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राष्ट्र सशक्त तो उसकी राष्ट्रभाषा भी सशक्त ! 

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( हिन्दी दिवस पर विशेष  )

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-निर्मल कुमार शर्मा ‘

जब तक कोई देश,वहाँ के रहने वाले लोग और वहाँ का समाज समृद्धशाली और ताकतवर नहीं होता है,तब तक उनके द्वारा बोली जाने वाली भाषा भी शक्तिशाली और समृद्ध नहीं हो सकती है। उदाहरणार्थ 19 वीं सदी में गरीबी से त्रस्त रूस में फ्रेंच भाषा बोलनेवालों को ही वहां के समाज में अभिजात्य माना जाता था और उसे बहुत ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था,ठीक वैसे ही जैसे आज भारतीय समाज और इस देश में मैकाले के सिद्धांत के अनुसार देखने में भारतीय पर मानसिक तौर पर,अपने रहनसहन में और वैचारिकता के मानसिक गुलाम केवल अंग्रेजी बोल लेनेवाले निहायत मूर्ख को भी बहुत सम्मान और आदर की दृष्टि से देखा जाता हैं ! 

              सोवियत क्रांति के बाद ब्लादिमीर इल्यीच उल्यानोव लेनिन जैसे आमजनहितैषी, सशक्त,कर्मठ और किसानों,मजदूरों के मसीहा के हाथों में रूस मतलब यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक के राष्ट्रपति के तौर पर सत्ता आने के बाद उनकी आमजनकल्याणकारी नीतियों के बदौलत 19 सदी का वही अत्यंत गरीब और जर्जर देश रूस दुनिया की एक महाशक्ति के रूप में उठ खड़ा हुआ,वहाँ के मजदूरों,किसानों और आमजन की आर्थिक,शैक्षणिक और सामाजिक जीवन स्तर में स्तरीय सुधार हुआ ! 

उसके बाद आश्चर्यजनकरूप से    दुनियाभर में वही रूसी भाषा अब बहुत सम्मान की दृष्टि से देखी जाने लगी ! रूस में और दुनियाभर में भी रूसी बोलनेवाले अब हिकारत भरी नजरों से नहीं,अपितु सम्मान की दृष्टि से देखे जाने लगे ! आज रूसी भाषा पूरे राजकीय सम्मान के साथ सार्वजनिक स्वीकार्यता के साथ संपूर्ण रूस की राजकीय,शासकीय,एकेडमिक व बोलचाल की भाषा के रूप में रूस तथा विदेशी देशों में भी अत्यंत गौरवान्वित व सम्मानित भाषा है !

 मातृभाषा हिन्दी के बारे में तरह-तरह के कुतर्कों की भरमार  ! 

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             अभी पिछले दिनों हिन्दी दिवस के मौके पर बहुत से लेखकों,पत्रकारों,साहित्यकारों, संपादकों की तरफ से,दृश्य और प्रिंट मिडिया में बहुत बड़े-बड़े व्याख्यान दिए गए,लेख लिखे गए तथा सम्पादकीय लिखे गए,जिसमें एक तरफ भारत में हिन्दी की दुर्दशा,उसकी दीन-हीन अवस्था,असहाय,कमजोर और गंवारों की भाषा होने का रूदन रोया गया और दूसरी तरफ अंग्रेजी भाषा के लिए तमाम तरह के कसीदे पढ़े गये यथा यह एक अभिजात्य वर्ग की भाषा है,यह रोजगारपरक भाषा है,यह भारतीय यूनिवर्सिटीज, इस देश के उच्च शिक्षा संस्थानों,इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई जानेवाली भाषा है,यह बड़े-बड़े ब्यूरोक्रेट्स द्वारा बोली जाने वाली भाषा है,यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बोली जाने वाली एक अतिप्रतिष्ठित भाषा है,अंग्रेजी के बगैर हमारा काम ही नहीं चल सकता, क्योंकि यह एक रोजगार परक भाषा भी है ! यह देश के तमाम उच्च न्यायालयों तथा भारतीय उच्चतम् न्यायालय के जजों तथा वकीलों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है आदि-आदि बहुत सी अनर्गल बातें !                        

 भारतीय हाईकोर्ट्स और सुप्रीमकोर्ट में आज भी अंग्रेजी क्यों ? मातृभाषा हिन्दी क्यों नहीं !

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             कटुसत्य यह भी है कि ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की गुलामी से मुक्त होने के 75 साल बाद आज भी भारत के सभी राज्यों में स्थित तमाम हाईकोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट जैसे उच्च न्यायालयों में चल रहे मुकदमों में बहस मतलब के दौरान वकीलों और कथित माननीय न्यायमूर्ति साहब के बीच वार्तालाप अक्सर हिन्दी और भारत की क्षेत्रीय भाषाओं में न होकर प्रायः इस देश में डेढ़ से दो प्रतिशत ठीक से बोलने,लिखने व समझने वालों की भाषा अंग्रेजी में ही होती है ! भारतीय न्यायालयों द्वारा दिए जाने वाले निर्णय भी लिखित में अंग्रेजी भाषा में ही होते हैं,आदि-आदि बहुत से तर्क और कुतर्क गढ़े गए,दिए गये !

 आम आदमी की व्यथा कथा,सुख-दुख आदि ही असली साहित्य है ! 

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           सबसे पहले तो यह स्पष्ट हो जानी चाहिए कि किसी भी देश का वास्तविक और सच्चा साहित्य,नाटक,उपन्यास,लेख,कहानी और व्यंग्य आदि किसी प्रसाशनिक कार्य के लिए नहीं होता है अपितु वह तो वहाँ के समाज में आमजन, मजदूरों,कर्मचारियों,किसानों के जीवन में घटित हो रहे वर्गीय भेदभावपूर्ण कृत्यों,अत्याचारों, बर्बरताओं,विद्रूपताओं,अंधविश्वासों,पाखंडभरे कुकृत्यों,आदि मानवीयता और एक सभ्य समाज की गरिमा को कलंकित करनेवाले कुकृत्यों और समाजविरोधी कदमों को समाज के सामने सशक्त ढंग से रखने का ही एक माध्यम मात्र होता है। 

 गरीबों द्वारा बोली जाने वाली भाषा भी गरीब और अशक्त होती है !

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               किसी भी गरीब देश और समाज द्वारा बोली जाने वाली भाषा भी अशक्त और कमजोर होती है,उदाहरणार्थ पिछली सदी में ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा शोषित व गुलाम भारत की गरीब जनता द्वारा बोली जानेवाली हिन्दी भाषा आज भी गँवारों,गरीबों,गाँवों और असभ्यों की भाषा कहलाने को अभिशापित है,लेकिन दूसरी तरफ ताकतवर और कभी सूर्य अस्त न होनेवाले ब्रिटिश साम्राज्यवादियों और उसके मानसिक तौर पर गुलामों द्वारा बोली जानेवाली अंग्रेजी भाषा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लगभग पतन हो जाने के बावजूद अभी भी दुनिया भर में अपनी परचम फहरा रही है,क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की जगह अब ताकतवर अमेरिकी साम्राज्यवादियों की भाषा भी अंग्रेजी ही है !

 भारत में भी लेनिन और माओ त्से तुंग जैसे आमजनहितैषी और कर्मठ नेता और दल की निहायत जरूरत !

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भारत में भी अब एक ऐसे सबल, मजबूत,ईमानदार,देशभक्त,कर्मठ,आमजन कल्याणकारी और आमजनहितैषी नीतियों को ईमानदारी और कर्मठता से लागू करनेवाले किसी मन-वचन और कर्म से ईमानदारी से काम करनेवाले लेनिन और माओ त्से तुंग जैसे नेता और राजनैतिक दल की सख्त और शीघ्र जरूरत है ! जुमलेबाजी करने वाले,झूठे,केवल दो पूँजीपतियों के हितरक्षक, हिन्दू-मुस्लिम,मंदिर-मस्जिद, भारत-पाकिस्तान करके हमेशा दंगे कराने की फिराक में रहनेवाले और संपूर्ण देश की आवाम के हितरक्षण के विरूद्ध अनैतिक कार्य करने वाले फॉसिस्ट,असहिष्णु , क्रूर और बर्बर व्यवहार करनेवाले छद्म प्रधानजनसेवक नेता यह काम कतई कर ही नहीं सकता ! 

  हमें ऐसा नेता चाहिए जो राष्ट्र के साथ राष्ट्रभाषा को भी सबल बनाने में सक्षम हो !

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          हमें ऐसा नेता चाहिए जो इस देश के सभी साधारण और आमजन लोगों,मजदूरों, किसानों,कर्मचारियों,आम व्यापारियों,छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों,दिहाड़ी मजदूरों, टैक्सी,टेम्पो,ट्रक ड्राइवरों आदि सभी को आर्थिक तौर पर स्थिति में गुणात्मक सुधार लाकर इस देश को दुनिया के एक अत्यंत सबल व शक्तिशाली राष्ट्रों की श्रेणी में ला दे,उस स्थिति में अंग्रेजी,चीनी भाषा के बाद तीसरे स्थान पर बोली जाने वाली हमारी हिन्दी भाषा स्वतः ही एक सशक्त भाषा हो जाएगी,उस स्थिति में हिन्दी को सशक्त भाषा बनाने के लिए प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस मनाने,हिन्दी सप्ताह,गोष्ठियाँ और सेमिनार करने के पाखंड और क्षद्म दिखावा करने की कोई जरूरत ही नहीं पड़ेगी !

अंग्रेजी के बगैर हमारा काम क्यों नहीं चल सकता ? 

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         जब इजरायल,जिसकी आबादी मात्र 92.2 लाख है,उसकी भाषा हिब्रू है,हंगरी की आबादी केवल 97.5 लाख व उसकी भाषा हंगेरियन है,  नीदरलैंड की आबादी मात्र 1.74 करोड़ है उसकी भाषा डच है,पोलैंड की आबादी 3.8 करोड़ है उसकी भाषा पोलिश है,फ्रांस की आबादी 6.74करोड़ और उसकी भाषा फ्रैंच है,जर्मनी की आबादी 8.32करोड़ है इसकी भाषा जर्मन है, जापान की आबादी मात्र 12.58करोड़ है उनकी भाषा जापानी है ! ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि उक्त वर्णित यूरोप के सभी देश ब्रिटिश साम्राज्य वादियों के देश इंग्लैंड जिसकी मातृभाषा अंग्रेजी है,से मात्र कुछ सौ किलोमीटर के दायरे में ही स्थित हैं,लेकिन इन छोटे-छोटे क्षेत्रफल व आबादी वाले देशों का काम उनकी मातृभाषा में बखूबी चल सकता है,तो इतने बड़े हिन्दुस्तानी भूभाग जिसका क्षेत्रफल 3.287 लाख वर्ग किलोमीटर या 3.287 Million Kilometre ² को घेरे 1अरब चालीस करोड़ वाले हम निस्तेज और नपुंसक हिन्दुस्तानियों का देश हिन्दुस्तान का काम मातृभाषा हिन्दी में क्यों नहीं चल सकता ?

              हमें अंग्रेजी की वैशाखी का सहारा इसलिए भी लेना पड़ता है,क्योंकि हमारे दिल-दिमाग में अपने राष्ट्र के प्रति राष्ट्रीय गौरव और अपनी भाषा के प्रति जरा भी सम्मान और आत्म गौरव ही नहीं रह गया है ! हम पिछले हजारों साल तक मुसलमानों के और डेढ़ सौ साल तक अंग्रजों के गुलाम रहकर अपनी भाषा के प्रति आत्म गौरव करना ही भूल गए हैं और शोषणकारी ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की भाषा अंग्रेजी के प्रति भी गुलाम बन गए हैं ! ‘अंग्रेज चले गए परन्तु हमें अभी भी अंग्रेजी के प्रति गुलाम बना गए है ! ‘ ये बदनाम कहावत हम सभी आत्म गौरव विहीन भारतीयों पर अभी भी पूरी तरह से लागू है ! इस हीन ग्रंथी और मानसिकता से मुक्त होना ही होगा !

   -निर्मल कुमार शर्मा ‘गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के सुप्रतिष्ठित समाचार पत्र-पत्रिकाओं में वैज्ञानिक,सामाजिक, राजनैतिक, पर्यावरण आदि विषयों पर स्वतंत्र,निष्पक्ष,बेखौफ,आमजनहितैषी,न्यायोचित व समसामयिक लेखन,संपर्क-9910629632, ईमेल – nirmalkumarsharma3@gmail.com

Ramswaroop Mantri

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