंदी’ की
वास्तविकता में बदल चुका है। यहाँ राजनीतिक समानता काग़ज़ों पर है, ज़मीन पर नहीं।
क्या यह ‘चुनावी जातिवाद’ का नया रूप नहीं? जी हाँ — जब किसी खास जाति, वर्ग या धर्म के
लोगों को निशाना बनाकर उनके वोट काटे जाते हैं या उन्हें डराया जाता है, तो यह चुनावी
जातिवाद का डिजिटल संस्करण है। यह स्पष्ट रूप से लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ है।
क्या यह लोकतंत्र की हत्या नहीं? ‘वोट बंदी’ एक सीधी, लेकिन सूक्ष्म हत्या है — लोकतंत्र की,
संविधान की, सामाजिक न्याय की, और जनता के विश्वास की। यह न केवल मताधिकार की
हत्या है, बल्कि उससे भी अधिक, यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित करने की एक परतदार
साज़िश है। आज बिहार इसका सबसे खुला उदाहरण है, कल यह देशव्यापी हो सकता है।
आखिर किया क्या जाए? लोकतंत्र की निगरानी केवल चुनाव आयोग का नहीं, जनता और
सिविल सोसाइटी का भी दायित्व है —
मतदाता सूची में गड़बड़ी हो, तो उसे सबूत सहित उजागर करना होगा।
बूथ ऑडिट और ईवीएम की पारदर्शिता की माँग उठानी होगी।
मीडिया को केवल बाइट नहीं, बूथ की ज़मीनी रिपोर्टिंग करनी होगी।
और सबसे बढ़कर—संविधान को जीवित रखने के लिए आम जनता को सचेत, साहसी
और संगठित होना होगा।
राजनीतिक दलों की भूमिका क्या रही है? : यह बहुत ही महत्वपूर्ण और अनिवार्य प्रश्न है —
‘वोट बंदी’ जैसी लोकतंत्र विरोधी प्रवृत्ति के खिलाफ राजनीतिक दलों की भूमिका क्या रही है?
क्या वे सजग प्रहरी बने या चुपचाप तमाशबीन? क्या उन्होंने जनता के मताधिकार की रक्षा की
या अपने स्वार्थ के लिए चुप्पी साध ली? आइए इस प्रश्न को ऐतिहासिक, वैचारिक और
व्यवहारिक तीनों स्तरों पर समझते हैं।
- सत्ताधारी दल (मुख्यतः बीजेपी): ‘वोट बंदी’ का सबसे बड़ा लाभार्थी :
● प्रत्यक्ष भूमिका: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने ‘वोट बंदी’ के आरोपों का खंडन नहीं किया
है, बल्कि बहुत-से मामलों में स्थानीय प्रशासन और पुलिस के ज़रिए अप्रत्यक्ष रूप से इसका
लाभ उठाया है। दलित-मुस्लिम बहुल बूथों पर मशीन खराब होने की घटनाएं अक्सर उन्हीं
क्षेत्रों में ज़्यादा हुईं जहाँ भाजपा को हार का डर था। ‘केंद्रीय बलों’ की तैनाती भी असमान रही
— अभिजात्य इलाकों में पूरी सुरक्षा और गरीब बस्तियों में ‘बूथ छोड़ दो’ का डर।
प्रचार के स्तर पर दुष्प्रचार: भाजपा आईटी सेल और कुछ मीडिया माध्यमों ने बार-बार
यह धारणा बनाई कि दलित या अल्पसंख्यक का वोट मायने नहीं रखता, ताकि वे खुद ही
हतोत्साहित हो जाएं।
● चुप्पी या उल्टा पलटवार: जब ‘वोट बंदी’ पर सवाल उठे, भाजपा ने इसे ‘झूठा विमर्श’ कहकर
खारिज किया। उन्होंने चुनाव आयोग को ढाल बनाकर कहा — “अगर गड़बड़ी होती, तो आयोग
एक्शन लेता।” - विपक्षी दल: आधा विरोध, आधा अवसरवाद
● तेजस्वी यादव और राजद: राजद ने बिहार में कई बार ईवीएम गड़बड़ी, बूथ कैप्चरिंग और
नाम काटने के खिलाफ आवाज़ उठाई है, लेकिन वह आवाज़ चुनावी वक्त से आगे नहीं गई। वह
एक संगठित आंदोलन नहीं बना सके, जबकि यह मुद्दा उनकी सामाजिक न्याय की राजनीति की
जड़ से जुड़ा था।
उदाहरण: 2020 बिहार चुनाव में कई मुस्लिम बहुल इलाकों में शिकायतें दर्ज हुईं,
लेकिन राजद ने उन्हें सतत तरीके से संसद या न्यायपालिका तक नहीं पहुँचाया।
● कांग्रेस: कांग्रेस ने इसे मुद्दा तो बनाया, लेकिन कमज़ोर और बिखरे हुए अंदाज़ में। उसका
नेतृत्व ही ‘राजनीतिक आक्रमण’ की जगह ‘प्रेस बयान’ तक सीमित रहा।
● वामपंथी दल: सीपीआई (माले) जैसी पार्टियों ने ज़मीन पर इस मुद्दे को उठाया, खासकर
भोजपुर, आरा, सिवान जैसे क्षेत्रों में, पर उनकी आवाज़ मुख्यधारा मीडिया में दबा दी गई। - क्षेत्रीय दलों की स्थिति: ‘सहमति में चुप्पी’
नीतीश कुमार और जदयू: प्रशासन पर उनका नियंत्रण होने के बावजूद, कभी ईवीएम गड़बड़ी
या बूथ बाधा के विरुद्ध उन्होंने खुलकर विरोध नहीं किया।
एल जे पी (रामविलास पासवान, बाद में चिराग पासवान): उनके मतदाता वर्ग पर चोट हो रही
थी, फिर भी उन्होंने इस मुद्दे को चुनावी लाभ के लिए भुनाया नहीं, शायद इसलिए कि वे
भाजपा के करीबी थे।
यह स्पष्ट करता है कि बहुत से दलों ने ‘वोट बंदी’ को केवल एक चुनावी ‘सहूलियत’ के तौर पर
देखा — जब ज़रूरत हो, उठाओ; जब सत्ता में हो, चुप रहो। - चुनाव आयोग और दलों की मिलीभगत? : जब राजनीतिक दल गड़बड़ी की शिकायतें करें
और चुनाव आयोग कार्रवाई न करे, और फिर वही दल सत्ता में बने रहें तो यह संविधान और
आयोग की स्वायत्तता पर गंभीर प्रश्न उठाता है। राजनीतिक दलों ने आयोग की जवाबदेही तय
करने की कभी ठोस कोशिश नहीं की। संसद में चुनाव सुधार के नाम पर बड़ी बहसें नहीं हुईं।
ईवीएम पारदर्शिता, मतदाता सूची की शुद्धता, बूथ सुरक्षा आदि पर सभी दलों की भूमिका
असंलग्न या मौकापरस्त रही। - वैकल्पिक राजनीति और सिविल हस्तक्षेप की विफलता: स्वराज इंडिया (योगेंद्र यादव),
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र नेता, दलित और मुस्लिम संगठनों ने ज़रूर समय-
समय पर इस पर आवाज़ उठाई, लेकिन उनके पास संसदीय शक्ति नहीं थी। AAP जैसे दलों ने
दिल्ली में वोटिंग को लेकर सवाल उठाए, लेकिन बिहार जैसे राज्य में वे अनुपस्थित रहे।
राजनीतिक दलों की भूमिका — ‘समझौता बनाम संघर्ष’
पक्ष भूमिका
सत्ताधारी दल (बीजेपी) ‘वोट बंदी’ से प्रत्यक्ष लाभ, इसलिए चुप्पी या संलिप्तता
विपक्षी दल मामले उठाए लेकिन उसे आंदोलन या नीति का रूप नहीं दिया
क्षेत्रीय दल प्रशासनिक हिस्सेदारी के बावजूद चुप्पी या अवसरवाद
वामपंथी व स्वराज ताकतें मुद्दे को उठाया, पर राजनीतिक असर सीमित रहा
आखिर क्या किया जाना चाहिए? विपक्षी दलों को मतदाता अधिकार के सवाल को नीति और
आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा बनाना होगा। जनता को राजनीतिक दलों से जवाबदेही माँगनी होगी
— “क्या आप वोट की रक्षा करेंगे, या केवल टिकट बँटवारे में व्यस्त रहेंगे?” सिविल सोसाइटी,
पत्रकार और लेखक — उन्हें इस पूरे परिदृश्य को उजागर करते रहना होगा, ताकि लोकतंत्र पर
पड़ी यह चुप्पी की चादर हट सके।
चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों की ‘मौन सहमति’? राजनीतिक दलों का सबसे बड़ा दोष
यह रहा कि उन्होंने चुनाव आयोग की निष्क्रियता को चुनाव के बाद भूल जाने योग्य मुद्दा बना
दिया। किसी दल ने यह नहीं माँगा कि ईवीएम खराब होने के मामलों की स्वतंत्र जांच हो। ‘बूथ
ऑडिट’ की माँग केवल दिखावे की बनकर रह गई। और चुनाव सुधारों पर संसद में गंभीर बहसें
लगभग नदारद रहीं। यह चुप्पी और लापरवाही दरअसल ‘वोट बंदी’ को सामूहिक सहमति का
स्वरूप देती है।
व्यापक रूप से देखा जाए तो लोकतंत्र की रक्षा के सवाल पर दलों की परीक्षा असफल
रही। ‘वोट बंदी’ के विरुद्ध संघर्ष कोई सामान्य चुनावी मुद्दा नहीं है, यह भारत के संवैधानिक
ढाँचे की बुनियाद की रक्षा का सवाल है। परंतु अधिकांश राजनीतिक दल इस पर या तो चुप
रहे, या इसे अपने-अपने राजनीतिक अवसरों के हिसाब से प्रयोग करते रहे।
आगे का रास्ता: दलों की जवाबदेही और जन-जागरण : अगर राजनीतिक दल अपने-अपने
रणनीतिक स्वार्थों में ही उलझे रहेंगे, तो लोकतंत्र की रक्षा केवल जनता और सिविल सोसाइटी
को करनी होगी। जनता को चाहिए कि वह अपने नेता से यह न पूछे कि “टिकट किसे मिलेगा?”,
बल्कि यह पूछे — “क्या आप हमारे वोट की सुरक्षा की गारंटी देंगे?”
क्या चुनाव आयोग की स्वतंत्रता अधिक हो सकती है?
बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है: क्या चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को वर्धित (बढ़ाया) जा सकता है?
उत्तर है: हाँ — बिल्कुल किया जा सकता है — लेकिन इसके लिए केवल संवैधानिक इरादे
नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, विधायी सुधार और नागरिक दबाव — तीनों आवश्यक हैं।
आइए इस पर चरणबद्ध ढंग से विचार करें —
- चुनाव आयोग की वर्तमान स्थिति: ‘स्वतंत्र’ लेकिन ‘विलंबित न्यायाधिकार’(“Delayed
Jurisdiction” :
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष निकाय
माना गया है, जो लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभाओं और राष्ट्रपति/उपराष्ट्रपति के चुनावों का
संचालन करता है। लेकिन व्यवहार में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता तीन प्रमुख कारणों से बाधित
रही है:
● नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका का वर्चस्व: अब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों
की नियुक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा की जाती थी, जिसमें संसद की विपक्षी
भूमिका नहीं होती थी।
● वित्तीय स्वतंत्रता का अभाव: चुनाव आयोग को अपने बजट और संसाधनों के लिए केंद्र
सरकार पर निर्भर रहना पड़ता है, जो उसकी निष्पक्षता को बाधित करता है।
● दंडात्मक शक्तियों की सीमा: चुनाव आयोग के पास अत्यधिक शक्तियाँ तो हैं, लेकिन वे अक्सर
‘आचार संहिता तक सीमित’ होती हैं — अंतिम दंड का अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं
होता। - स्वतंत्रता बढ़ाने के उपाय: व्यावहारिक सुझाव
(क) नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार
● वर्तमान प्रणाली:
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक समिति द्वारा नियुक्ति।
● प्रस्तावित सुधार:
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मार्च 2023 में एक ऐतिहासिक निर्णय में कहा कि:
“अब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक कॉलेजियम द्वारा होनी चाहिए, जिसमें प्रधानमंत्री,
लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों।” यह एक महत्वपूर्ण
सुधारात्मक पहल है जो आयोग की स्वतंत्रता को संस्थागत आधार देती है।
(ख) पारदर्शिता और जवाबदेही का ढांचा: चुनाव आयोग की कार्यवाहियों का वार्षिक
सार्वजनिक लेखा-जोखा तैयार हो, जिसमें यह विवरण हो कि:
किस क्षेत्र में कितनी शिकायतें मिलीं?
कितनी शिकायतों पर कार्रवाई हुई?
किन अधिकारियों को दंडित किया गया?
- चुनाव आयोग की निष्क्रियता से जुड़ी हालिया आलोचनाएँ : 2019 और 2024 के लोकसभा
चुनावों में सत्तारूढ़ दलों द्वारा खुलेआम धार्मिक और विभाजनकारी भाषा के प्रयोग पर आयोग
की मौन प्रतिक्रिया। बिहार और बंगाल में दलित-मुस्लिम क्षेत्रों में ईवीएम गड़बड़ी, पर आयोग
ने स्थानीय शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया।
2024 में सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम, VVPAT और मतदाता डेटा की सत्यापन प्रक्रिया पर
सवाल उठाए, और आयोग से विस्तृत स्पष्टीकरण माँगा। यह सब इंगित करता है कि अगर
चुनाव आयोग की स्वायत्तता केवल काग़ज़ पर रहेगी, तो लोकतंत्र का ढाँचा विश्वसनीय नहीं
रहेगा।
‘वोट बंदी’ के युग में चुनाव आयोग को नया जीवन चाहिए : यदि चुनाव आयोग की नियुक्ति
स्वतंत्र हो, कार्यकाल सुरक्षित हो, वित्तीय निर्णयों पर सरकार का नियंत्रण न हो, और दंडात्मक
शक्ति स्पष्ट हो — तभी वह ‘लोकतंत्र के प्रहरी’ की भूमिका निभा सकता है। अन्यथा, ‘वोट बंदी’
जैसी प्रक्रियाएं खुलेआम होंगी और संविधान केवल एक स्मारक बन जाएगा।
उच्च न्यायालयों की भूमिका चुनाव आयोग में क्या हो? : यह अत्यंत ज़रूरी प्रश्न है — क्या भारत
के उच्च न्यायालयों की कोई भूमिका होनी चाहिए चुनाव आयोग की संरचना, संचालन और
पारदर्शिता में? और अगर हाँ, तो कैसी और क्यों? - वर्तमान स्थिति: न्यायपालिका की भूमिका सीमित, लेकिन निर्णायक क्षणों में हस्तक्षेपकारी
चुनाव आयोग की संरचना में: कोई न्यायिक प्रतिनिधित्व नहीं होता। मुख्य चुनाव आयुक्त और
अन्य आयुक्तों की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है, और इसमें न्यायपालिका की कोई प्रत्यक्ष
भूमिका नहीं होती।
न्यायपालिका की भूमिका तब सक्रिय होती है: जब कोई नागरिक, राजनीतिक दल या
संगठन चुनाव आयोग की निष्क्रियता या पक्षपात के खिलाफ याचिका दायर करता है। उदाहरण
के लिए: सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2023 में ऐतिहासिक फ़ैसला देते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त
की नियुक्ति प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश की संयुक्त समिति से होनी चाहिए।
यह पहली बार था जब न्यायपालिका ने चुनाव आयोग की संरचना में न्यायिक
भागीदारी को औपचारिक मान्यता दी। लेकिन भाजपा सरकार ने इसके विरुद्ध काम किया और
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के पैनल में सी जे आई को बाहर करके मुख्य चुनाव आयुक्त की
नियुक्ति को पूर्णरूपेण: अपने हाथ में ले लिया।
- संभावित सुधार: उच्च न्यायालयों की भूमिका कैसे और कहाँ हो सकती है?
(क) नियुक्ति प्रक्रिया में न्यायिक भागीदारी : राज्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति में संबंधित
उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को परामर्शदाता के रूप में शामिल किया जा सकता है।
केंद्र के स्तर पर, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति का स्थायी सदस्य बनाया
जाए (जैसा सुप्रीम कोर्ट ने निर्देशित किया है)।
(ख) चुनाव प्रक्रिया की न्यायिक निगरानी: हाईकोर्ट्स को यह अधिकार मिले कि वे राज्य स्तर
पर चुनाव आयोग की निष्पक्षता की निगरानी कर सकें, विशेषकर:
शिकायत निवारण प्रणाली की समीक्षा,
ईवीएम/वीवीपैट की पारदर्शिता के मामलों में दखल,
मतदान बाधा या ‘वोट बंदी’ जैसी घटनाओं पर स्वतः संज्ञान।
(ग) निर्वाचन विवादों का शीघ्र निस्तारण: वर्तमान में लोकसभा/विधानसभा चुनाव से
संबंधित विवाद (election petitions) हाईकोर्ट में सालों तक लंबित रहते हैं। इसके लिए एक
“चुनाव न्याय पीठ (Election Bench)” बनाने का सुझाव दिया जा सकता है, जिसमें विशेष रूप
से तेज़ गति से चुनाव से जुड़े मामलों को निपटाया जाए।
(घ) चुनाव आयोग की कार्यवाहियों की न्यायिक समीक्षा: चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की
तारीखों की घोषणा, आचार संहिता लागू करने का तरीका, या बूथ स्तर पर गड़बड़ियों से जुड़ी
शिकायतों को न्यायिक निरीक्षण के अंतर्गत लाया जा सकता है। - व्यावहारिक चिंताएँ और संतुलन: कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि न्यायपालिका को बहुत
अधिक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, ताकि वह ‘judicial overreach’ में न फँसे। न्यायिक
अतिरेक (Judicial Overreach) वह स्थिति होती है जब न्यायपालिका (अदालतें) अपनी
सीमाओं का उल्लंघन करते हुए कार्यपालिका (सरकार) या विधायिका (संसद/विधानसभा) के
कार्यों में अनुचित रूप से हस्तक्षेप करने लगती है। यह न्यायपालिका की संवैधानिक सीमाओं से बाहर
जाकर शासन-प्रशासन या नीतिगत निर्णयों में दखल देना माना जाता है।
इसलिए सुधार करते समय दो बातों का संतुलन आवश्यक है —
न्यायपालिका को संवैधानिक संतुलन बनाए रखते हुए,
केवल संवेदनशील, पारदर्शिता से संबंधित मामलों में दखल देना चाहिए,
और आयोग की स्वायत्तता को पूरी तरह समाप्त नहीं करना चाहिए।
अर्थात न्यायपालिका — चुनाव आयोग की स्वतंत्रता की रक्षक बन सकती है
यदि उच्च न्यायालयों को:
नियुक्ति प्रक्रिया में परामर्शदाता बनाया जाए,
बूथ स्तर पर न्यायिक निगरानी का दायरा मिले,
निर्वाचन विवादों के शीघ्र निस्तारण हेतु विशेष पीठ बने — तो चुनाव आयोग की
स्वतंत्रता काग़ज़ी नहीं, ज़मीनी होगी।
आजकल यह आम बात हो गई है कि चुनाव आयोग सरकार के दवाब में काम कर रहा
है। यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण और संवैधानिक दृष्टि से गंभीर है — “चुनाव आयोग सरकार के
दबाव में काम कर रहा है, क्योंकि नागरिकता की परख करना उसका काम नहीं है।”
यह वाक्य न केवल चुनाव आयोग की सीमाओं और ज़िम्मेदारियों को रेखांकित करता है,
बल्कि यह भी बताता है कि जब कोई संवैधानिक संस्था अपनी निर्धारित सीमा से बाहर जाकर
कार्य करती है — वह या तो राजनीतिक दबाव में है, या उसकी वैधानिक समझ भ्रष्ट हो चुकी है।
इस कथन को विस्तारपूर्वक और तथ्यात्मक ढंग से समझें, ताकि इसे एक निबंध या तर्क में प्रयुक्त
किया जा सके।
- क्या नागरिकता की परख करना चुनाव आयोग का कार्य है?
नहीं — भारतीय संविधान और Representation of the People Act, 1950 तथा 1951 के
तहत चुनाव आयोग का कर्तव्य है:
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना
मतदाता सूची तैयार करना
चुनाव चिन्ह आवंटित करना
आचार संहिता लागू कराना
मतदान और मतगणना की निगरानी करना
नागरिकता की परख (Citizenship Verification) — यह कार्य भारत सरकार के गृह मंत्रालय,
विदेश मंत्रालय, और नागरिकता अधिनियम 1955 के अधीन आता है।
अतः चुनाव आयोग यदि किसी मतदाता से उसकी “नागरिकता प्रमाणित” करने की माँग
करता है, तो वह अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर जा रहा है। और ऐसा तब और भी
संदिग्ध हो जाता है, जब यह प्रक्रिया विशेष वर्गों — जैसे मुसलमानों, बंगालियों, या गरीब लोगों
— के खिलाफ लक्षित हो।
यह भी कि जब चुनाव आयोग सत्ताधारी दल की इच्छा से नियुक्त होगा, तो वह
‘मतदाता’ नहीं, ‘सरकार’ का पक्ष लेगा। इसका असर दलित, गरीब, अल्पसंख्यक, महिलाओं —
उन सभी वर्गों पर पड़ेगा जो सत्ता के दमन के विरुद्ध अपने मत का प्रयोग करते हैं। चुनाव
आयोग की स्वतंत्रता लोकतंत्र का ऑक्सीजन है — और इसकी नियुक्ति प्रक्रिया उस ऑक्सीजन
टैंक की संरचना। यदि यह टैंक सत्ता के रसोईघर में बना है, तो लोकतंत्र दम घुटने से नहीं
बचेगा। इसलिए समय आ गया है कि नागरिक समाज, न्यायपालिका और विपक्ष मिलकर
चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में व्यापक और पारदर्शी सुधार सुनिश्चित करें। यही लोकतंत्र
की रक्षा की सबसे पहली शर्त है।
0000
तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार
की तीन दर्जन से ज्यादा किताबें प्रकाशित चुकी हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से
आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में
आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), ग्यारह प्रतिक्रियात्मक निबन्ध संग्रह
और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा
के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के
संपादक रहे हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा
साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं। और भी कई
सामाजिक/नागरिक सम्मां। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन में रत





