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*ओरो को नहीं बदल सकते तो कूद को बदल डालो*

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नरेन्द्र भारती

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एक विद्वान ने कहा था की खुद को बदल डालो तुम औरों को नहीं बदल सकते यह अटल सच्चाई है और आधुनिक समय के हालातों पर सटीक फिट हो रही है l दुनिया में प्रत्येक मानव के अपने- अपने विचार हैं अपनी- अपनी संगत है अपने =अपने दायरे हैं अपनी अपनी खुशी है आदमी खुश रहना चाहिए l इंटरनेट की दुनिया में सब मस्त हैं चौबीस घंटे व्यस्त हैं l ग़लत काम के लिए वक़्त ही वक़्त है अच्छे काम के लिए वक़्त नहीं है l

आज संस्कारों का अंतिम संस्कार होता जा रहा है l इंटरनेट की दुनिया ने सबको विद्वान् बना दिया है हर आदमी हरफ़नमोला बन चूका है l अपने से बड़ों का अपमान किया जा रहा है निरादर किया जा रहा है यह बहुत ही त्रासदी है l अहंकार हावी हो चूका है और मानव अहंकारी बनता जा रहा है l एक दूसरे को नीचा दिखाना मानव की फितरत बन चुकी है lख़ूनी रिश्तों में बढ़ता संक्रमण बहुत ही घातक होता जा रहा है और नैतिक मूल्यों में गिरावट एक त्रासदी बनती जा रही है ।

नैतिक मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है व ख़ूनी रिश्तों का आस्तित्व खत्म होता जा रहा है,नैतिक मूल्यों में गिरावट एक त्रासदी है समय रहते इस त्रासदी को रोकना होगा समाज को मंथन करना होगा तभी नैतिक मूल्यों की गिरावट रुक सकती है l अक्सर देखा गया है की नई पीढ़ी नैतिक मूल्यों को भूलती जा रही है l नैतिक मूल्यों का ह्रास बहुत ही चिंतनीय है बुद्धिजीवी वर्ग को समय रहते मनन करना होगा वरना बहुत देर हो जाएगी l आधुनिक मानव स्वार्थी होता जा रहा है खून के रिश्तों को तोड़ रहा है और गैरों को अपना बना रहा है l रिश्तों की बुनियाद हिलती जा रही है और जर्जर हो चुकी है दीवार का एक पत्थर भी निकल जाये तो दीवार कभी भी ढह सकती है और रिश्ते दफन हो सकते हैं lरिश्तों की दशा अब दुर्दशा में बदलती जा रही हैl मानव निजी हितों के लिए अनैतिक आचरण कर रहा हैl यह बहुत ही घातक है l जर,जोरू,जमीन के लिए रिश्तों का खून बहाया जा रहा है परिवार के परिवार खत्म हो रहे हैं जमीन के टुकड़े के लिए एक दूसरे के प्यासे हो चुके हैं l

भाईचारा खत्म होता जा रहा नफ़रत के बीज बोये जा रहे हैं रिश्तों की दीवारें दरक रही हैं और नफ़रत की दीवारें खड़ी होती जा रही हैं l रिश्तों में असुरक्षा की भावना बढ़ती जा रही है असंतोष पनपता जा रहा है रिश्तों में गहरी खाइयाँ होती जा रही हैंl विश्वास टूट रहे हैं अविश्वास बढ़ता जा रहा है l रिश्तों की मिठास खत्म हो रही है रिश्तों में कड़वाहट बढ़ती जा रही है l रिश्तों के बंधन टूट रहे हैं खून के रिश्तों में गांठे पड़ती जा रही हैं l नैतिक मूल्य नष्ट होते जा रहे हैं l

रिश्तों की माला बिखर रही है माला के मनके इधर उधर बिखर रहे हैं l ख़ूनी रिश्ते गुमशुदा व गुमनाम होने लगे हैं कुछ रिश्ते लापता हो चुके हैं लापता होचुके रिश्तों को ढूंढ़ना होगा l रिश्तों की वर्णमाला के अक्षर भी आगे पीछे हो चुके हैं l रिश्तों की इबारतें भी बदल चुकी हैं l गलतफहमी ने भी रिश्तों को तोड़ा हैं टूट चुके रिश्तों को जोड़ना चाहिए ताकि रिश्तों की जड़े सदैव हरी रहे अहंकार के कारण रिश्ते बिखर रहे हैं l

माया के मोहजाल में फंस चूका मानव आज भटक चूका है माया में अंधा हो चूका है पथभ्र्स्ट हो चूका है संवेदना,करुणा,मानवता नाम की कोई चीज नहीं है एक दूसरे को नीचे गिराने के लिए अनैतिक कार्य कर रहे हैं l रिश्ते असुरक्षित होते जा रहे हैं डरावने होते जा रहे हैं भय का वातावरण बन चूका है l रिश्तों के सिद्धांत बदलते जा रहे हैं परिभाषा बदल चुकी है रिश्ते मतलबपरस्त होते जा रहे हैं l नेकी व भलाई व अच्छाई खत्म होती जा रही है और बुराई का बोलबाला बढ़ता जा रहा है l रिश्तों में ग्रहण लग गया है एक दूसरे का अच्छा नहीं देख सकते l ईर्ष्या पनप रही है नतीजन सगे रिश्तों के सुख दुःख में शामिल नहीं होते केवल मात्र औपचारिकता निभाई जा रही है l

चंद स्वार्थ के लिए रिश्ते टूट रहे हैं l रिश्तों की मशाल बुझती जा रही है l रिश्तों में बिखराव बड़े पैमाने पर बढ़ता जा रहा है l रिश्ते अर्थहीन होते जा रहे हैं l रिश्तों का स्वरूप बिगड़ चूका है l समाज को इस पर समीक्षा करनी होगी l रिश्तों में बढ़ती दूरियों को पाटना होगा एक सेतु बनाना होगा बिखर चुके रिश्तों को समेटना होगा ताकि रिश्तों की मशाल निर्बाध रूप से जलती रहे l बिखर चुके रिश्तों को संग्रहीत करना होगा नफ़रत के बीजों को नष्ट करना होगा l

अपवित्र हो चुके रिश्तों को गंगाजल से पवित्र करना होगाl खानाबदोशों की तरह बिखर चुके व भटक चुके रिश्तों को इकठा करना होगा l रिश्तों में विश्वास लाना होगा ताकि विश्वास बरकरार रहे l रिश्तों का व्याकरण बदल चूका है l प्रस्तावना से सारांश तक रिश्ते बदलते जा रहे हैं l बिखर चुके खून के रिश्तों का विश्लेषण करना होगा रिश्तों की इस तबाही को रोकना होगा l नैतिक मूल्यों का क्षरण रोकना होगा l भटक चुके मानव को नैतिक मूल्यों का पाठ पढ़ाना चाहिए ताकि एक स्वस्थ समाज बन सके l मानवीय मूल्यों क़ो बचाना होगा l

आधुनिक मानव माया के लालच में रिश्ते नाते भूलता जा रहा है मोबाइल पर व्यस्तता बहुत बढ़ गई है किसी से कोई मतलब नहीं है मोबाइल ही सच्चा साथी बन गया है मोबाइल ने रिश्तों में दूरियां पैदा कर दी हैंl मानव की संवेंदनायें मृतप्राय हो चुकी हैं और मानव संवेंदनहीन हो चूका है,कौन जी रहा कौन मर रहा है कोई सरोकार नहीं है l यह बहुत ही त्रासदी है चौबीस घंटे इंटरनेट की दुनिया में मस्त है चौबीस घंटे भी कम होने लगे है l दिन रात आभासी दुनिया में अनावश्यक ही व्यस्त रहता है l व्यस्तता इतनी बढ़ गई है कि माँ बाप के साथ बात तक करने क़ो समय नहीं है l एक समय था कि आदमी एक दूसरे के दुःख सुख में शामिल होता था लेकिन आज किसी के पास एक मिनट का भी समय नहीं है l

रिश्ते नाते खत्म होते है रहे हैं रिश्तों का कत्लेआम किया जा रहा है चंद स्वार्थ के लिए रिश्ते तोड़े जा रहे हैं l समाज में भाई चारा खत्म होता जा रहा है एक दूसरे क़ो नीचा दिखाने कि होड़ लगी है l सोशल मीडिया पर हर समय व्यस्त रहते हैं l आज गरीब रिस्तेदार व भाई से नफ़रत की जाती हैl आभासी दुनिया तक ही सीमित हो चुके है l यह पतन कि पराकाष्ठा है l सवेंदना की परिभाषा बदल चुकी हैं और लोग संवेंदनहीन होते जा रहे हैं l आज सड़कों पर आदमी तड़फ तड़फ कर मर रहा है लोग सहायता तो नहीं करते वीडियो जरूर बनाते हैं l

अगर समय पर अस्पताल ले जाएँ तो जान बच सकती है ऐसे वीडियो बनाने वालों पर कानूनी कारवाही करनी चाहिए l समाज किसी तरफ जा रहा हैं यह एक यक्ष प्रश्न बन गया है l नैतिक मूल्यों का पतन हो चूका है इस पतन क़ो रोकना होगा l आज मानव फितरती होता जा रहा है l अहंकार से लवालब भर चूका है l अहंकार ने पता नहीं कितने ही सच्चे रिश्तों का वजूद खत्म कर दिया है l रिश्तों क़ो दीमक लग चुकी है तथा रिश्ते टूट रहे हैं l नैतिक मूल्यों का पालन करना होगा l रिश्तों को बचाना समाज हित में है l

(वरिष्ठ पत्रकार)

Ramswaroop Mantri

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