
विजय विनीत
वाराणसी। बनारसी साड़ी-जिसका नाम लेते ही आंखों में रेशमी बुनावट की चमक, सुनहरी जरी की लहर और महीन कारीगरी की नफासत उतर आती है। सदियों से यह सिर्फ़ एक परिधान नहीं, बल्कि बनारस की आत्मा, उसकी पहचान और सांस्कृतिक धरोहर का जीता-जागता प्रतीक रही है। दुर्योग यह है कि इस चमकदार विरासत के पीछे खड़े लाखों मेहनतकश हाथ आज थक चुके हैं।
करघों की खटर-पटर धीमी पड़ चुकी है और हथेलियों में मेहनत के साथ-साथ चिंता की गहरी लकीरें उभर आई हैं। कर्ज़, बेरोज़गारी और अमेरिकी टैरिफ की दोहरी मार ने इन कारीगरों के जीवन को ऐसी अनिश्चितता में धकेल दिया है, जहां सबसे बड़ा सवाल रोज़ी-रोटी का है।
बनारसी सिल्क और इसके अद्वितीय उत्पादों की ख्याति केवल भारत तक सीमित नहीं। एशिया, यूरोप, खाड़ी देशों से लेकर उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका तक इसके चाहने वाले हैं। वहां के बाजारों में इसकी मांग हमेशा स्थायी और सम्मानजनक रही। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्यापार संतुलन नीति के तहत लगाए गए 50 फ़ीसदी टैरिफ ने इस मांग को जैसे एक झटके में दर्दनाक बना दिया। निर्यात की रफ्तार लड़खड़ा गई और बनारस के बुनकर इलाकों में हथकरघों की आवाज़ जैसे थम-सी गई। खासतौर पर उन इलाकों में जहां कभी यही आवाज़ परिवारों की सांसों की तरह गूंजा करती थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी जितना अपनी संकरी गलियों, घाटों, मंदिरों और पकवानों के लिए मशहूर है, उतना ही मशहूर है यहां की बनारसी साड़ी। रेशम के धागों से जिंदगी बुनने वाले बुनकर पीढ़ियों से इस कला के रखवाले रहे हैं। बनारस के बजरडीहा, लोहता, पीलीकोठी, शिवाला जैसे मोहल्ले जो कभी हथकरघों की ताल से गूंजते थे, अब धीरे-धीरे खामोश हो रहे हैं।

करीब एक दशक से यह उद्योग बाज़ार और नीतिगत चुनौतियों के बीच संघर्ष कर रहा है, और अब अमेरिकी टैरिफ ने इस जंग को और कठिन बना दिया है। आर्थिक दृष्टि से यह टैरिफ अमेरिका के लिए भले ही लाभकारी हो, लेकिन भारतीय कपड़ा उद्योग के लिए यह गहरी चोट है। बनारस और पूर्वांचल की उन बुनकर बस्तियों पर धीमी मार पहले से ही है जहां पहले से ही शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ जल और रोज़गार का संकट गहरा है।
कभी बनारसी रेशम साड़ी का जलवा बाज़ार में बेमिसाल था, लेकिन 1991 में व्यापारिक नीतियों में बदलाव और पावरलूम के बढ़ते प्रभाव ने इसकी नींव हिला दी। अब रही-सही कसर अमेरिका के 50 फीसदी टैरिफ ने पूरी कर दी। नतीजा यह है कि बनारस के बुनकरों की पीड़ा आज आंसुओं में छलक रही है।
पीली कोठी के कटेहर इलाके में पीढ़ियों से हथकरघों पर बुनकर बनारसी साड़ी तैयार कर रहे हैं। अब्दुल कलाम और उनके बेटे समेत आठ लोग अब भी इस परंपरा को बचाने की कोशिश में लगे हैं। लेकिन अब्दुल की आंखों में चिंता साफ़ झलकती है, “बाज़ार में प्रतिस्पर्धा, चीनी धागों की बाढ़ और अमेरिकी टैरिफ की मार ने हमारे काम की कमर तोड़ दी है। गद्दीदार भी दबाव में हैं।”

बड़े वादे, अधूरी उम्मीदें
बनारस के पीलीकोठी, बड़ी बाज़ार, छित्तनपुरा, लल्लापुरा, बजरडीहा, सरैया, बटलोइया और नक्खीघाट जैसे मोहल्लों में बुनकरों की बड़ी आबादी बसती है। जियाउलरहमान, कलीमुद्दीन, हाफिज, मोजाम्मिन हसन, टीपू सुल्तान, सगीर, हसीन अहमद, वसीम जैसे सैकड़ों कारीगर सरकारी उपेक्षा का दर्द बयां करते हैं। उनका कहना है कि अमेरिकी टैरिफ के बाद सरकार उनके जीवन को संवारने के लिए गंभीर नहीं दिखती।
बनारसी साड़ियों के बड़े कारोबारी सूर्यकांत बताते हैं, “ब्रोकेड, जरदोजी, ज़री मेटल, गुलाबी, मीनाकारी, कुंदनकारी, ज्वेलरी और रियल ज़री की साड़ियों की आज भी भारी मांग है। लेकिन प्योर सिल्क को अब चीन की सस्ती साड़ियों से चुनौती मिल रही है। अमेरिकी टैरिफ के बाद हमारी हैंडमेड साड़ियां महंगी हो जाएंगी, फिर हम क्या करेंगे?”
सरैया के इब्राहिमपुरा मोहल्ले की तंग गलियां और खुली नालियां ही वहां की पहचान हैं। भीषण गंदगी और सड़ांध के बीच यहां हजारों बुनकर परिवार रहते हैं। उन्हीं में एक हैं मोहम्मद सलीम जो कभी हैंडलूम पर बनारस को पहचान दिलाने वाली मशहूर साड़ियां बुनते थे। लेकिन महंगी बिजली और आसमान छूती महंगाई ने उन्हें करघा छोड़ पकौड़े और समोसा तलने पर मजबूर कर दिया।

ताने-बाने में उलझी जिंदगी
सरैया के हाजी कटरा में बदरुद्दीन कभी 20 पावरलूम और इतने ही हथकरघों पर सोने-चांदी की साड़ियां बुनते थे। लॉकडाउन ने सब छीन लिया। अब वे टॉफी-बिस्कुट बेचकर जिंदगी चला रहे हैं। मोहम्मद सद्दाम, जिनके हाथों ने बरसों रेशम में रंग भरा, कहते हैं, “पहले महीने के तीसों दिन काम रहता था। अब हफ्ते में सिर्फ़ तीन-चार दिन ही काम मिलता है। नौ-दस हज़ार में घर, बच्चों की पढ़ाई और इलाज-सब मुश्किल हो गया है। गद्दीदार कहते हैं, टैरिफ लगने के बाद माल बिक ही नहीं रहा।”
इसी मोहल्ले के सूफी शहीद इलाके में अजीजुर्रहमान के दर्जनों हथकरघे थे जो अब बंद हैं। कोई दूसरा काम न मिला तो उन्होंने आटा-चक्की खोल ली। पहले हजारों-लाखों में खेलते थे, अब दिन भर की कमाई मुश्किल से डेढ़-दो सौ रुपये है। अजीजुर्रहमान की कहानी भी उतनी ही दर्दनाक है। वह कहते हैं, “हमने बुनकरी का काम हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला कर लिया। मजदूरी समय पर नहीं मिलती, और जो मिलती है वह महंगाई के सामने कुछ नहीं। मेरे भाई गुलजार और मुमताज़ सालों पहले सूरत चले गए। जब से अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया है, तभी से उनकी नींद उड़ गई है। निर्यातक नई साड़ियों का ऑर्डर देना लगभग बंद कर चुके हैं।”
लल्लापुरा, अलईपुर और बजरडीहा-ये वे इलाके हैं जहां रोज़ कमाने-खाने वालों की बड़ी आबादी रहती है। लेकिन पिछले डेढ़ साल में इनका जीवन बुरी तरह बिखर गया है। मेहनतकश लोग जो अपनी कमाई पर जीते हैं, वे न किसी सरकारी खैरात की ओर देखते हैं, न राजनीतिक जय-जयकार में शामिल होते हैं। उन्हें पता है कि मौजूदा सत्ता ने समाज में जो जहर घोला है, उसकी सबसे भयानक कीमत इन्हीं को चुकानी पड़ रही है।

बजरडीहा की गलियों में रेशमा, निखत, रोजी, रबीना जैसे न जाने कितने चेहरे हैं, जिनकी जिंदगी की रोशनी धीरे-धीरे बुझ रही है। बच्चों को स्कूल भेजने के भी पैसे नहीं। जिन नन्हीं उंगलियों में हुनर था, वे शहर के राजनीतिक शोर में कहीं गुम हो गईं। साड़ी कारोबारी एजे लारी का दर्द छलक उठता है, “आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े बुनकरों को जिसने चाहा, जैसे चाहा, नचाया। हुकूमत ने कभी उनका दर्द महसूस ही नहीं किया। बनारस के इस बेजोड़ हुनर को बचाना है, तो शहर में सुकून चाहिए-न कि बवाल। वरना बुनकरी का यह बेमिसाल हुनर दम तोड़ देगा।”
बुनकर शमीम अहमद की जुबान से सच्चाई यूं निकलती है, “शादी-ब्याह, बच्चों की फीस, बीमारी या मौत-हर मौके पर कर्ज़ लेना हमारी मजबूरी है। सच तो यह है कि कर्ज़ बुनकर के जीवन के साथ ही शुरू हो जाता है। जब कोई युवक तानी या मजूरी पर साड़ी बुनना शुरू करता है, तो वह ‘गिरस्ता’ से उधार लेता है, जिसे हम ‘बाकी’ कहते हैं। यह बाकी हर बुनकर-मजदूर पर हमेशा चढ़ी रहती है।”
जिन हाथों में कभी ज़री के महीन धागे लिपटे रहते थे, वे अब रिक्शा के हैंडल, फावड़े के लकड़ी, या भिक्षा के कटोरे थामे हुए हैं। शाहिद अंसारी की आवाज़ भर्रा जाती है—“पिछले छह सालों में हालत बद से बदतर हो गई। बाज़ार में पड़ा माल वापस आ रहा है। छोटे व्यापारी और कारीगर कंगाल हो रहे हैं। कई बुनकर तो मजबूरी में जान दे रहे हैं। अगर अमेरिका में हमारी साड़ियां बिकनी बंद हो गईं, तो क्या होगा?”
शाहिद मानते हैं कि पॉवरलूम ही नहीं, सरकारी नीतियां भी अपराधी हैं- बिजली कटौती, सूरत के नकली बनारसी कपड़े, आर्थिक सुरक्षा का अभाव, और बाढ़-सूखे की मार ने बाज़ार ठंडा कर दिया है। आफ़ताब आलम अब हथकरघा नहीं, साइकिल पर बिस्कुट ढोते हैं। “70-80 रुपये रोज़ भी मुश्किल से बनते हैं। मजदूरी भी नहीं मिलती, क्योंकि बाढ़ और सूखा झेल कर हजारों लोग पहले ही इस शहर में मजदूरी की तलाश में भटक रहे हैं।”
संस्कृति और पेट की जंग
बुनकर अब इतने टूट चुके हैं कि अपने दर्द भी छुपाने लगे हैं। कुरेदो तो बस आंखें भीग जाती हैं। कोई रिक्शा चलाने पर मजबूर है, कोई मज़दूरी कर रहा है, कोई आत्महत्या कर चुका है। परिवार उजड़ चुके हैं। यहां तक कि बच्चों की भूख मिटाने के लिए लोगों ने कबीरचौरा और बीएचयू अस्पताल में अपना खून बेचकर रोटी जुटाई है।

बनारसी साड़ी को जीआई टैग और ओडीओपी में जगह मिली है, पर बुनकरों की किस्मत में कोई उजाला नहीं आया। बिरादराना तंजीम बारहो के सरदार हासिम पूछते हैं—“अगर अमेरिका दबंगई पर उतर आया है, तो हमारी सरकार हमें बचाने क्यों नहीं आ रही?” एक्टिविस्ट डॉ. लेनिन चेतावनी देते हैं—“ये सिर्फ़ बुनकरों का संकट नहीं, बनारस की पूरी सांस्कृतिक विरासत पर खतरा है। पूंजीवादी साजिशों के खिलाफ बुनकर, किसान, मजदूर अगर साथ नहीं आए, तो आने वाला वक्त न सिर्फ उनकी रोजी-रोटी, बल्कि पूरी परंपरा को लील जाएगा।”
बनारस का नाटी इमली इलाका कभी यहां की गलियां करघों की खनक और ज़री के सुनहरे तानों की चमक से जगमगाती थीं। बुनकरों का यह बड़ा पड़ाव था, जहां हथकरघों पर चमत्कार रचे जाते थे। महीन सिल्क पर उकेरे गए जरी के बेमिसाल डिजाइन ही बनारसी साड़ी को दुनिया भर में पहचान दिलाते थे। पर आज उन्हीं गलियों में सन्नाटा है, करघों की जगह चूल्हों का धुआं, और धागों की जगह टूटी उम्मीदों के उलझे तार बिखरे पड़े हैं।
अमेरिकी टैरिफ ने जैसे इन बुनकरों के जख्मों पर नमक छिड़क दिया है। मोहम्मद अहमद अंसारी की आंखों में ठहरी नमी कहती है, “आधे से ज्यादा बुनकर तो बनारस छोड़ चुके। बेंगलुरु की फैक्ट्रियों में मजदूरी कर रहे हैं, तयशुदा तनख्वाह पर, पराये शहर में, परायी मशीनों के नीचे। जो बचे हैं, वे यहां 12-12 घंटे पावरलूम पर पसीना बहाकर भी 400 रुपये नहीं कमा पाते। हथकरघे पर दिनभर की मेहनत के बदले 300-400 रुपये मिलते हैं। बिजली की बढ़ती दरें और महंगाई ने हमें कटोरा पकड़ा दिया है। बनारस की हर गली में कोई न कोई बुनकर पान की दुकान या पकौड़े की कड़ाही संभालते दिख जाएगा।”
अहमद का सच कई चेहरों में बिखरा पड़ा है। सरैया के हाजी कटरा के बदरुद्दीन जो कभी रेशमी ताने-बाने पर सोने-चांदी की बुनाई करते थे। लॉकडाउन में अपने पावरलूम और हथकरघे सब बेच चुके। अब दुकान के शटर पर टंगी प्लास्टिक की थैलियों में टॉफी और बिस्कुट उनकी रोजी है। सूफी शहीद इलाके के अजीजुर्रहमान ने करघा छोड़कर आटा चक्की का शोर अपना लिया। इब्राहिमपुरा के कई बुनकर भूख से हारकर बिस्कुट और पाव रोटी के ठेले लगाने लगे। उनकी आंखों में सिर्फ एक सवाल ठहरा हुआ है, “हमारे सांसद, हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी… साल गुजर गए, वादे हकीकत में कब बदलेंगे? बुनकर का बुरा वक्त आखिर कब कटेगा? ये हुनरमंद हाथ हथकरघा छोड़ रिक्शा, फावड़ा या कटोरा क्यों पकड़े हुए हैं?”

अस्सी के दशक में यह शहर लाखों बुनकरों की रोजी का आसमान था। 2007 तक यहां 5,255 छोटी-बड़ी इकाइयां थीं जहां सिर्फ साड़ियां ही नहीं, ब्रोकेड, जरदोजी, जरी, गुलाबी मीनाकारी, कुंदनकारी, पत्थर की कटाई, बीड्स, दरी, कारपेट, मुकुट वर्क जैसे अनगिनत हस्तशिल्प बनते थे। 7,500 करोड़ का कारोबार हर साल बनारस की सांसों में बहता था। पर आज? ज्यादातर इकाइयां या तो ताले में बंद हैं या बंद होने की आखिरी गिनती गिन रही हैं। बनारसी साड़ी का कारोबार 600 करोड़ तक सिमट गया है।
उदारीकरण का ग्रहण
बनारसी साड़ी का सफर 16वीं सदी में गुजरात से बनारस पहुंचा। मुग़ल शासकों ने इसे सराहा, और बुनाई में उनकी संस्कृति की छाप उतर आई। मगर उदारीकरण की आंधी में ये करघे हिल गए। पॉवरलूम के तेज़ पहिये, चीनी सिल्क और सूरत की साड़ियां इस कारीगरी की कमर तोड़ ले गए। नोटबंदी और जीएसटी ने बची-खुची सांसें भी रोक दीं।
2007 के एक सर्वे में दर्ज हुआ था कि बनारस में 5,255 से अधिक छोटी-बड़ी हथकरघा इकाइयाँ सक्रिय थीं, जहाँ साड़ी ब्रोकेड, जरदोज़ी, जरी मेटल, गुलाबी मीनाकारी, कुंदनकारी, ज्वेलरी, पत्थर की नक्काशी, ग्लास पेंटिंग, बीड्स, दरी, कारपेट, वॉल हैंगिंग और मुकुट वर्क जैसे दर्जनों छोटे-मंझोले उद्योग सांस लेते थे। इनसे तकरीबन 20 लाख लोग रोज़ी-रोटी पाते थे और लगभग 7,500 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार होता था। मगर वक्त के थपेड़ों ने तस्वीर बदल दी। करीब 2,300 इकाइयाँ अब पूरी तरह बंद हो चुकी हैं और बाकी भी बंद होने की कगार पर खड़ी हैं।
एक शुद्ध रेशमी बनारसी साड़ी की न्यूनतम लागत पाँच हज़ार रुपये से शुरू होकर कई गुना ऊपर तक जाती है। इसे बुनने में 15–20 दिन, कभी-कभी इससे भी अधिक समय लग जाता है। इसके बरक्स, पावरलूम पर एक महीने में दर्जनों साड़ियाँ तैयार हो जाती हैं-सस्ती, तेज़ और बाजार में आसानी से उपलब्ध। नतीजा यह कि सूरत की नकली बनारसी साड़ियों ने असली बनारस के बाजार पर कब्ज़ा कर लिया। मांग इतनी बढ़ी कि अब बनारस की अपनी दुकानों में 90 फ़ीसदी माल सूरत का है। असली बुनकर, जो पीढ़ियों से अपने करघों पर जिंदगी का ताना-बाना बुनते आए, भुखमरी की कगार तक खिसक चुके हैं।
अमेरिकी टैरिफ का ताला
सितंबर 2017 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा लालपुर में 200 करोड़ रुपये की लागत से तैयार ट्रेड फैसिलिटेशन सेंटर का उद्घाटन किया, तो उम्मीदें जगीं-मानो अच्छे दिन दस्तक देने वाले हों। लेकिन अर्पिता हैंडलूम्स के मालिक अवधेश कुमार मौर्य बताते हैं, “बनारसी साड़ियों का मार्केट घटा नहीं है, लेकिन प्रोडक्शन इतना बढ़ गया है कि मुनाफ़ा घट रहा है। ऊपर से अमेरिकी टैरिफ लगने के बाद विदेशों में हाथ से बुनी साड़ियों की मांग पर गहरा असर पड़ा है। यह मेहनत का काम है, लेकिन हमें मजबूरी में जिंदगी भर इसी में गुजारनी पड़ी। अमेरिकी टैरिफ हमारे आगे का रास्ता हमेशा के लिए बंद कर देगा।”
तुफैल अंसारी, बनारसी साड़ियों के पुराने व्यापारी, कहते हैं, “एक समय साड़ियों का कारोबार 600 करोड़ के आसपास था। अमेरिकी टैरिफ इस रीढ़ को तोड़ देगा। बैंक कर्ज़, महंगे कच्चे माल और ऑनलाइन बाज़ार के दबाव के बीच यह नया झटका हमें सड़क पर ला खड़ा करेगा। यह सिर्फ मेरी नहीं, हजारों परिवारों की कहानी है।”
निर्यातक सफीउर्रहमान अपने गोदाम में रखी करोड़ों की तैयार साड़ियों की ओर इशारा करते हैं, “एक दशक से बुनकरी घाटे में थी, कोविड-19 के बाद संभली थी। अब निर्यातक ऑर्डर होल्ड करने को कह रहे हैं। जो माल तैयार है, वह बिकेगा भी तो कम दाम में। अमेरिका हमारी साड़ियों का दीवाना था, मगर अचानक टैरिफ ने ऑर्डर रोक दिए।”
गौरीशंकर धानुका, जो वर्षों से इस उद्योग से जुड़े हैं, गंभीर स्वर में कहते हैं, “सरकारी योजनाएं हैं, पर लाभ चुनिंदा लोगों तक सीमित है। अगर विकल्प नहीं खोजा गया, तो आने वाली पीढ़ियां बनारसी बुनकरी को सिर्फ किस्सों में जानेंगी।”
ईस्टर्न यूपी एक्सपोर्ट एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष राजेश कुशवाहा के मुताबिक, “हर साल लगभग 590 करोड़ रुपये की बनारसी साड़ियां और सिल्क उत्पाद विदेश जाते हैं, जिनमें 35% अकेले अमेरिका को। टैरिफ ने इस प्रक्रिया पर चोट की है। कुछ ही दिनों में करोड़ों के ऑर्डर ठहर गए।”
वाराणसी में 10 लाख से अधिक लोग इस उद्योग पर निर्भर हैं। बजरडीहा, सरैया और लोहता की गलियों में अब करघों की खट-खट विरल हो चुकी है। वाराणसी व्यापार मंडल के वरिष्ठ सदस्य अजित सिंह बग्गा कहते हैं, “बनारसी साड़ी सिर्फ परिधान नहीं, बनारस की आत्मा का हिस्सा है। बंगलादेश और पाकिस्तान से प्रतिस्पर्धा मुश्किल होगी और असली बनारसी साड़ी शायद संग्रहालयों तक सिमट जाए।”
अस्तित्व की लड़ाई
मुख्तार अहमद, ओबैदुल हक, अनुज डिडवानिया, , रजनीश कन्नौजिया, मनीष चौबे, दिनेश कालरा, विजय जायसवाल, केदार धन्ननी, संजय अग्रवाल और फैजान अहमद की एकजुट राय है, “सरकारी उपेक्षा, पावरलूम की बाढ़, नकली साड़ियों का बाजार और नई पीढ़ी की बेरुखी ने बनारसी हथकरघे को संकट में डाल दिया है। अमेरिकी टैरिफ ने इस लड़ाई को और कठिन बना दिया है।”
अमेरिका ने टैरिफ सिर्फ भारत पर नहीं, बल्कि बांग्लादेश, पाकिस्तान, चीन, इंडोनेशिया, वियतनाम, ताइवान और जापान पर भी लगाया है। यूपीडा के अनुसार, पहले वाराणसी, मऊ, भदोही और मिर्जापुर से सबसे ज्यादा साड़ियां अमेरिका जाती थीं। कई बार थर्ड पार्टी एक्सपोर्ट के जरिये साड़ियां बेची जाती थीं। अब वह रास्ता भी बंद है।
रामनगर के कारोबारी अमरेश कुशवाहा कहते हैं, “अमेरिकी टैरिफ से साड़ियां महंगी होंगी, खरीदार घटेंगे, डिमांड गिरेगी और उत्पादन रुकेगा। असर सिर्फ बुनकर पर नहीं, रंगाई, ताना-बाना, पैकिंग-हर कामगार पर पड़ेगा। जीआई टैग होने के बावजूद नकली माल बिकना असली कारीगर के लिए सबसे बड़ा खतरा है।”
वरिष्ठ पत्रकार और कारोबारी अतीक अंसारी याद करते हैं, “कभी बनारस की पहचान उसकी गलियों, घाटों और अनुपम हस्तकला से होती थी। अब महाकुंभ के दौरान बनारसी साड़ियों को फुटपाथ पर बिकते देखना एक सांस्कृतिक झटका था।” उनकी नज़र में, “बुनकरों की सूनी आंखें बहुत कुछ कह जाती हैं। अमेरिकी टैरिफ ने उनकी धड़कनों को धीमा कर दिया है, और सवाल यह है कि क्या कोई इस धरोहर को बचाएगा, या यह भी इतिहास के पन्नों में खो जाएगी?”





