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*प्रसंगवश : ठाकुर के कुंए के मेढ़क*

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      ~ पुष्पा गुप्ता 

भारत में बढ़ती जातिगत राजनीति का असर ऐसा हुआ कि कुछ वर्षों से शब्दों को जातीय लेंस के द्वारा देखा जाने लगा है। कुछ ऐसा ही इधर साहित्यिक और धार्मिक संदर्भों के साथ  हो रहा है। तुलसीदास कृत रामचरितमानस पर सवाल हो या ठाकुर का कुआं के बहाने बिहार की राजनीतिक सत्ता को साधने की बात इनमें आप एक स्पष्ट और क्रिएट किया गया नैरेटिव देख सकते हैं।

      मुंशी प्रेमचंद द्वारा सामाजिक -आर्थिक विषमता को आधार बनाकर लिखी गई एक कहानी, 1932 में आई, जिसका शीर्षक, ‘ठाकुर का कुआँ’था। बाद में इसी शीर्षक से एक दलित साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की एक कविता, साल, 1989 में तब आई थी।

      यह ओम प्रकाश वाल्मीकि का पहला कविता संग्रह ‘सदियों का संताप’ में प्रकाशित में यह कविता थी, जिसमें भी सामाजिक आर्थिक विषमता को आधार बनाया गया था। 

      किंतु आगामी लोकसभा चुनाव के ठीक पहले बिहार से आने वाले राज्यसभा सांसद जो कि जातिगत राजनीति करने वाले लालू प्रसाद यादव की पार्टी से आते हैं, के द्वारा इस कविता के वाचन के बड़े निहितार्थ हैं। ऐसा लगता है कविता  राजनीतिक गिद्धों की नजर में आ गई है।

     इसे तत्काल लपक कर वे इसे सामाजिक समस्याओं को राजनीतिक लाभ हेतु द्वेष में परिवर्तित करने का प्रयास कर रहे जिससे समाज में जातिगत भेद की खाई चौड़ी हो।

*ठाकुर शब्द की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि :* 

      इसकी उत्पत्ति के बारे में विद्वानों में अलग-अलग राय है। कुछ विद्वानों का सुझाव है कि 500 ​​ईसा पूर्व से पहले के संस्कृत ग्रंथों में इसका उल्लेख नहीं है , लेकिन अनुमान है कि यह गुप्त साम्राज्य से पहले उत्तरी भारत में बोली जाने वाली बोलियों की शब्दावली का हिस्सा रहा होगा।

      ऐसा माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति ठक्कुरा शब्द से हुई है, जो कई विद्वानों के अनुसार, संस्कृत भाषा का मूल शब्द नहीं था, बल्कि आंतरिक एशिया के तुखारा क्षेत्रों से भारतीय शब्दावली में उधार लिया गया शब्द था। 

     एक अन्य दृष्टिकोण यह है कि ठक्कुरा प्राकृत भाषा से लिया गया एक शब्द है। विद्वानों ने इस शब्द के लिए अलग-अलग अर्थ सुझाए हैं, अर्थात “भगवान”, “भगवान”, और “संपत्ति का स्वामी”। शिक्षाविदों ने सुझाव दिया है कि यह केवल एक शीर्षक था, और अपने आप में, अपने उपयोगकर्ताओं को “राज्य में कुछ शक्ति का उपयोग करने” का कोई अधिकार नहीं देता था।

मध्यकालीन संतों की रचनाओं में अक्सर ठाकुर शब्द का प्रयोग ईश्वर के लिए किया जाता रहा।

     यह अक्सर देने वाला अथवा कृपा करने वाला कष्टों को हरने वाला आदि अर्थों में प्रयुक्त किया जाता रहा। जिससे इतना तो पता लगता है कि उक्त समाज में यह शब्द उन्हीं लोगों के लिए प्रयुक्त किया जाता रहा जो लोगों को कुछ देते रहे या अहैतुक कृपा करते रहे।

      भारत में, इस उपाधि का उपयोग करने वाले सामाजिक समूहों में राजपूत , राजपुरोहित  , कोली ,  चारण ,  मैथिल ब्राह्मण शामिल हैं और बंगाली ब्राह्मण।

      इसके अतिरिक्त कई अन्य जातियां ठाकुर शब्द का प्रयोग करती है- जैसे बिहार में नाई जाति से आने वाले कर्पूरी ठाकुर, भिखारी ठाकुर इत्यादि…

सुसान स्नो वाडली ने उल्लेख किया कि ठाकुर शीर्षक का उपयोग “अनिश्चित लेकिन मध्यम स्तर की जाति के व्यक्ति, आमतौर पर एक जमींदार जाति को दर्शाता है” के लिए किया जाता था।

     वाडले ने आगे कहा कि ठाकुर को ” राजा ” (राजा) की तुलना में “अधिक विनम्र” शीर्षक के रूप में देखा जाता था। 

एसके दास ने कहा कि जबकि ठाकुर शब्द का अर्थ “भगवान” है, इसका उपयोग किसी महिला के ससुर के लिए होता है।

      कुछ शिक्षाविदों ने सुझाव दिया है कि ” ठाकुर केवल एक उपाधि थी, न कि एक पद जिसके तहत एक धारक राज्य में कुछ शक्ति का उपयोग करने का हकदार था”।  हालाँकि, कुछ अन्य शिक्षाविदों ने नोट किया है कि इस उपाधि का उपयोग हिमाचल प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्रों में “छोटे प्रमुखों” द्वारा किया गया था। 

     इस उपाधि का उपयोग कई रियासतों के शासकों द्वारा किया जाता था , जिनमें अम्बलियारा , वाला , मोरबी , बारसोडा और राजकोट राज्य शामिल थे। ठाकुरों के पुत्रों को कुमार (‘राजकुमार’) की संस्कृत उपाधि दी जाती थी , जिसका लोकप्रिय उपयोग उत्तर में कुँवर और बंगाल और दक्षिण भारत में कुमार था।

*ठाकुर शब्द से अस्मितागत राजनीति :*

      सामयिक प्रसंग में ठाकुर शब्द को राजपूत के अर्थ में संदर्भित करते हुए राजपूत बनाम ब्राह्मण करने की कोशिश है जोकि राजद की पुरानी राजनीति रही है- पिछड़ा जोड़ो अगडा़ तोड़ो। सांप निकल गया और लोग लकीर पीटते रहे। 

      ठाकुर और कुआं नए-नए रूप में हमारे सामने प्रकट हो रहा है किंतु क्या हम इसे पहचान सकते हैं।

     अब कुएं के स्थान पर बिसलेरी, एक्वाफिना और टाटा का पानी है और ठाकुर के नाम पर अडानी ,अंबानी और टाटा है किंतु चारों तरफ ऐसा धुंधलका खड़ा किया जाता है कि लोकतंत्र के नाम पर समाज में काल्पनिक शत्रु और मित्र एक दूसरे के सामने स्पष्ट हो सकें।

Ramswaroop Mantri

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