“अगर गाँधी ना होते तो आज़ादी पहले ही मिल जाती” ये बात मैं कुछ मूर्खों के मुंह से बचपन से सुन रहा हूँ। मेरे स्कूल में बच्चे बोलते थे, अब भी कुछ स्कूल के लड़कों के मुंह से मैंने फिर ये बात सुनी। इतने बरसों में कुछ नहीं बदला। पर कैसे मिल जाती, क्यूँ मिल जाती, क्या वजह होती… मिल जाती तो उस आज़ादी का तुम करते क्या… इसका जवाब कोई नहीं देता।
पर सिर्फ़ बहस की खातिर, मान लेते हैं कि आज़ादी पहले मिल जाती। पर पहले कुछ और घटनाओं पर बात करते हैं क्यूंकि दरअसल इस लेख का मुद्दा इस बेहूदा बात का जवाब देना नहीं है, इस लेख का मुद्दा कुछ और है।
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2 अप्रैल 1852 को रात दो बजे मुग़ल बादशाह बहादुरशाह जफ़र के लाल किले से उनके ग्यारह बरस के बेटे शहज़ादे जवांबख्त की बारात निकली। इस शादी के खर्च का इंतज़ाम उनकी बेगम ने दिल्ली के साहूकारों से क़र्ज़ लेकर किया था और बेगम इतनी सख्त मिजाज़ थी कि साहूकारों को पता था ये पैसा वापस नहीं आएगा। मुगलिया सल्तनत जो कभी पूरे हिंदुस्तान पर राज़ करती थी, तब तक दिल्ली के लाल किले तक सिमट कर रह गयी थी।
बहादुरशाह चूँकि शायरी के बड़े शौक़ीन थे तो लाल किले की रातें मुशायरों से आबाद हुआ करती थीं। ग़ालिब इसी काल में दिल्ली में रहते थे और इब्राहीम जौक़ बादशाह के दरबार की शोभा बढाते थे। इन्हीं जौक़ की सवारी जाते देख एक दिन बाज़ार में ग़ालिब ने मिसरा मारा था,
“हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता” {ये किस्सा भी मनोरंजक है पर फिर हम भटक जायेंगे}
दिल्ली की रातें बड़ी रौशन हुआ करती थीं। ये वो वक़्त था जब दिल्ली में मुग़ल और अंग्रेज साथ-साथ रहा करते थे। रहते तो साथ थे लेकिन यूँ समझिये जैसे अलग-अलग टाइम ज़ोन में रहते हों।
मुगलों का दिन दोपहर के बाद शुरू होता था। शाम चार बजे बाज़ार परवान चढ़ता था। शायर, तवायफ़ें, दरबारी सब दोपहर बाद सोकर उठते और रात के लाल किले में मुसलसल चलने वाले मुशायरों की तैयारी करते। दिल्ली की रातें कोठों और मुशायरों से रंगीन रहती। सुबह चार बजे सब लोग इन सबसे फारिग होकर अपने अपने घरों पर सोने जा रहे होते तब एक दूसरी दुनिया अपने दिन की शुरुआत कर रही होती। ये अंग्रेजों की दुनिया थी। ये सुबह चार बजे उठते और इनकी छावनी के सैनिक वर्जिश में लगे होते। अंग्रेज सुबह जल्दी उठकर भरपूर नाश्ता करते। अपने दफ्तरी और फौजी कामों में लगे रहते और रात को आठ बजे सोने चले जाते थे जब मुगलिया दिल्ली बस अपनी रात की शुरुआत ही कर रही होती। अंग्रेज सिपाही अनुशासित थे और दिल्ली का दरबार अय्याश।
अचानक जब एक धार्मिक अफवाह से भड़के सैनिकों ने बगावत शुरू कर दी तो उसके बाद उन्हें समझ नहीं आया कि अब वो आगे करें क्या? तो ये सारे अनियंत्रित सैनिक दिल्ली पहुँच गए कि मुग़ल बादशाह ही हमारा नेतृत्व कर सकता है। एक पिचासी साल के बूढ़े पर जबरन एक बगावत की ज़िम्मेदारी सौंप दी गयी जो अपने शहर और अपनी ज़िंदगी में इन गैर अनुशासित सिपाहियों के आ जाने से हैरान परेशान था।
अगर ये लोग अंग्रेजों को भगा भी देते तो फिर मिली सत्ता का क्या करते?
क्या मुग़ल बादशाह या इस फ़ौज के पास कोई विज़न था? कोई दृष्टि थी?
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‘वोल्गा से गंगा’ की एक कहानी है ‘मंगल सिंह’।
एक विदेश से पढ़ा नौजवान मंगल सिंह अपने देश वापस लौटता है। वो सारे विदेशी आविष्कारों से वाकिफ़ है, फ़्रांस की क्रांति के बारे में जानता है और मार्क्स को पढ़ चुका है। खुले दिमाग का है। 1857 के सैनिक विद्रोह में वो भी बाकी सामंतों के साथ एक सेनानायक की तरह हिस्सा लेता है लेकिन ये देखकर निराश ही रहता है कि चाहे नाना साहेब हों या अवध का नवाब या जगदीशपुर के कुंवर सिंह या दिल्ली का पेंशनखोर बादशाह… इनमें से किसी के पास भी अंग्रेजों से लड़ने का कोई विज़न नहीं है। ये सब अपनी अपनी पेंशन और रियासतों के लिए लड़ रहे हैं और आज अगर इन्हें इनकी रियासतें और पेंशन वापस मिल जाए तो ये वापस लौट जायेंगे।
“मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी”
झांसी की रानी के इस निश्चय में हिंदुस्तान कहाँ है?
विष्णु पुराण कहता है कि उसी देश का नाम भारतवर्ष है जो समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में है,
‘उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रे: चैव दक्षिणम्। वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संतति:’
आज हम जिन्हें स्वराज का पुरोधा कहते हैं उन्होंने भी विष्णु पुराण का ये श्लोक तो पढ़ा ही होगा, उनके पुरोहितों ने दोहराया ही होगा। इसके बावजूद किसी ने हिन्दुस्तान की बात नहीं की। क्यूँ?
क्यूंकि दृष्टि नहीं थी। इतना विशाल विज़न नहीं था।
इन सभी सामंतों के हाथ में हिंदुस्तान (आज का उत्तर भारत) भी आ जाता तो ये क्या करते? दक्खन की तो छोड़िये, ये उत्तर को भी सैकड़ों रियासतों में बांटकर प्रजा का खून वैसे ही चूसते रहते।
कहानी में राहुल सांकृत्यायन एक इंटरेस्टिंग बात कहते हैं कि जनता इस वक़्त अंग्रेजों के पूंजीवाद और सामंती अत्याचार दोनों से पिस रही है। इनमें भी अंग्रेज ज़्यादा चतुर हैं अगर एक बार उन्हें हटा दिया जाए तो फिर इन सामंतों से निपटना आसान होगा। इसी तर्क के साथ मंगल सिंह अंग्रेजों के खिलाफ सामंतों का साथ देता है।
यहाँ साफ़ कहा गया है कि अंततः सत्ता तो इन दोनों से छीननी होगी।
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आज़ादी मिलने के बाद चितपावन ब्राह्मण और कुछ मुस्लिम नेताओं, दोनों को लगा कि अब आज़ाद हिंदुस्तान पर हमारा हक़ है। क्यूंकि अंग्रेजों से पहले तो एक के हिसाब से मराठों के हाथ में सत्ता थी और दूसरे के हिसाब से मुगलों के, तो हक़ तो उन्ही का बनता है। ये गाँधी-नेहरु बीच में कहाँ से आ गए?
उन मुस्लिम नेताओं ने तो पाकिस्तान बनाकर दिखा दिया कि उनका क्या विज़न था। यहाँ वाले पिछले दस साल से अपनी कारस्तानियाँ दिखा ही रहे हैं। पहले इन्हें भारत मिल जाता तो अब तक हम भी पाकिस्तान होते।
पूरी बात विज़न पर आकर ठहरती है। आपको कोई भी चीज़ मिल जाए तो उसके साथ आप क्या करेंगे ये आपकी दृष्टि है।
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संसार की सभी भाषाओँ की किताबों को जोड़ लिया जाए तो भी सबसे बेहतरीन दस किताबों में शुमार होने वाली ‘मेरा दागिस्तान’ के लेखक रसूल हमज़ातोव एक लेखक की तरफ से यही कहते हैं,
“मुझे विषय मत दो, मुझे दृष्टि दो”
वो जानते हैं कि एक ही विषय अगर दो अलग-अलग रचनाकारों को दिया जाए तो सिर्फ़ वही बेहतरीन रच पायेगा जिसके पास दृष्टि होगी।
एक ही देश दो अलग-अलग नेताओं के हाथ में दे दिया जाए तो उसी जनता की फितरत में ज़मीन-आसमान का फर्क दिख जाएगा। दिख ही रहा है। हमारी किस्मत रही कि हमें शुरुआत में दृष्टि रखने वाले नेता मिल गए। पाकिस्तान को आज तक नहीं मिल पाए।
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विषय हम सबके आसपास बिखरे हुए हैं। जीवन कमोबेश सब एक जैसा ही देख रहे हैं। फिर क्यूँ हैं कि करोड़ों जनता बस एक सोती हुई जिंदगी गुज़ार रही है और चंद लोग उस जिंदगी की खामियां देख पा रहे हैं।
उनके पास दृष्टि है।
स्मार्टफोन सभी के हाथ में हैं। सोशल मीडिया तक सबकी पहुँच है। लेकिन आप किसी का भी फ़ोन उठा कर देख लीजिये उसी फेसबुक का रंग सबके फोन में अलग होगा। किसी के फ़ोन में फेक सांप्रदायिक फोटोग्राफ्स होंगी तो किसी के फोन में सस्ते धार्मिक प्रवचन। किसी के फोन में अश्लील रील्स की बहुतायत होगी और किसी के फ़ोन में उत्कृष्ट लेखों का संग्रहण।
दृष्टि का फ़र्क है।
सोशल मीडिया आप पर वो सब थोपने की कोशिश करता है जो आपको निकृष्टता की तरफ ले जाता है। उनकी कोशिश तो यही है कि आप अपने दिमाग का उपयोग करना बंद करके बस जो कचरा परोसा जा रहा है उससे कुपोषित होते रहें। फिर भी अगर आप इन्टरनेट पर जाकर कुछ ऐसा पढ़-लिख पाते हैं तो आपको मानसिक रूप से पोषित करता है तो ना सिर्फ़ ये आपकी स्वस्थ भूख है बल्कि आपका विज़न भी है।
दृष्टि मायने रखती है। अपनी दृष्टि को ना सिर्फ़ कायम रखें बल्कि इसकी गहराई बढाते रहें, तभी कुछ ऐसा रच पायेंगे, सोच पायेंगे जो हमें एक वैचारिक तौर से समृद्ध करता रहेगा।





