
-निर्मल कुमार शर्मा
एक यक्ष प्रश्न दिमाग में अक्सर उभरता रहता है,कि क्या दुनिया के सभी ‘शिक्षित लोग ‘ जागरूक भी होते हैं ? ‘जागरूकता ‘ से हमारा अभिप्राय सदियों से इस दुनिया के लगभग सभी देशों,समाजों और कबीलों में व्याप्त रिवाज या परंपरा के नाम पर जो पाखण्डपूर्ण और अंधविश्वासी,बेसिरपैर के उलटे-सीधे कृत्य किए जा रहे हैं,उन्हें रोकने की हिम्मत या साहस कितने लोग कर पाते हैं ? हम अक्सर उन सभी लोगों को ‘शिक्षित ‘मानते हैं,जो ऊँची-ऊँची डिग्रियों को किसी बड़े शिक्षा संस्थानों से प्राप्त किए रहते हैं। परन्तु बहुत दुःख और अफ़सोस की बात है कि ‘हर शिक्षित व्यक्ति जागरूक हो,यह बिल्कुल जरूरी नहीं है। अशिक्षित व्यक्ति भी बहुत जागरूक होते हैं। भारतीय इतिहास में दुनिया के महान सम्राटों में अपना विशिष्ठ स्थान रखने वाला अकबर, ‘अकबर महान ‘ कहलाता है,उसी प्रकार भारतीय साहित्याकाश में दैदिप्यमान सबसे बड़े दार्शनिक कवि,जो भारतीय मूढ़ और अंधविश्वासी समाज को अपने बहुत ही सरल दोहों,साखी,शबद और रमैनी के माध्यम से ज्ञान का सबसे बड़ा प्रकाश फैलाए,वे ‘कबीर दास ‘बिल्कुल निरक्षर थे,उन्होंने अपनी इस कमी की अपने दोहों में सार्वजनिक रूप से स्वयं के लिए स्वीकार भी किया है कि
‘मसि कागद छुऔं नहीं कलम गहौं नहीं हाथ।
चारों युग के महातम कबिरा मुखहिं जनाई बात। ‘
वहीं भारत में एक बार दिल्ली के तख्त पर बैठने वाला कथित सबसे ‘शिक्षित ‘बादशाह मुहम्मद बिन तुगलक इतना मूर्ख था कि उसे ‘पागल ‘तक कहा जाता है ! जबकि अकबर निरा निरक्षर होते हुए भी ‘महान ‘ कहलाता है,और कबीरदास ‘अनपढ़ ‘ होते हुए भी भारतीय साहित्यिक जगत में बहुत से पढ़े-लिखे कवियों से हर दृष्टिकोण से ‘भारी ‘ पड़ते हैं। इसका मतलब यह निकलता है कि पढ़ा-लिखा व्यक्ति विद्वान हो,यह बिल्कुल जरूरी नहीं है।
अब आइए आधुनिक काल में पढ़े-लिखे कथित शिक्षितों पर एक नजर डाली जाय। भारत में हर कुछ सालों के अन्तराल के बाद कुछ नये अवतारों,देवियों या देवताओं का प्रायोजित रूप से समाज में अवतरण होता रहता है जैसे अभी कुछ सालों पूर्व एक बहुत ही साधारण से एक अत्यंत गरीब और पाखंडी व्यक्ति जो अपने जीवन भर बहुत ही गरीबी में अपना जीवन बिताने को अभिशापित रहा उसके मरने के तुरंत बाद उसे एक ताकतवर वर्ग द्वारा अवतार घोषित करके उसे साईं बाबा के नाम से देश भर में धुंआधार प्रचारित कर उसके नाम पर अरबों-खरबों रुपयों का कारोबार स्थापित कर दिया गया। उसके बाद एक और माता आ गई,उसका नामकरण संतोषी माता रख दिया गया,उसका प्रभाव धीरे-धीरे कम होना शुरू हुआ,तभी अचानक हर तरफ,हर चौराहे, हर गली,हर नुक्कड़ पर काले पत्थरों में शनि देव महाराज अवतरित हो गये ! भारतीय देवी-देवताओं के पूजने के लिए बाकायदा अलिखित संविधान हैं जैसे शनिदेव को सरसों का तेल सर्व प्रिय है। आप विशेषकर शाम को खूब देख सकते हैं कि उत्तर भारत में कथित शनिदेव के निवासस्थान काले मन्दिरों के सामने खूब शिक्षित,पढ़े-लिखे से दिखने वाले युवक-युवतियाँ अपने हाथों में सरसों के तेल की बोतल,फूलमाला आदि पकड़े पक्तिबद्ध खड़े मिल जाएंगे। दक्षिणी और पश्चिमी भारत की इस शनिदेव मामले में क्या स्थिति है,मुझे नहीं मालूम है ।
वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर विश्लेषण करने पर यह बात सामने आती है कि शनि ग्रह ,सौरमंडल का अपनी विशिष्ट रचना और आकार प्रकार की वजह से प्रकृति की एक सुन्दरतम् रचना है ,जो हमारे सौरमण्डल परिवार में और इस पूरे ब्रह्मांड में भी विरलतम् है । यह पृथ्वी से 1277400000 किमी. मतलब एक अरब सत्ताइस करोड़ चौहत्तर लाख किमी. दूर स्थित है। अब यह बात शनिदेव महाराज के काले-काले मंदिरों के सामने पंक्ति बद्ध खड़े इन पढ़े-लिखे कथित शिक्षित मूर्खों से पूछा जाय कि इस शनिदेव को प्रति शनिवार को ये सरसों का तेल चढा़ने का क्या औचित्य है ? तो इस प्रश्न पर वे निश्चित रूप से क्रोधित तो खूब होंगे परन्तु उन से इसका कोई स्पष्ट उत्तर पाने की आशा करना व्यर्थ है। तो इस प्रकार के मूर्खों को आप शिक्षित मानेंगे ? अगर हाँ तो ये शिक्षा का भी सरासर अपमान होगा !
इस प्रकार के भारत सहित दुनिया के तमाम हिस्सों में मूर्खतापूर्ण कृत्यों के लाखों उदाहरण मिल जाएंगे। आज भी भारत में भूत-प्रेत,जादू-टोटके से बचने के लिए हर शनिवार को अपने घर के दरवाजे या दुकान के सामने सुबह ही नींबू-मिर्च धागे में लटकाने वाले बहुत से पढ़े-लिखे मूर्ख मिल जाएंगे,सूर्य या चन्द्र ग्रहण में पुण्य लाभ के लिए तथा राहुकेतु नामक कथित राक्षसों के प्रकोप से बचने के लिए गंगा मैया में डुबकी लगाने वाले करोड़ों की तादाद में हैं जो यह मानते हैं कि, ‘हम पिछले जन्म का पाप भोग रहे हैं। ‘ इस विकृत सोच वाले खूब पढे़-लिखे भारत में करोड़ों की संख्या में मिल जाएंगे,किसी गरीब की मदद न करके किसी मंदिर-मस्जिद में करोड़ों रूपये या सोने के मुकुट दान करने वाले यहाँ फिल्मों के कथित बड़े महानायक और स्टार तथा बड़ी राजनैतिक पार्टियों के नेता तक हैं !
इस प्रकार के लोग पढ़े-लिखे तो हैं,परन्तु इनको किसी भी दृष्टिकोण से जागरूक नागरिक की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता,क्योंकि ये कथित बड़े लोग खुद तो पाखण्डपूर्ण और मूर्खतापूर्ण दुःष्कृत्य तो करते ही हैं,लाखों अन्य लोगों को अपनी लोकप्रियता से वैसी ही मूर्खतापूर्ण कृत्य करने के लिए प्रेरित भी करते हैं,इसलिए इस प्रकार के कथित बड़े लोग समाज में अंधविश्वास और पाखंड फैलाने के अक्षम्य और ज्यादे दोषी हैं । आज से लगभग ढाई हजार साल पहले इस देश के और दुनियाभर में अपने ज्ञान की अद्वितीय मशाल जलाने वाले गौतमबुद्ध ने उसी समय कहा था कि ‘आत्म दीपो भव ‘ मतलब-अपना दीपक स्वयं बनो या उन्होंने एक अपने प्रवचन में आम जनता को सम्बोधित करते हुए कहा था कि , ‘आप लोग कोई बात इसलिए मत मानो कि ‘उसे बहुत लोग मानते हैं ‘ या ‘उसे मानने की परम्परा है ‘, या ‘वह पुराणों,धर्मग्रंथों में लिखी है ‘ या ‘वह बहुत बड़े आचार्य या विख्यात गुरूजी कह रहे हैं ‘ या ‘वह बात मैं स्वयं कह रहा हूँ ‘ । ‘मेरी कही हुई बात को भी अपनी तर्क की कसौटी पर कसे बिना मत मानो ! ‘
उन्होंने ने आगे कहा…… ,*
‘तापात् ,छेदात् , निकसात् सुवर्णमिव सम्परीक्ष्यमदवचःगृहणात् न च गौरवात् ‘
अर्थात जैसे सोने को तपाकर, छेदकर,कसकर ग्रहण करते हैं वैसे ही मेरे वचनों का भी परीक्षण करो।
हमें तो अपार दुःख और अफसोस इस बात का है कि आज से ढाई हजार साल पहले इतनी व्यवहारिक,तार्किक और ज्ञान की बातें हमारे एक वैज्ञानिक ऋषि गौतम बुद्ध कह गये हैं,जिसके आलोक में दुनिया के लगभग आधे देश उनकी ज्ञान की आभा से आज के वर्तमान समय में भी जगमग हो रहे और हमारा देश अंधविश्वास, पाखण्ड और जहालत की गर्त में अभी भी डूबा हुआ है ! इसका कारण यही है कि हमारे देश में कुछ अत्यंत शातिर,धूर्त और पाखण्डी लोगों के एक समूह ने अपने स्थाई रोजी-रोटी की व्यवस्था करने के लिए इस देश में छल-प्रपंच,कपट और धोखाधड़ी से बौद्ध धर्म का,बौद्ध संस्कृति का, बौद्ध साहित्य का,खुद बौद्ध लोगों की सदियों तक नष्ट करने,उनकी निर्मम हत्या करने का कुकृत्य किया है। इसीलिए आज बौद्ध धर्म जैसा ज्ञान-विज्ञान से परिपूर्ण धर्म का इस देश से विलोपन हो गया है।..और हर जगह पाखण्ड, अंधविश्वास, पुनर्जन्म,स्वर्ग-नरक,मंदिर-मस्जिद,आदि बुराइयों का बोलबाला हो गया है। अब जरूरत है इस देश के प्रबुद्ध लोग जागरूक बनें,संगठित बनें और इस पाखण्ड व अंधविश्वास रूपी अंधकार को अपने ज्ञान के प्रकाश से काट कर उसे कूड़ेदान में बहुत गहराई में दफन कर दें।
-निर्मल कुमार शर्मा 'गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के सुप्रतिष्ठित समाचार पत्र-पत्रिकाओं में वैज्ञानिक,सामाजिक, राजनैतिक,पर्यावरण आदि विषयों पर स्वतंत्र,निष्पक्ष,बेखौफ, आमजनहितैषी,न्यायोचित व समसामयिक लेखन,संपर्क-9910629632,




